बॉडी फिट युवाओं पर हार्ट अटैक का कसता शिकंजा

पोस्ट कोरोना पीरियड में बड़े पैमाने पर युवाओं पर हार्ट अटैक अपना शिकंजा कस रहा है।

बॉडी फिट युवाओं पर हार्ट अटैक का कसता शिकंजा

पिछले कुछ सालों में पूरी दुनिया में हार्ट अटैक की उम्र कम हुई है।

पोस्ट कोरोना पीरियड में बड़े पैमाने पर युवाओं पर हार्ट अटैक अपना शिकंजा कस रहा है। डॉ. पांडा ने यह बात अगस्त 2021 में एक 28 साल के युवक को हुए हार्ट अटैक के बाद यह चिंता जतायी थी। उनके मुताबिक उस युवक को आया हार्ट अटैक पोस्ट कोविड जटिलताओं के कारण था, ब्लड थिनर की वजह से हालांकि उसे तो समय रहते बचा लिया गया, लेकिन शायद सिद्धार्थ शुक्ला, इंद्र कुमार, पुनीत राजकुमार और ऑस्ट्रेलिया के मशहूर लेग स्पिनर शेन वॉर्न इतने खुशकिस्मत नहीं थे कि इन्हें बचाया जा सकता। हैरानी की बात यह है कि यहां हमने जिन जिन सेलिब्रिटीज का नाम लिया है, वो सब शेन वॉर्न को छोड़कर 50 साल से कम उम्र के थे और ये सबके सब बॉडी फिट थे। चाहे 40 साल के सिद्धार्थ शुक्ला रहे हों, 43 साल के इंद्र कुमार रहे हों या 46 साल के पुनीत राजकुमार और इसी क्रम में शेन वॉर्न भी। ये सब सौ फीसदी बॉडी फिट और अपने सेहत को लेकर सजग रहने वाले लोग थे, लेकिन इनमें से किसी को भी पहले ही हार्ट अटैक से नहीं बचाया जा सका।


 महज संयोग है या
पिछले कुछ सालों में पूरी दुनिया में हार्ट अटैक की उम्र कम हुई है।  भारत में जितने भी लोग 50 साल के कम की उम्र के हार्ट अटैक के कारण दम तोड़ते हैं, उनमें 10 फीसदी को जरूर आनुवांशिक बीमारी के रूप में हार्ट अटैक की समस्या मिली हुई थी, लेकिन बाकी 90 फीसदी में से ज्यादातर इन्हीं तीन वजहों से यानी लाइफस्टाइल स्ट्रेस, ड्रग्स का अंधाधुंध इस्तेमाल और कॅरियर के उतार-चढ़ाव के कारण मर रहे हैं। इसलिए पहले जहां 35 साल से कम लोगों में हार्ट अटैक की समस्या कभी अपवाद के तौरपर सुनी जाती थी, वहीं अब ये बहुत तेजी से कॉमन होती जा रही है। युवाओं में दिल की बीमारी तेजी से बढ़ रही है और चिंतित करने वाली बात यह है कि 60 साल के या इससे ज्यादा की उम्र के लोग हार्ट अटैक से 40 या 50 साल के लोगों के मुकाबले ज्यादा बच रहे हैं यानी युवाओं को एक तो हार्ट की बीमारी बढ़ रही है और दूसरी बात हार्ट अटैक आने पर उनकी मौत सीनियर मरीजों के मुकाबले ज्यादा जल्दी हो रही है। पिछले दो सालों से एक तरफ जहां दुनिया के हर कोने में कमाने वाली पीढ़ी पर सबसे ज्यादा कॅरियर का तनाव बढ़ा है। वहीं सच बात यह भी है कि अगर यह स्थिति कोरोना के कारण न भी बनी होती तो भी कॅरियर का ग्लोबल इंडेक्स बताता है कि चाहे विकसित देश हों या विकासशील देश, हर जगह युवाओं के लिए रोजगार का संकट है,जो एक बड़े मानसिक तनाव के रूप में उभरकर सामने आया है। इसमें वर्क कल्चर के बदल जाने का भी तनाव है। पहले एग्जीक्यूटिव लेबल के लोग भी एक बार ड्यूटी से घर जाने के बाद दफ्तर की तमाम चिंताओं को दफ्तर में ही छोड़ जाते थे। लेकिन जब से डिजिटल कम्युनिकेशन आम हुआ है, तब से हर टारगेट से संबंधित कर्मचारी चैबीसों घंटे की नौकरी वाला कर्मचारी बन गया है। अब ऐसे जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों की कभी छुट्टी नहीं होती, जिनके मातहत कुछ लोग काम करते हैं और जिन्हें एक समय सीमा के भीतर काम डिलीवर करना होता है।यह स्थिति कम उम्र के इन व्हाइट कॉलर जॉब के कर्मचारियों के लिए जानलेवा साबित हो रही है। युवाओं में तेजी से बढ़ती हार्ट की बीमारियों का एक बड़ा कारण यह भी है कि पूरी दुनिया में बड़े पैमाने पर युवा फिजिकल एक्टिविटी यानी शारीरिक गतिविधियों से दूर रहो रहे हैं। भले ही आज के युवा जॉगिंग करते हों, घर में ही जिम बना रखा हो, लेकिन डॉक्टर कहते हैं कि यह बहुत ऑर्गेनाइज तरीके से की गई एक्सरसाइज उस फिजिकल एक्टिविटी का मुकाबला नहीं कर पाती, जो स्वस्थ रहने को ध्यान में रखे बिना की जाती है और जो अपने परिणाम में हमें सेहतमंद बनाये रखती हैं।

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