सतरंगी सियासत

राज्य में अब जब नई भाजपा-शिंदे गुट की सरकार बन गई

सतरंगी सियासत

पवार डरे हुए इतने कि एनसीपी की सारी इकाईयां भंग कर दीं। उनके भतिजे अजित पवार कह चुके जांच एजेंसी अपना काम कर रही। इसमें दिक्कत क्या?

पवार मौन!
मराठा क्षत्रप शरद पवार ने अभी तक शिवसेना सांसद संजय राउत की गिरफ्तारी पर मुंह तक नहीं खोला। जबकि राउत उनके लाडले। पवार डरे हुए इतने कि एनसीपी की सारी इकाईयां भंग कर दीं। उनके भतिजे अजित पवार कह चुके जांच एजेंसी अपना काम कर रही। इसमें दिक्कत क्या? राजनीतिक विरासत को लेकर परिवार में मतभेद अलग से चल रहा। फिर दिल्ली से विभिन्न मामलों में ईडी का शिकंजा कसता ही जा रहा। राज्य में अब जब नई भाजपा-शिंदे गुट की सरकार बन गई। तो एनसीपी के विधायक भी छिटकने की फुसफुसाहट! यहां तक कि चाणक्य वाला तमगा भी जाने की नौबत। क्योंकि नए सीएम शिंदे खुद मराठा। ऊपर से नए विधानसभा अध्यक्ष और सत्ताधारी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी मराठा ही। सो, अब कोई यह आरोप भी नहीं लगा सकता कि मराठाओं की उपेक्षा हो रही। मतलब पवार चारों से घिरते जा रहे। ऐसे में भाजपा लगातार दबाव बढ़ा रही। इसीलिए संजय राउत पर पवार का मुंह नहीं खोलना। जानकारों को अखर रहा।

पांच अगस्त...!
कांग्रेस ने बीते शुक्रवार महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ काले कपड़े पहनकर राजधानी की सड़कों पर विरोध क्या किया। भाजपा ने इसे ‘ब्लैक फ्राइडे’ बताते हुए ट्वीस्ट कर डाला। कांग्रेस को यकायक जवाब देते नहीं बना। असल में, कांग्रेस नेताओं को भाजपा की ओर से ऐसे पलटवार की उम्मीद नहीं थी। क्योंकि पांच अगस्त को ही जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद- 370 का खात्मा हुआ। अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए शिलान्यास भी हुआ। ऐसे में भाजपा ने सवाल उठा दिया। कांग्रेस ने पांच अगस्त का दिन ही विरोध के लिए क्यों चुना? पांच अगस्त अब ऐतिहासिक दिन। शाह को आशंका। महंगाई बेरोजगारी तो बहाना। विरोध तो गांधी परिवार पर ईडी के कसते शिकंजे का। इससे पहले कांग्रेस पर सवाल उठा। वह आम जनता की समस्याओं के लिए क्यों नहीं सड़कों पर उतरती? सारी शक्ति गांधी परिवार के बचाव में क्यों लगाई जा रही। अब जब कांग्रेस सड़क पर उतरी। तो भाजपा ने इसे ‘ब्लैक फ्राइडे और पांच अगस्त’ से जोड़ दिया।

दीदी की मुसीबत!
आजकल ममता दीदी के हावभाव बता रहे। वह ढीली पड़ चुकीं। ईडी का शिकंजा कसता जा रहा। पार्थ चटर्जी और अर्पिता मुखर्जी के भ्रष्टाचार की परतें ज्यों-ज्यों उघड़ रहीं। किसी को कल्पना भी नहीं होगी। टीएमसी में नंबर दो हैसियत रखने वाले पार्थ मंत्री पद ही नहीं पार्टी से भी बाहर। अब उनके विधायकी छोड़ने की भी चर्चा। दीदी चार दिन के दौरे पर दिल्ली तो आईं। लेकिन बात नहीं बनी। असल में, पार्थ तो बहाना। जांच की आंच खुद ममता दीदी और उनके भतिजे अभिषेक तक पहुंच रहीं। अभिषेक की पत्नी भी जांच एजेंसी के लपेटे में। सो, ममता की प्राथमिकता अपने परिवार को बचाने में। यह पार्थ भी समझ रहे। इसीलिए अब उनके और अर्पिता के सरकारी गवाह बनने की चर्चा। सवाल यह कि ऐसा हुआ तो बात कहां तक पहुंचेगी? पिछले साल मई की शुरूआत में जिस धमक के साथ दीदी बंगाल में सत्तारूढ़ हुई। अब वह कहीं तिरोहित होती नजर आ रही। और भाजपा लगातार पैठ बना रही।

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आरसीपी बनेंगे ‘शिंदे’?
आखिरकार आरसीपी सिंह ने जदयू से विदाई ले ली। इसकी आशंका संभावना तभी से। जब उन्हें मंत्री होने के बावजूद नितिश कुमार ने राज्यसभा नहीं भेजा था। अब सवाल उठ रहा। क्या आरसीपी सिंह नितिश कुमार के लिए ‘शिंदे’ बनेंगे? उन्होंने नया दल बनाकर ताल ठोंकने का ऐलान कर दिया। अब कितनी सफलता मिलेगी। यह समय बताएगा। क्योंकि सिंह मूलत: राजनेता नहीं बल्कि नौकरशाह। लेकिन जिस तरह से उन्होंने बिना नितिश को भरोसे में लिए जदयू के कोटे से केन्द्र सरकार में मंत्री पद लिया। तभी से खटास बढ़ गई। इससे पहले ऐन चुनाव के मौके पर नितिश के दबाव में भाजपा को लोजपा को राजग से बाहर करना पड़ा। लोजपा प्रमुख चिराग पासवान अब अकेले पार्टी सांसद बचे रह गए। उनके चाचा ने अलग गुट बना लिया। ऐसे में क्या आरएसीपी सिंह भी जदयू में तोड़फोड़ कर पाएंगे? क्योंकि यदि नितिश कुमार भाजपा से छिटके तो चुनावी मौके पर चिराग पासवान और आरसीपी सिंह का भाजपा के पाले में आना तय!

क्या होगा?
तो जगदीप धनखड़ अब देश के नए उपराष्ट्रपति। वह एक नए नए शक्ति केन्द्र के रूप में भी उभरेंगे। ऐसा अनुमान। ऐसा भी कहा जा रहा। धनखड रबड़ स्टैंप बनकर नहीं रहेंगे। क्योंकि ऐसा उनकी फितरत में नहीं। लेकिन सवाल अपने राजस्थान की राजनीति का। जहां अगले साल विधानसभा चुनाव। अब भाजपा में ही समीकरण नहीं बदलेंगे। बल्कि कांग्रेस भी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगी। क्योंकि धनखड़ जाट समुदाय से। और यह समुदाय कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक। भाजपा वाजपेयी कार्यकाल में जाट समाज को आरक्षण देकर लुभा चुकी। अब इसी समाज से देश का उपराष्ट्रपति। सो, फर्क तो पड़ने वाला। लेकर कितना? इसके लिए सभी को इंतजार। यूपी विधानसभा चुनाव के समय जाट समाज के नेताओं ने अमित शाह से शिकायत की थी। उनकी उपेक्षा की गई। किसी भी राज्य या केन्द्र में उनका प्रभावी प्रतिनिधितव नहीं। जिसे अब उम्मीद से देकर पूरा कर दिया गया। जानकार बता रहे। निशाना राजस्थान। जहां जाट समाज से ही भाजपा में प्रदेश अध्यक्ष भी।

अपने हाल पर महबूबा!
ज्यो-ज्यों जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव की सरगर्मी बढ़ रही। पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती के बयान बता रहे। उनकी राजनीतिक सेहत ठीक नहीं। ‘हर घर तिरंगा अभियान’ की बयार में उन्होंने पुराने जम्मू-कश्मीर का झंडा ट्वीटर पर बुलंद किया। कहा, इसे कोई हमसे अलग नहीं कर सकता। हालांकि आम जनता के मूड से लग रहा। उसने महबूबा को मानो उन्हीं के हाल पर छोड़ दिया। क्योंकि अब लाल चौक समेत हर जगह तिरंगा नजर आ रहा। हालांकि एनसी के संरक्षक फारूख अब्दुल्ला ना नुकुर के साथ संतुलन बैठाते नजर आ रहे। क्योंकि बेटे उमर अब्दुल्ला के राजनीतिक भविष्य का मामला। इस बीच, सरकार अपनी गति से आगे बढ़ रही। केवल एक महबूबा मुफ्ती ही बची रह गईं। जिनके बयान अभी भी पाक को साथ लेकर कश्मीर समस्या के समाधान की पैरोकारी कर रहे। लेकिन वह अच्छे से जानती हैं। केन्द्र सरकार ऐसा कभी नहीं करेगी। और यह बात आम जनता भी समझ चुकी। इसीलिए वह केन्द्र के साथ आगे बढ़ना पसंद कर रही।

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