खतरे का संकेत है प्रकृति से छेड़छाड़

खतरे का संकेत है प्रकृति से छेड़छाड़

जहां तक जंगलों के खत्म होने का सवाल है, उसकी गति देखते हुए ऐसा लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब दुनिया से जंगलों का नामोनिशान तक मिट जायेगा और वह किताबों की वस्तु बनकर रह जायेंगे।

प्रकृति के साथ छेड़छाड़ आज समूची दुनिया के लिए भयावह खतरे का सबब बन चुकी है। तापमान में वृद्धि, मौसम में बदलाव और जलवायु परिवर्तन इसके जीवंत प्रमाण हैं। इन प्रकोपों से दुनिया त्राहि-त्राहि कर रही है। लाखों-करोड़ो़ं लोग इसके चलते अनचाहे मौत के मुंह में जाने को विवश हैं। मौसम में आये बदलाव ने इस संकट के भयावह रूप धारण करने में प्रमुख भूमिका निबाही है। असलियत में इस सबके पीछे मानवीय गतिविधियां पूरी तरह जिम्मेदार हैं जिसने दुनिया को तबाही के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है। प्रकृति की बदहाली इसका जीता-जागता सबूत है। दुनिया में जिस तेजी से पेड़ों की तादाद कम होती जा रही है, हकीकत में उससे पर्यावरण तो प्रभावित हो ही रहा है, पारिस्थितिकी, जैव विविधता, कृषि और मानवीय जीवन ही नहीं, बल्कि भूमि की दीर्घकालिक स्थिरता पर भी भीषण खतरा पैदा हो गया है। जैव विविधता का संकट पर्यावरण ही नहीं, हमारी संस्कृति और भाषा का संकट भी बढ़ा रहा है। विश्व बैंक ने जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से संबंधित रिपोर्ट में कहा है कि पर्यावरण प्रदूषण के चलते हो रही तापमान में बढ़ोतरी के लिए दैनंदिन घटती जैव विविधता और मानवीय गतिविधियां सबसे अधिक जिम्मेदार हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जैव विविधता घटने की वजह से धरती दैनंदिन गर्म होती जा रही है जिससे अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड के साथ साथ दुनिया में तीसरे सबसे अधिक बर्फ के भंडार माने जाने वाले कनाडा के ग्लेशियर संकट में हैं। इनके पिघलने से इस सदी के अंत तक दुनिया भर के समुद्र के जलस्तर में बढ़ोतरी हो जायेगी जिससे दुनिया के समुद्र तटीय बड़े शहरों के डूबने का खतरा बढ़ जायेगा।  

जहां तक जंगलों के खत्म होने का सवाल है, उसकी गति देखते हुए ऐसा लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब दुनिया से जंगलों का नामोनिशान तक मिट जायेगा और वह किताबों की वस्तु बनकर रह जायेंगे। हकीकत यह है कि हर साल दुनिया में एक करोड़ हेक्टेयर जंगल लुप्त होते जा रहे हैं। दुनिया के वैज्ञानिक बार-बार कह रहे हैं कि इंसान जैव विविधता के खात्मे पर आमादा है। जबकि जैव विविधता का संरक्षण हमें बीमारियों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निबाहता है। समृद्ध जैव विविधता हमारे अस्तित्व का आधार है। यह हमारे बेहतर भविष्य के लिए भी बेहद जरूरी है। इसीलिए जैव विविधता का संरक्षण बेहद जरूरी है। यहां इस कटु सत्य को नकारा नहीं जा सकता कि यदि वनों की कटाई पर अंकुश नहीं लगा तो प्रकृति की लय बिगड़ जायेगी और उस स्थिति में वैश्विक स्तर पर तापमान में दो डिग्री की वृद्धि को रोक पाना बहुत मुश्किल हो जायेगा। ऐसी स्थिति में सूखा और स्वास्थ्य सम्बंधी जोखिम से आर्थिक हालात और भी प्रभावित होंगे जिसकी भरपायी आसान नहीं होगी। सबसे बड़ी बात यह कि पेड़ों का होना हमारे जीवन के लिए महत्वपूर्ण ही नहीं, बेहद जरूरी है। यह न केवल हमें गर्मी से राहत प्रदान करते हैं बल्कि जैव विविधता को बनाये रखने, कृषि की स्थिरता सुदृढ़ करने, सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा करने और जलवायु को स्थिरता प्रदान करने में भी अहम योगदान देते हैं। फिर भी हम पेड़ों के दुश्मन क्यों बने हुए हैं, यह समझ से परे है। बीते कई बरसों से दुनिया के वैज्ञानिक, पर्यावरणविद और वनस्पति व जीव विज्ञानी चेता रहे हैं कि अब हमारे पास पुरानी परिस्थिति को वापस लाने के लिए समय बहुत ही कम बचा है। यह भी कि हम जहां पहुंच चुके हैं वहां से वापस आना आसान काम नहीं है। कारण वहां से हमारी वापसी की उम्मीद केवल और केवल पांच फीसदी से भी कम ही बची है।

दुनिया में समृद्ध जैव विविधता वाली जमीन कब्जाने की घटनाओं में साल 2008 के बाद से तेजी से बढ़ोतरी हुयी है। ये घटनायें उप सहारा अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों पर असंगत रूप से प्रभाव डालती हैं। यह प्रवृत्ति मध्य पूर्वी यूरोप, उत्तरी और लैटिन अमेरिका व दक्षिणी एशियाई इलाकों में भूमि असमानता को बढ़ा रही है। इससे जहां छोटे, मध्यम स्तर के खाद्य उत्पादकों को तेजी से अव्यवहार्य बना रही है, वहीं किसान विद्रोह, ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन, गरीबी और खाद्य असुरक्षा की भावना में बढ़ोतरी हुयी है। इस बारे में मानसिक स्वास्थ्य की जानी मानी प्रोफेसर एंड्रिया मेचली का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में हम वैश्विक स्तर पर जैव विविधता में तेजी से गिरावट को देख रहे हैं। जैव विविधता न सिर्फ हमारे प्राकृतिक वातावरण के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि ऐसे वातावरण में रहने वाले लोगों के मानसिक कल्याण के लिए भी उतनी ही अहम है। इसलिये इस बात पर गंभीरता से विचार किये जाने की जरूरत है कि जैव विविधता धरती और मानव स्वास्थ्य के लिए सह-लाभ के तत्व हैं और इसे महत्वपूर्ण बुनियादी मान कर इसकी रक्षा करनी चाहिए। 

-ज्ञानेन्द्र रावत
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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