सतरंगी सियासत

क्या से क्या हो गया?

सतरंगी सियासत

बिहार में भाजपा नेताओं के बयान और व्यवहार बता रहा। भाजपा अभी गठबंधन तोड़ने को तैयार नहीं थी। लेकिन नितिश कुमार लगा मानो इसे ताड़ गए। सो, एक झटके में किनारा कर लिया।

क्या से क्या हो गया?
इधर, महाराष्ट्र में भाजपा-शिंदे गुट की गठबंधन सरकार बनी। उधर, बिहार में ठीक इसके उलट खेला हो गया और महागठबंधन की सरकार बन गई। वहीं, ईडी एवं सीबीआई की कार्रवाई से ममता बनर्जी को चुप कराया। अब कब कौन, कहां बोल पड़े, पता नहीं। मतलब भाजपा भी कोई कम दुश्वारियों को नहीं झेल रही। बिहार में भाजपा नेताओं के बयान और व्यवहार बता रहा। भाजपा अभी गठबंधन तोड़ने को तैयार नहीं थी। लेकिन नितिश कुमार लगा मानो इसे ताड़ गए। सो, एक झटके में किनारा कर लिया। इधर, महाराष्ट्र में भले ही मंत्रिमंडल का विस्तार हो गया। लेकिन जिस तरह से भाजपा  फूंक-फूंककर कदम आगे बढ़ा रही। उसे भावी खतरे का भान। कांग्रेस की दशा और दिशा का अभी पता नहीं। लेकिन इन दिनों एनसीपी बिल्कुल ठंडी। जब से संजय राउत जेल में। शरद पवार मौन। शिवसेना अभी घर संभालने में जुटी हुई। अब चुनाव चिन्ह भी खतरे में। और यह सब चुनाव आयोग और कोर्ट के बीच मानो पेंडूलम जैसा!


कहीं ऐसा तो नहीं!
बिहार की राजनीति अब किस कवरट लेगी। अभी इसका इंतजार करना होगा। फिलहाल तो भाजपा एवं जदयू के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर। इस बीच एक आशंका पैदा हो रही। साल 2015 में विधानसभा चुनाव से पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत का एक बयान काफी चर्चित रहा। विपक्षी नेताओं का दावा भी और आरोप भी। उनके बयान के मायने आरक्षण की समीक्षा हो। हालांकि खुद संघ और भाजपा की ओर से काफी सफाई आई। लेकिन तब तक मानो देर हो गई। और महागठबंधन सत्तारूढ़ हुआ। लेकिन अब 2022 में जेपी नढ्ढा का बयान। उनका भाजपा के मुकाबले क्षेत्रीय दलों के भविष्य में खत्म होने वाला बयान। सो, दोनों में क्या समानता? लेकिन भाजपा अध्यक्ष के बयान को विपक्षी नेता अभी से चर्चित करने में जुटे हुए। सो, कहीं यह सेल्फ गोल तो नहीं? बिहार में बदलाव से भाजपा का पहले भी खासा नुकसान हुआ। और अब कितना होगा। पता नहीं। हां, लेकिन एक काम हो गया। भाजपा अब बिहार में खुलकर बेटिंग करेगी।
नितिश विपक्षी चेहरा?
राजग छोड़ नितिश कुमार संप्रग में क्या आए। अब उन्हें साल 2024 के आम चुनाव में पीएम का विपक्षी चेहरा बताया जा रहा। पीएम मोदी और भाजपा के विरोधी अभी से ही माहौल बनाना शुरू कर चुके। लेकिन क्या सच में ऐसा हो पाएगा? फिलहाल तो नितिश कुमार इससे इनकार कर रहे। जबकि उनके डिप्टी तेजस्वी ने कहा, इसमें गलत क्या? पीएम बनने के लिए उनकी योग्यता और क्षमता में कोई कमी नहीं। वहीं, कांग्रेस का इशारा साफ। राहुल गांधी विपक्ष की ओर से पीएम चेहरा होंगे। इससे कोई समझौता नहीं होगा। फिर ममता बनर्जी क्या करेंगी? केसीआर भी मंशा जता चुके। उसके बाद शरद पवार और कितनी लंबी पंक्ति पीएम चेहरों की। लेकिन नितिश कुमार के रुप में विपक्ष को एक वजनदार अगुवा तो मिल ही गया। जिसको आगे करके कुछ तो बात बनने के आसार। वैसे देश में हर क्षत्रप पीएम बनने का सपना देख रहा। इसमें कोई बुराई भी नहीं। लेकिन जमीनी हकीकत क्या? तमाम प्रकार की बातें और सवाल!


हरिवंश बनेंगे सोमनाथ?
क्या राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश सिंह कभी लोकसभा अध्यक्ष रहे माकपा नेता सोमनाथ चटर्जी की राह पकड़ेंगे? असल में, यह चर्चा भाजपा एवं जदयू का गठबंधन टूटने के कारण हो रही। माकपा के निर्देश के बावजूद सोमनाथ चटर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष पद छोड़ने से इनकार कर दिया था। उनका तर्क था कि स्पीकर दलगत राजनीति से उपर। वह किसी भी दल के अनुशानसन में बंधा नहीं रहता। इसके बावजूद संबंधित दल के नेता की चाहत। सभापति उसका हुक्म माने। असल में, साल 2008 में भारत की अमरीका से हुई न्यूक्लियर डील पर माकपा ने संप्रग से नाता तोड़ लिया था। ठीक इसी प्रकार का अब हरिवंश का भी मामला। वह जदयू से सांसद और नीतिश कुमार के करीबी भी। लेकिन वह पद छोडेंगे या नहीं। अभी इंतजार करना होगा। संवैधानिक प्राविधान के अनुसार 14 दिन पहले अविश्वास प्रस्ताव के लिए नोटिस आना चाहिए। अब हरिवंश इस्तीफा देंगे या जदयू से बगावत करेंगे? इंतजार खासकर भाजपा नेतृत्व एवं संप्रग के साथी दलों को।

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फिर बढ़ा रुतबा!
अपने राजस्थान का राजधानी दिल्ली में रुतबा बढ़ता ही जा रहा। खासकर केन्द्र सरकार और भाजपा की राजनीति में। राजस्थान का दखल और प्रभाव अब पहले से ज्यादा। जहां संसद के दोनों ही सदनों की अगुवाई राजस्थानी नेताओं के हाथ में। वहीं, अब भाजपा संगठन में सुनील बंसल के रुप में एक प्रभावी एवं चर्चित चेहरा भी केन्द्रीय राजनीति में दाखिल हो गया। वह अमित शाह की पसंद। बंसल शाह की रणनीति को जमीन पर उतारने के लिए जाने जाते। बंसल ने भाजपा में आने के बाद बहुत जल्दी तरक्की की। वह एबीवीपी से साल 2014 में ही भाजपा में दाखिल हुए। अब आठ साल बाद महामंत्री के रुप में तरक्की हो गई। राजनीति के लिहाज से बंसल की अभी कम ही आयु। यानी भविष्य में पर्याप्त संभावनाएं। अब उन्हें अगली क्या जिम्मेदारी मिलेगी और कितने समय बाद, इसका इंतजार। हां, भाजपा पहले ही राजस्थान में कई पावर सेंटर बना चुकी। इससे जानकार चकरा रहे। इससे लगातार भाजपा में सियासी समीकरण बदल रहे।


कश्मीर में चुनाव टले!
अनुच्छेद- 370 खत्म होने के बाद जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव आगे खिसकने के आसार। सरकार की ओर से मतदाता सूचियों को संशोधित करने की बात। पहले इसी साल के अंत तक चुनाव संपन्न होने की संभावनाएं जताई जा रही थी। लेकिन अब अगले साल मार्च-अप्रैल तक होने की संभावना। असल में, वोटर कार्ड को ह्यआधारह्ण से जोड़ने का अभियान चल चुका। इससे राजनीतिक घपलेबाजी की सफाई की गुंजाईश। वास्तविक एवं वाजिब वोटर को उसका हक मिलेगा। इसके अलावा शायद भाजपा का पहले गुजरात चुनाव से निपटने का इरादा। बाकी को बाद में देख लेंगे! क्योंकि गुजरात चुनाव पर नजर पूरी दुनियां की। और मोदी-शाह की जोड़ी इसमें कोई जोखिम नहीं लेना चाहेगी। फिर अगले साल उस दौरान केवल कर्नाटक चुनाव ही रहेंगे। हां, वोटर कार्ड को आधार से जोड़ने का काम वैसे ही। जैसे गैस कनेक्शन, राशन कार्ड, बैंक खातों एवं मोबाइल नंबर को जोड़ा गया। फिर यह भी तय। कई नाम इधर-उधर होंगे। मतलब चुनावी प्रक्रिया में यह एक क्रांतिकारी कदम।  

  -(दिल्ली डेस्क)

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