जब पैसे की तंगी के कारण रणजी ट्रॉफी में नहीं खेल सकी राजस्थान टीम, उदयपुर के महाराणा भगवत सिंह बने सहारा

साठ के दशक में हुई स्वर्णिम दौर की शुरुआत, 8 बार खेला फाइनल, दुर्रानी बने पहले टेस्ट क्रिकेटर

जब पैसे की तंगी के कारण रणजी ट्रॉफी में नहीं खेल सकी राजस्थान टीम, उदयपुर के महाराणा भगवत सिंह बने सहारा

भगवत सिंह ने 1955 में राजपूताना क्रिकेट संघ की कमान संभाली और उदयपुर में रणजी ट्रॉफी मैचों के आयोजन की शुरुआत की। इससे पहले 20 साल तक ये मैच अजमेर में ही खेले जाते थे।

जयपुर। राजस्थान क्रिकेट संघ आज भले ही करोड़ पति खेल संघ बना हो लेकिन एक वो दौर भी था, जब पैसे की तंगी के चलते यहां की क्रिकेट टीम रणजी ट्रॉफी में भी हिस्सा नहीं ले सकी। ऐसा एक नहीं कई बार हुआ। 1940 से 1955 से बीच आधा दर्जन से ज्यादा बार ऐसा मौका आया जब आर्थिक तंगी के कारण टीम राष्ट्रीय प्रतियोगिता में भाग नहीं ले सकी। इस तरह 1935 से 1955 के बीच 20 साल में राजपूताना टीम को सिर्फ 16 रणजी ट्रॉफी मैच ही खेलने का मौका मिल सका। इस दौरान महाराणा भगवत सिंह मेवाड़, महाराजा किशनगढ़ सुमेर सिंह, जीआर नायडू और एनपी केसरी ने राजस्थान टीम की कप्तानी की। 

महाराणा भगवत सिंह ने संभाली क्रिकेट की कमान
आखिर राजपूताना टीम का आर्थिक संकट दूर करने के लिए मेवाड़ के महाराणा भगवत सिंह आगे आए। भगवत सिंह ने 1955 में राजपूताना क्रिकेट संघ की कमान संभाली और उदयपुर में रणजी ट्रॉफी मैचों के आयोजन की शुरुआत की। इससे पहले 20 साल तक ये मैच अजमेर में ही खेले जाते थे। भगवत सिंह ने संघ का अध्यक्ष रहते टीम की कप्तानी भी की और उत्तर प्रदेश के खिलाफ रणजी मैच उदयपुर में खेला गया। ड्रॉ रहे इस मैच में अर्जुन सिंह ने शतक बनाया। अतीक हुसैन और जीआर नायडू भी इस मैच में खेले। 

आरसीए के गठन से हुई नई शुरुआत
1956 में उत्तर प्रदेश के खिलाफ मैच के साथ ही राजपूताना क्रिकेट संघ का 21 वर्ष का सफर खत्म हो गया और राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन (आरसीए) का गठन हुआ। इसके साथ ही राजस्थान में क्रिकेट की नई शुरुआत हुई। महाराणा भगवत सिंह आरसीए के पहले अध्यक्ष और एलएन माथुर सचिव बने। राजस्थान टीम में भी नये बदलाव हुए। वीनू मांकड़, सरदेसाई, जीआर रामचन्द्र, सलीम दुर्रानी, बीबी निम्बालकर और एसडी धनवाडे सरीखे पेशेवर खिलाड़ी राजस्थान से खेले। राजस्थान के महाराणा भगवत सिंह, किशन रूंगटा, राज सिंह, डूंगरपुर और अतीक हुसैन भी टीम में थे। 

और आया 60 के दशक का स्वर्णिम दौर
साठ का दशक राजस्थान की क्रिकेट के लिए स्वर्णिम समय रहा। 1960-61 के सत्र में राजस्थान पहली बार रणजी ट्रॉफी के फाइनल में पहुंचा और 1973-74 तक राजस्थान ने आठ बार इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता का फाइनल खेला। इस दौरान दो बार किशन रूंगटा और तीन-तीन बार राजसिंह डूंगरपुर और हनुमंत सिंह राजस्थान टीम के कप्तान रहे। जयपुर के गणपति नगर रेलवे ग्राउण्ड के साथ ही उदयपुर ने भी रणजी ट्रॉफी फाइनल की मेजबानी की। यही नहीं इस दौरान सलीम दुर्रानी राजस्थान के पहले टेस्ट क्रिकेटर बने। उनके बाद हनुमांत सिंह को भी भारत की टेस्ट टीम में शामिल किया गया।

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