राजनीति की भेंट चढ़ गई किसान यूनियन

कब तक आंदोलन को खींचा जा सकता है

राजनीति की भेंट चढ़ गई किसान यूनियन

इसमें कोई दो राय नहीं है कि किसान आंदोलन के नेता सरकार के पास बातचीत का प्रस्ताव भेजकर सिर्फ आंदोलन को टूट से बचाने की कोशिश में लगे रहे। आंदोलन के समय तमाम किसान अपने नेताओं से पूछ भी रहे थे कि यदि सरकार से बातचीत नहीं होगी, तो रास्ता कैसे निकलेगा।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि किसान आंदोलन के नेता सरकार के पास बातचीत का प्रस्ताव भेजकर सिर्फ आंदोलन को टूट से बचाने की कोशिश में लगे रहे। आंदोलन के समय तमाम किसान अपने नेताओं से पूछ भी रहे थे कि यदि सरकार से बातचीत नहीं होगी, तो रास्ता कैसे निकलेगा। कब तक आंदोलन को खींचा जा सकता है। भारतीय किसान यूनियन दो धड़ों में बंट गईं। सबसे बड़ी बात यह हुई कि किसान आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरे बाबा टिकैत के दोनों बेटे नरेश टिकैत और राकेश टिकैत को भारतीय किसान यूनियन से बर्खास्त कर दिया गया। फतेहपुर जनपद के राजेश सिंह को भारतीय किसान यूनियन, अराजनीतिक का नया अध्यक्ष बनाया गया है। वास्तव में किसान आंदोलन को राजनीतिक रंग देने और यूपी समेत तमाम राज्यों में बीजेपी को चुनाव हराने की कोशिशों में लगे टिकैत बंधुओं की कार्य प्रणाली से संगठन के नेताओं में अनबन और मनमुटाव काफी समय से जारी था। असल में अराजनीतिक संगठन को टिकैत बंधु राजनीतिक संगठन की तरह चला रहे थे। उसी का नतीजा संगठन में दोफाड़ के तौर पर सामने आया है। इतिहास के पन्ने पलटे तो 1 मार्च 1987 को महेंद्र सिंह टिकैत ने किसानों के मुद्दे को लेकर भाकियू का गठन किया था। इसी दिन करमूखेड़ी बिजलीघर पर पहला धरना शुरू किया। इस धरने के दौरान हिंसा हुई थी, तो किसान आंदोलन उग्र हो गया।

पीएसी के सिपाही और एक किसान की गोली लगने से मौत हो गई। पुलिस के वाहन फूंक दिए गए। बाद में बिना हल के धरना समाप्त करना पड़ा। 17 मार्च 1987 को भाकियू की पहली बैठक हुई, जिसमें निर्णय लिया कि भाकियू किसानों की लड़ाई लड़ेगी और हमेशा गैर-राजनीतिक रहेगी। इसके बाद से पश्चिम उत्तर प्रदेश में भाकियू किसानों के मुद्दे उठाने लगी। लेकिन तीन नए कृषि कानूनों के विरोध में हुए किसान आंदोलन में भाकियू केन्द्रीय भूमिका में रही और उसके नेता राकेश टिकैत बड़ा चेहरा बनकर उभरे। किसान आंदोलन के दौरान हिंसा और अन्य हादसे किसान नेताओं के एक धड़े को शुरू से नागवार गुजरी। इसमें कोई दो राय नहीं है कि किसान आंदोलन के नेता सरकार के पास बातचीत का प्रस्ताव भेजकर सिर्फ आंदोलन को जिंदा रखने और इसे टूट से बचाने की कोशिश में लगे रहे। आंदोलन के समय तमाम किसान अपने नेताओं से पूछ भी रहे थे कि यदि सरकार से बातचीत नहीं होगी तो रास्ता कैसे निकलेगा। कब तक आंदोलन को खींचा जा सकता है। कोरोना महामारी के समय आंदोलन को जारी रखने पर भी किसान नेता बंटे हुए थे। खासकर कोरोना को लेकर भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत जिस तरह की बे सिर-पैर की बातें कर रहे थे, उससे किसानों में कुछ ज्यादा ही गुस्सा था। कई किसान नेता तो खुलकर कह रहे थे कि यह किसान नहीं सियासी आंदोलन बन गया है। नाराजगी और फूट की बड़ी वजह तब पैदा हुई जब केंद्र द्वारा कृषि कानून वापस लेने के बाद भी जिस तरह कुछ किसान नेता हठधर्मिता पर अड़े रहे।

आंदोलन के नाम पर हिंसा की गई। बीजेपी को हराने के लिए चुनावी राज्यों मे किसान आंदोलन के नेता पहुंच गए। इसी वजह से लगने लगा था कि किसान नेताओं का मकसद किसानों की समस्याओं का समाधान कराना नहीं, बल्कि केंद्र सरकार को झुकाना है। इसी वजह से आम किसानों ने आंदोलन से दूरी बना ली। सबसे दुख की बात यह है किसान नेता कोरोना महामारी की भी खिल्ली उड़ा रहे थे,  कभी कहते थे टीका नहीं लगवाएंगें, तो कभी कहते थे आधे टीके धरना स्थल पर ड्यूटी दे रहे पुलिस वालों को टीका लगाए जाएं ताकि हमें विश्वास हो जाए की सरकार हमारे साथ कुछ गलत नहीं कर रही है। किसान नेताओं की जिद के अलावा और कुछ नहीं कि वे कोरोना संक्रमण के भीषण खतरे के बाद भी धरना देने में लगे हुए थे। दिल्ली में 26 जनवरी को हुई हिंसा के बाद जब किसान आंदोलन खत्म होने की कगार पर था तब राकेश टिकैत के आंसुओं ने कमाल किया और देखते ही देखते किसानों का हुजूम नए जोश के साथ फिर से उठ खड़ा हुआ। उसके बाद किसानों के मंच पर राजनीतिक दलों के नेता भी दिखाई दिए तो राकेश टिकैत के गांव सिसौली में हुई महापंचायत में नरेश टिकैत ने कहा कि हमने भाजपा को जिता कर बड़ी भूल की है।

हमें अजीत सिंह को नहीं हराना चाहिए था। इधर, यूपी में भाजपा को छोड़ सभी राजनीतिक दलों में किसान आंदोलन को समर्थन देने की होड़ सी लग गई। लाल किले की हिंसा के बाद से पंजाब के किसान नेता नेपथ्य में चले गए और पूरे किसान आंदोलन की कमान राकेश टिकैत के हाथ में आ गई। राकेश टिकैत ने इस अवसर को पूरी तरह भुनाया। पंजाब, हरियाणा, यूपी, उत्तराखण्ड, पश्चिम बंगाल और दक्षिण भारत तक वो दौरे करके अपनी सियासत चमकाने लगे। एक बार तो ऐसा लगने लगा कि राकेश टिकैत और उनके साथी नेताओं की मंशा किसानों के मुद्दों को सुलझाने की बजाए अपनी राजनीति चमकाने में ज्यादा है। यूपी और उत्तराखण्ड विधानसभा चुनाव में टिकैत बंधुओं की भूमिका किसी से छिपी नहीं रही। किसान महापंचायत में ‘वोट की चोट’ की राकेश टिकैत की घोषणा भी देशवासियों ने सुनी।  कृषि कानूनों के खिलाफ किए जा रहे आंदोलन को जब 383 दिनों बाद खत्म किया, तो एक बड़ा सवाल जो दिमाग में आया वो ये कि इस आंदोलन में हीरो की तरह उभरे राकेश टिकैत का अगला कदम क्या होगा। सरकार को किसान कानूनों को वापस लेने के लिए तो मजूबर कर दिया, अब वो किस ओर कदम बढ़ाएंगे। ना ना बोलकर क्या वो ‘राजनीति को हां’ कहेंगे। सपा और रालोद के पोस्टरों पर उनके तस्वीरें दिखाई दीं, जिनका उन्होंने विरोध किया।

- राजेश माहेश्वरी
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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