संसद की मर्यादा

मानसून सत्र की शुरूआत हो चुकी है

संसद की मर्यादा

सारे सदस्यों के भाषण दस्तावेज रूप में संकलित होती है। यदि अध्यक्ष की व्यवस्था को सही मान लिया जाए तो यह स्पष्ट भी किया जाना चाहिए कि जब संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण होता है, तो उसमें से उन असंसदीय शब्दों को कैसे छांटा जाएगा, संभवत: इसके लिए कोई तकनीकी व्यवस्था की गई हो।

संसद की लोकतांत्रिक मर्यादा का पालन सभी सांसदों को करना चाहिए। हाल के वर्षों में देखने को आया है कि सरकार की कोशिश बिना पर्याप्त बहस अधिक से अधिक कानून बनाने की होती है तो विपक्ष का प्रयास संसद की कार्रवाई को हंगामा कर बाधित करने की होती है। कोई नहीं चाहता कि संसद में जन मुद्दों पर बहस हो। अब सोमवार 18 जुलाई से मानसून सत्र की शुरूआत हो चुकी है और आज ही राष्ट्रपति चुनाव भी है। अब इस सत्र में भी विपक्ष ने जहां हंगामा की तैयारी की है, वहीं सरकार की तैयारी शांतिपूर्ण ढंग से संसद को चलाने की है। वैसे भी संसद को शांतिपूर्ण ढंग से चलाने की बड़ी जिम्मेदारी सत्ता पक्ष की ही होती है। अब सत्ता पक्ष ने इस बार सत्र से ठीक पहले असंसदीय शब्दों को लेकर लोकसभा सचिवालय ने एक पुस्तिका तैयार की है। अभी जिन शब्दों को असंसदीय करार दिया गया है, उसे लेकर विपक्ष खासा नाराज हैं। विपक्ष का कहना है कि उन्हीं शब्दों असंसदीय करार दिया गया है, जो सरकार के व्यवहार और कामकाज को लेकर प्राय: प्रयुक्त होते रहे हैं। विपक्ष का कहना हैं वह उन शब्दों का इस्तेमाल करेगा, अगर सदन को उन्हें निकालना है, तो निकाल दें। इस पर लोकसभा अध्यक्ष ने कहा है दरअसल असंसदीय करार दिए गए शब्दों के प्रयोग पर रोक नहीं है, उन्हें सदन के दस्तावेज में शामिल नहीं किया जाएगा। विपक्ष इस बात को भी स्वीकार नहीं करेगा। क्योंकि संसद की सारी कार्यवाही दर्ज होती है। सारे सदस्यों के भाषण दस्तावेज रूप में संकलित होती है। यदि अध्यक्ष की व्यवस्था को सही मान लिया जाए तो यह स्पष्ट भी किया जाना चाहिए कि जब संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण होता है, तो उसमें से उन असंसदीय शब्दों को कैसे छांटा जाएगा, संभवत: इसके लिए कोई तकनीकी व्यवस्था की गई हो। मगर विवाद इस बात को लेकर नहीं है कि वे शब्द संसदीय दस्तावेजों में शामिल किए जाएंगे या नहीं, विवाद इस बात को लेकर है कि जिन शब्दों को असंसदीय करार दिया गया है, उसके पीछे तर्क क्या है? उन शब्दों या पदों के प्रयोग के बिना सरकार की आलोचना कैसे संभव हो सकेगी? क्या सरकार परोक्ष रूप से उन शब्दों और पदों को असंसदीय करार देकर एक प्रकार से संसद में अपनी आलोचना पर रोक लगाने का प्रयास कर रही है। सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि सरकार विपक्ष के जिन शब्दों का इस्तेमाल करती है उन्हें असंसदीय नहीं ठहराया गया है। इसमें कुछ शब्दों को लेकर काफी बहस हो रही है कि वे कैसे असंसदीय हो सकते हैं-जैसे तानाशाही या तानाशाह। इस शब्द का प्रयोग तो दोनों पक्ष खूब करते हैं। मर्यादाएं दोनों तरफ से टूटती हैं। शब्दों का कोई मतलब नहीं, लेकिन संसद की मर्यादा बची रहनी चाहिए।

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