भागीरथी प्रयासों से हासिल होंगे स्तनपान के लक्ष्य

भारत में हर साल लगभग 99,499 बच्चों की मौत निमोनिया और डायरिया जैसे रोगों के कारण होती है

भागीरथी प्रयासों से हासिल होंगे स्तनपान के लक्ष्य

डब्ल्यूएचओ जन्म के एक घंटे के भीतर शिशु को मां का दूध पिलाने की भी सिफारिश करता है, क्योंकि गर्भावस्था की समाप्ति पर बनने वाला पीला, गाढ़ा दूध नवजात शिशु के लिए बिल्कुल उपयुक्त आहार होता है।

भारत का लक्ष्य वर्ष 2025 तक सिर्फ स्तनपान कराने की दर में वृद्धि करते हुए उसे 69 प्रतिशत तक लाना है। इसके लिए बच्चों में कुपोषण के अधिक मामलों वाले राज्यों में शिशुओं को केवल स्तनपान कराए जाने को प्रोत्साहन देने की जरूरत है। भारत में कुपोषण के भारी दबाव और पांच साल से कम उम्र वाले बच्चों की मौत का प्रमुख कारण निमोनिया और डायरिया होने के कारण स्तनपान को प्रोत्साहन दिए जाने की बहुत अधिक आवश्यकता है। संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल लगभग 99,499 बच्चों की मौत निमोनिया और डायरिया जैसे रोगों के कारण हो जाती है। जिनकी रोकथाम स्तनपान के जरिए आसानी से की जा सकती है। रिपोर्ट में यह अनुमान भी व्यक्त किया गया है कि अपर्याप्त स्तनपान के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को 14 बिलियन डॉलर का खामियाजा उठाना पड़ सकता है। बच्चों के लिए स्तनपान कितना जरूरी है, इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ  शिशु के जन्म के बाद वाले शुरुआती छह महीनों के दौरान उसे केवल मां का दूध पिलाने तथा किसी भी तरह का अतिरिक्त आहार न देने और यहां तक कि पानी तक नहीं पिलाने की सलाह देते हैं।

डब्ल्यूएचओ जन्म के एक घंटे के भीतर शिशु को मां का दूध पिलाने की भी सिफारिश करता है, क्योंकि गर्भावस्था की समाप्ति पर बनने वाला पीला, गाढ़ा दूध नवजात शिशु के लिए बिल्कुल उपयुक्त आहार होता है। जन्म के बाद वाले छह महीनों के दौरान शिशु को केवल मां का दूध पिलाना चाहिए और उसके बाद उसे दो साल का होने तक या उसके बाद भी उचित पूरक आहार के साथ-साथ मां का दूध पिलाना जारी रखना चाहिए। डब्ल्यूएचओ ने शुरुआती छह महीनों के दौरान केवल मां का दूध पिलाने की दर में वर्ष 2025 तक कम से कम 50 प्रतिशत तक वृद्धि किए जाने का लक्ष्य निर्धारित किया है, भारत ने भी इस पर हस्ताक्षर किए हैं। जिन देशों में शिशुओं को केवल मां का दूध पिलाने की दर 50 प्रतिशत या उससे ज्यादा है, उन्हें इसमें प्रति वर्ष 1.2 प्रतिशत की दर से वृद्धि किए जाने का लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। भारत में शिशुओं को केवल स्तनपान कराने की दर वर्ष 2006 में 46.4 प्रतिशत थी, जो वर्ष 2017 में बढ़कर 54.9 प्रतिशत हो गई। इसी अवधि के दौरान प्रारंभ में स्तनपान शुरू कराने की दर 23.4 प्रतिशत से लगभग दोगुना बढ़कर 41.6 प्रतिशत हो गई। भारत का लक्ष्य वर्ष 2025 तक सिर्फ  स्तनपान कराने की दर में वृद्धि करते हुए उसे 69 प्रतिशत तक लाना है।

अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (आईएफपीआरआई) की रिपोर्ट में कहा गया है कि शिशुओं को स्तनपान कराने के मामले में सबसे ज्यादा तेज गति से वृद्धि गोवा, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश और त्रिपुरा में हुई है। गोवा में शिशुओं को स्तनपान कराने की दर में जबरदस्त वृद्धि हुई है। हालांकि भारत में संतोषजनक स्थिति नहीं है। मेघालय, नागालैंड, पुड्डुचेरी, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में केवल स्तनपान की दर 50 प्रतिशत से भी कम है। सबसे ज्यादा आबादी और कुपोषण के भारी दबाव वाले राज्य उत्तर प्रदेश में शिशुओं को केवल स्तनपान कराने की दर बहुत कम 41.6 प्रतिशत है। जिन अन्य राज्यों में केवल स्तनपान कराने की दर कम है, उनमें अरुणाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, केरल और पश्चिम बंगाल शामिल हैं। शिशुओं को केवल मां का दूध पिलाए जाने के महत्व को पहचानते हुए भारत सरकार ने हाल के वर्षों में केवल स्तनपान को बढ़ावा दिए जाने को प्राथमिकता दी है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने स्तनपान के फायदों के बारे में माताओं के बीच जागरुकता उत्पन्न करने के लिए प्रमुख कार्यक्रम मदर्स एब्सोल्यूट एफेक्शन (मां) का शुभारंभ किया था। 

मातृत्व अवकाश की अवधि बढ़ाकर 26 हफ्ते किए जाने के फैसले ने भी माताओं को छह महीने तक शिशु को केवल अपना दूध पिलाने में मदद की है। हालांकि भारत में अधिकांश महिलाएं असंगठित क्षेत्र में काम करती हैं और उन्हें घर का भी बहुत सारा काम करना होता है। इसे देखते हुए तत्काल ऐसे कदम उठाने की आवश्यकता है, जिनसे अनियमित क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं द्वारा अपने शिशुओं को स्तनपान कराने में वृद्धि हो सके।

मातृत्व लाभ कार्यक्रम को संभवत: इस दिशा में उठाया गया सही कदम करार दिया जा सकता है, जिसके तहत मजदूरी में होने वाली हानि की भरपाई के लिए 6000 रुपए की नगद राशि हस्तांतरित की जाती है। हालांकि कुछ विशेषज्ञ इस योजना के अंतर्गत आवंटित धन को नाकाफी मानते हैं। सरकार को ऐसे समाधान तलाशने की जरूरत है, जिनसे अनियमित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को सशक्त बनाया जा सके तथा पुरुष और महिला के बीच घर के कामकाज का न्यायसंगत बंटवारा करने को प्रोत्साहित कर सकें। स्तनपान के लिए विश्व स्वास्थ्य सभा के लक्ष्य को पूरा करने के लिए सरकार को स्तनपान को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है।

-अमित बैजनाथ गर्ग
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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