नई मौद्रिक नीति में महंगाई नियंत्रण को प्राथमिकता

यथास्थिति बनाए रखने को महत्व दिया गया था

नई मौद्रिक नीति में महंगाई नियंत्रण को प्राथमिकता

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी नई मौद्रिक नीति में महंगाई नियंत्रण को प्राथमिकता दी गई है, जो कि पूर्व में घोषित मौद्रिक नीति की तुलना में विपरीत दिशा प्रदान करती है।

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी नई मौद्रिक नीति में महंगाई नियंत्रण को प्राथमिकता दी गई है, जो कि पूर्व में घोषित मौद्रिक नीति की तुलना में विपरीत दिशा प्रदान करती है। देश में कोरोना काल के अंतर्गत घोषित मौद्रिक नीति में यथास्थिति बनाए रखने को महत्व दिया गया था तथा महत्वपूर्ण दरें जैसे रेपो दर, रिवर्स रेपो व नकद कोष अनुपात में परिवर्तन नहीं किया गया, ताकि ऋणों पर ब्याज दरें संतुलित व युक्तिसंगत बनी रहे तथा ऋण लेने की लागत नहीं बढ़े,ऋण उठाव क्षमता आर्थिक रिकवरी को बढ़ाने में मददगार बने। इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए रेपो दर 4 प्रतिशत रिवर्स रेपो दर को 3.6 प्रतिशत तथा नगद कोष अनुपात को 4 प्रतिशत रखा गया था, लेकिन हाल ही हुए घोषित मौद्रिक नीति अचानक 0.4 प्रतिशत वृद्धि की गई तथा नगद कोष अनुपात भी 0.5 प्रतिशत से बढ़ा दिया गया है। यह अनुमान से अधिक है इसका वास्तविक असर 6 से 8 माह के अंतराल में नजर आएगा। रेपो दर वह दर होती है जिस पर केंद्रीय बैंक वाणिज्यिक बैंकों को पैसा उधार देता है जिसका प्रत्यक्ष संबंध ऋणों की लागत से होता है चाहे वह ऋण किसी भी क्षेत्र के लिए लिया गया हो। यदि यह दर बढ़ती है तो कृषि, उद्योग, व्यापारी, उपभोक्ता आदि सभी ऋणों की ब्याज दर बढ़ जाती है तथा उधार लेने की लागत बढ़ जाती है। वाणिज्यिक बैंक इस रेपो दर के आधार पर प्राइम लेंडिंग ब्याज दर निर्धारित करती हैं, जो कि निश्चित रूप से बढ़ जाती है। नगद कोष अनुपात बढ़ता है तो बैंकों की तरलता प्रभावित होती है तथा उन्हें अधिक नगद कोष बैंक में रखने होते हैं तथा आय कुछ भी नहीं होती है। वर्तमान मौद्रिक नीति हुए परिवर्तनों से ग्रह, वाहन आदि के लिए लिए गए ऋणों पर अधिक ब्याज आएगा तथा एमआई में वृद्धि होगी एवं भविष्य में उपभोक्ताओं को ऋण लेना महंगा हो जाएगा तथा ऋण उठाव क्षमता कम होगी। क्रेडिट कार्ड महंगा हो जाएगा। यह अनुमान लगाया गया है कि 15 वर्षों के लिए एक करोड़ के लिए गए गृह ऋण पर प्रति माह ईएमआई में 2176 रुपए की वृद्धि हो जाएगी।

विश्व में ब्याज दरों में वृद्धि हो रही है विश्व के देशों में संयुक्त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा आदि देशों में 0.25 से 1 प्रतिशत या अधिक की ब्याज दर में वृद्धि की गई है। महंगी मौद्रिक एवं ऋण नीति की आवश्यकता इसलिए हो गई है ताकि विश्व में महंगाई को नियंत्रित किया जा सकें तथा मांग पर नियंत्रण हो। अभी रूस यूक्रेन युद्ध का कोई भी हल नहीं निकला है इसका दुष्प्रभाव खाद्य एवं कच्चे तेल की बढ़ती हुई कीमतों के रूप में आ रहा है। आपूर्ति में बाधा उत्पन्न हो रही है ।अंतरराष्ट्रीय भुगतान अटक गए हैं। माल वाहन एवं बीमा जोखिम लागतों लगातार बढ़ गई है। लॉजिस्टिक लागत में तेजी से वृद्धि हुई है, जो कि लगभग 20 प्रतिशत या अधिक हो गई है, तो विश्व में लगातार इस मुल्य वृद्धि का दबाव बढ़ता जा रहा है। माल की आपूर्ति में व्यवधान उम्पन्न होने तथा महंगा आयात होने से देश में मांग पूर्ति असंतुलन पैदा होता है जिसका सीधा संबंध लागत एवं मूल्य वृद्धि से है।

महंगाई को नियंत्रित करने में मौद्रिक एवं वित्तीय नीति की भूमिका प्रधान मानी जाती है, लेकिन समस्या यह है कि इनमें परस्पर समन्वय का अभाव पाया जाता है। अनेक अवसरों पर यह नीति परस्पर विरोधी हो जाती है, तो मूल्य वृद्धि के प्रभाव बढ़ जाते हैं। मौद्रिक नीति से ब्याज दर प्रभावित होती है चाहे जमा दर हो या उधार दर हो। एक तरफ  यदि ऋण दर बढ़ेगी, तो बैंकों को स्थाई जमा पर ब्याज दर को भी बढ़ाना होगा। देश में 5 वर्ष की स्थाई जमा पर ब्याज दर में 0.5 प्रतिशत तक की वृद्धि हो जाएगी। यदि स्थाई जमा पर ब्याज दर बढ़ती है तो भविष्य निधि पर देय ब्याज भी बढ़ जाती है तथा सभी प्रकार की बचत योजनाओं पर ब्याज का भार बढ़ जाता है। स्थाई बचत करने वालों की आय बढ़ जाती है, लेकिन सरकार पर सार्वजनिक ऋणों पर ब्याज का भार बढ़ जाता है। भारत में महंगाई नियंत्रण को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। मौद्रिक नीति उत्पादन लागत से बढ़ाएगी। ऐसे में वित्तीय नीति, जो कि केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा घोषित की जाती है तथा जिसका संबंध कर, व्यय एवं ऋण तथा बजट नीति से होता है। देश में पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस, खाधान्न एवं खाद्य पदार्थ, दूध, फल एवं सब्जियां, दालें, खाद्य तेल आदि अत्यधिक संवेदनशील वस्तु में मानी जाती है, जो कि महंगाई को बढ़ाती है तथा उपभोक्ताओं की जेब पर अतिरिक्त भार डालती है। कोरोना काल में असंगठित मजदूरों के रोजगार छिन गए हैं, उस सीमा तक रोजगार सृजन नहीं हो पाया है।

आज भारत में आयातित कच्चा तेल महंगा होने से पेट्रोल एवं डीजल, रसोई गैस आदि के दाम बढ़ रहे हैं लेकिन दूसरा पक्ष उत्पाद एवं वैट दरें हैं, जो कि कम करने की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री का कहना है कि केंद्र ने पेट्रोल एवं डीजल के दाम कम किए, लेकिन अनेक राज्यों ने केंद्र की नीति का अनुपालन नहीं किया तो उपभोक्ताओं को उचित लाभ नहीं मिल पाया। कृषि क्षेत्र में आयातित उर्वरक के मूल्य में बढ़ रहे हैं, उर्वरकों के आयात की लागत बढ़ रही है तथा उर्वरकों पर सरकारी सब्सिडी का भार बढ़ रहा है। इंडोनेशिया ने पाम आयल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है, जो कि देश में पाम आयल के आयात को बाधित करेगा। ऐसे में मौद्रिक एवं वित्तीय नीति यह दूसरे के पूरक बनकर महंगाई को नियंत्रित करें तथा ब्याज दरों के घटने के साथ-साथ जीएसटी दरों में अपेक्षा के अनुरूप बदलाव की आवश्यकता है।   

- डॉ. सुभाष गंगवाल
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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