जानें इंडिया गेट में आज है खास...

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असर तो यहां भी!, फिर से सुगबगाहट!, तैयार रहें..., सब कुछ गड्मड्!, चरम पर कूटनीति!, रुतबा लौट रहा?

असर तो यहां भी!
दस मार्च को भले ही चुनाव परिणाम यूपी, पंजाब समेत पांच राज्यों के आएंगे। लेकिन इसका असर राज्य की राजनीति पर भी होने की संभावना! सत्ताधारी कांग्रेस एवं विपक्षी भाजपा के आंतरिक समीकरणों पर इन नतीजों का प्रभाव पड़ेगा। यह तय। जहां कांग्रेस में सचिन पायलट गुट के मुखर होने के आसार। तो भाजपा में पूर्व सीएम राजे आठ मार्च से ही अपने जन्मदिन के बहाने शक्ति प्रदर्शन और सक्रिय होने का संदेश देंगी। सो, मरुधरा में राजनीतिक रुप से बहुत कुछ दिलचस्प होने के आसार। हालांकि भाजपा एवं कांग्रेस नेतृत्व द्वारा इनके बाद गुजरात चुनाव की रणनीति पर गंभीरता से विचार किए जाने की संभावना। क्योंकि गुजरात विधानसभा चुनाव दोनों ही दलों के लिए नाक का सवाल बनेगा। जहां भाजपा की ही नहीं। कांग्रेस की भी राजनीतिक प्रतिष्ठा दांव पर होगी। लेकिन सीएम पायलट और पूर्व सीएम राजे के चुनाव बाद भावी कदम की ओर निगाहें दिल्ली तक की रहेंगी। यह पक्का। सो, बहुत कुछ होने के लिए इंतजार किया जाए।


फिर से सुगबगाहट!
पिछले साल मार्च में राजस्थान में कांग्रेस सरकार सचिन पायलट की बगावत के चलते हिल डुल गई। बड़ी मुश्किल से बात पटरी पर आ पाई। अब फिर से वही हालात बनने के आसार। गहलोत सरकार ने हाल ही में राजनीतिक नियुक्तियां कीं। इसमें कुछ ईनाम पा गए। कुछ छूट गए। दावा किया गया कि इन नियुक्तियों में पूरा संतुलन रखा गया। लेकिन कुछ पायलट समर्थक नेताओं ने सरकार की नियुक्ति को ठुकरा दिया। इससे कांग्रेस नेतृत्व सकते में। क्योंकि पांच राज्यों के चुनाव परिणाम बुधवार को आ रहे। इसके असर से राज्य की कांग्रेस और सरकार कैसे बची रहेगी? उसी की सुगबुगाहट। कहीं पायलट फिर से नाराज हो गए तो? क्योंकि जो चुनाव पूर्व अनुमान लगाए जा रहे। वह कम से कम कांग्रेस के लिए तो शुभ संकेत नहीं दे रहे। ऐसे में, भले ही सीएम गहलोत ने मीडिया के सामने बीते दिल्ली दौरे में मुस्कान बिखेरी हो। लेकिन हंसी के पीछे भी बहुत कुछ। आखिर राजनीति की चौसर जो बिछ रही।


तैयार रहें...
बेसब्री से इंतजार। लेकिन इससे ठीक पहले और बाद में कुछ सवालों, आरोपों, बयानों एवं दावों के लिए भी तैयार रहें। और इसी से हार जीत ही नहीं राजनीतिक संकेत भी। गांवों में वोट नहीं डालने दिया। ईवीएम खराब थी। उसमें गड़बड़ी की गई। ईवीएम की सुरक्षा पर सवाल। अंत में मतगणना के दिन भी आरोप दर आरोप। बयान पर बयान। अगर ऐसा हो तो समझ लें। कौन हार रहा। कौन जीत रहा। बचपन में कई बच्चे शिकायत किया करते हैं। प्रश्नपत्र में सवाल आउट आॅफ कोर्स आए। गुरुजी ने देर से पर्चा बांटा। या फिर समय से पहले उत्तर पुस्तिका छीन ली गई ... वगैरह, वगैरह! अभिभावक समझ जाते थे। बच्चा शिकायत क्यों कर रहा। असल में, बीते कुछ सालों से चुनाव हारने वाले दलों का ऐसा ही रवैया। सो, जनता भी ऐसे बयानो का इंतजार कर रही। इसके अलावा बचाव का पैंतरा भी क्या? वैसे भी कोरोनाकाल ने बता दिया। आम जनता के दुख दर्द में कौन भागीदार बना और कौन नहीं।

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सब कुछ गड्मड्!
महाराष्ट्र में सब कुछ गड्मड् हो रहा। ईडी और आईटी के रडार पर शिवसेना, एनसीपी के नेता भी। नवाब मलिक हों या सेना के खंजाची। ताबड़तोड एक्शन। इससे इनकी केन्द्र के प्रति तल्खी बढ़ रही। फिर शरद पवार का नरम-गरम होना। तो संजय निरुपम का बढ़ चढ़कर हमलावर होना। यहां तक कि राज्य का डीजीपी बदल दिया गया। फिर मुंबई नगर निगम के चुनाव नजदीक। शिवसेना की सांस अटकी हुई। एक तो भाजपा उसका वोट हथियाने को आतुर। और खुद सेना का कैडर ही विचारधारा के स्तर पर असमंजस में। क्योंकि निगम चुनाव सिंबल के साथ मुद्दे और व्यक्ति आधारित भी। भाजपा विरोध और सेकुलेरिज्म के फेर में शिवसेना, कांग्रेस एवं एनसीपी के साथ हो ली। लेकिन अब जमीन पर उसका परिणाम देखने को मिलेगा। कांग्रेस एकला चलो की ओर। तो एनसीपी में देर सबेर नेतृत्व को लेकर संकट खड़ा होने जा रहा। जबकि सेना में भी मनसे का एंगल। मतलब सब कुछ गड्मड् हो जा रहा। हां, भाजपा तमाशा देखने को लालायित!


चरम पर कूटनीति!
भारत की कूटनीतिक परीक्षा इन दिनों चरम पर। अमरीका की अगुवाई में नाटो देश। तो रूस एवं चीन की गलबहियां देखने को मिल रहीं। भारत का रूस की ओर झुकाव दिख रहा। अमरीका की तमाम कोशिशें भारत को उसके पाले में नहीं कर पा रहीं। लेकिन खुले में तटस्थ। रूस ने यूक्रेन में जो किया। उसके बाद यूएनओ की प्रासंगिकता पर फिर से सवाल। जो बाइडेन कमजोर दिख रहे। तो पुतिन मजबूत होकर दुनियां के फलक पर उभर रहे। अमरीकी न चीन को साध पा रहा। न रूस को रोक पा रहा। सिवाए गीदड़ भभकी देने के। यूक्रेन को फंसा अलग से दिया। मतलब यह भारत के लिए भी सीख। अमरीका के साथ किस स्तर का रिश्ता रखा जाए। हाल में अमरीका, अफगानिस्तान में भी ऐसा कर चुका। हां, इस दौरान दुनियां के बड़े नेताओं ने जरुर मोदीजी की ओर राह ताकी। सो, उन्होंने पुतिन, यूक्रेनी और फ्रांस समेत अन्य देशों के मुखियाओं से बात की। मतलब भारत की डिप्लोमेसी टॉप गियर में!


रुतबा लौट रहा?
राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन की अगुवाई में रूस का दुनियां में रूआब बढ़ रहा? उन्होंने तमाम विरोध, दबाव एवं चौतरफा घिरने के बावजूद यूक्रेन पर हमला कर डाला। लगातार आगे बढ़ रहे। जिससे विश्व बिरादरी डरी, सहमी हुई। अब तो उन्होंने आण्विक सैन्य टुकड़ी को भी अलर्ट मोड पर कर दिया। पुतिन रूसी खुफिया एजेंसी केजीबी में अधिकारी रह चुके। वह अमरीका समेत दुनिया के अन्य ताकतवर देशों के पैंतरों से परिचित। सो, क्या वह सोवियत संघ का गौरव एवं रूतबा लौटा रहे? पुतिन के एक्शन से तो यही लग रहा। आज अमरीका कमजोर और रूस आक्रामक नजर आ रहा। पुतिन पर न यूएनओ और न नाटो की चेतावनियों एवं धमकियों का असर हो रहा। वह अपने अभियान पर आगे बढ़े चले जा रहे। दुनियां सकते में! पुतिन कहां जाकर रूकेंगे? हालांकि वह तैयारी बहुत पहले से कर रहे थे। लेकिन अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडेन को इस स्तर की कल्पना नहीं रही होगी। अब उन्हें चीन द्वारा वियतनाम में दखल का डर सता रहा!

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