तर्क संगत नहीं हैं महंगाई के आंकड़े 

अर्थव्यवस्था में महंगाई के आंकड़े

तर्क संगत नहीं हैं महंगाई के आंकड़े 

लंबे अरसे के बाद इसकी गणना करने वाले दोनों इंडेक्स उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) तथा थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) 6 प्रतिशत के निचले स्तर पर दर्ज किए गए हैं।

इन दिनों महंगाई के आंकड़े भारतीय अर्थव्यवस्था को खुशखबरी दे रहे हैं, क्योंकि लंबे अरसे के बाद इसकी गणना करने वाले दोनों इंडेक्स उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) तथा थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) 6 प्रतिशत के निचले स्तर पर दर्ज किए गए हैं। सीपीआई में गिरावट जनवरी 2022 के बाद पहली बार देखी गई है। वर्तमान में डब्ल्यूपीआई 5.85 प्रतिशत के स्तर पर है, जबकि पिछले वर्ष 2021 में इसी समय के दौरान ये 8. 39 प्रतिशत था। इन आंकड़ों की प्राप्ति के बाद से यह चर्चा आम हो गई है कि क्या एक भारतीय उपभोक्ता को लगातार बढ़ रही महंगाई से अब राहत मिलनी शुरू हो गई है? ये सिर्फ  आंकड़ों में ही सिमटा हुआ एक खेल है? निश्चित रूप से ये प्रश्न बहुत तर्क संगत है और इसका हल विशेषण के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता है। ऊपरी तौर पर ये कहना जायज है कि आंकड़ों में अगर गिरावट हुई है तो निश्चित रूप से उसके पीछे कुछ मुख्य आधार तो रहें होंगे। साथ ही इस संदर्भ में पिछले काफी समय से भारतीय रिजर्व बैंक के द्वारा लगातार मौद्रिक नीतियों में किए जा रहे परिवर्तन भी मुख्य भूमिका में होंगे। ज्ञात रहे कि चालू वित्तीय वर्ष के दौरान अब तक 4 दफा रेपो रेट बढ़ाई जा चुकी है ताकि तरलता पर नियंत्रण रहे। हालांकि, इसका प्रत्यक्ष प्रभाव उपभोक्ता की क्रय क्षमता को नियंत्रित करना होता है, जो आर्थिक विकास के हिसाब से नकारात्मक रुख है। दूसरी तरफ ये भी एक सच्चाई है कि महंगाई के इंडेक्स के इन ताजा आंकड़ों में हुई गिरावट का आर्थिक फायदा कोई बहुत बड़े स्तर पर आम आदमी के जीवन में प्रत्यक्ष रूप से नहीं दिख रहा है। 

ये स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है कि एक आम आदमी के आर्थिक जीवन में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) के महंगाई की दर के आंकड़े, डब्ल्यूपीआई की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। इसके माध्यम से विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के खुदरा मूल्यों में हुए परिवर्तन को विभिन्न स्तरों पर मापा जाता है तथा इसे राष्टÑीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के द्वारा जारी किया जाता है। इस संदर्भ में ये जानना भी अत्यंत आवश्यक है कि थोक मूल्य सूचकांक तथा उपभोक्ता मूल्य सूचकांक दोनों सदैव एक दूसरे का अनुसरण करेंगे, ये भी आवश्यक नहीं है। वर्तमान समय में ये काफी महत्वपूर्ण हो जाता है कि दोनों में गिरावट एक समान दर्ज की जा रही है। वैश्विक स्तर पर इन दिनों अमेरिकन फेड के द्वारा ब्याज की नीतियों में किए गए परिवर्तन से तुलनात्मक रूप से मजबूत हो रहे डॉलर ने सभी देशों की मुद्राओं को कमजोर कर दिया है तथा जिसके फलस्वरूप वैश्विक आर्थिक मंदी की घबराहट हर जगह है। इसका प्रभाव कहीं ना कहीं डब्ल्यूपीआई के महंगाई के आंकड़ों पर पड़ता दिख रहा है। वहीं एक आम आदमी को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने वाली सीपीआई की दर की बात की जाए तो उसमें गिरावट का मुख्य कारण इन दिनों सब्जियों व फलों के मूल्यों में हुई कमी के कारण है। सीपीआई के अंतर्गत महंगाई की गणना के कुल 6 आधारों में खाद्य व पेय पदार्थों की महत्वत्ता तुलनात्मक रूप से बहुत अधिक है। इन दिनों सर्दियों के मौसम के कारण उपयोग में आने वाली सब्जियों व फलों की आवक बाजार में एकाएक बहुत बढ़ गई है जिसके परिणामस्वरूप मूल्यों में कमी देखी जा रही है तथा परिणाम स्वरूप नवंबर के महीने में सीपीआई की दर में 5.88 प्रतिशत रही है। हालांकि विभिन्न दालों, मसालों तथा दूध के मूल्यों में हो रही वृद्धि इस बात में अपना एक अलग तर्क प्रस्तुत करती है। 

उपभोक्ता मूल्य सूचकांक निश्चित रूप से आम आदमी के जीवन में पड़ने वाले महंगाई के प्रभाव को काफी तर्क संगत तरीके से प्रस्तुत करता है, परंतु ये बहुत बड़ी विडंबना है कि वर्तमान समय में वर्ष 2011-12 के समय के उपभोक्ता की खरीदारी के विभिन्न आधारों को मापदंड बनाकर चला जा रहा है। क्या पिछले 10 वर्षों में भारतीय उपभोक्ता की मानसिकता में कोई परिवर्तन नहीं आया है? ज्ञात रहे कि राष्टÑीय सांख्यिकी कार्यालय के द्वारा उपभोक्ता की क्रय क्षमता के विभिन्न आधारों के मापदंडों का निर्धारण वर्ष 2017-18 में किया जाना था, जो कि अब तक नहीं हुआ है और इस कारण आज भी 10 वर्ष पुराने आधारों को लेकर महंगाई की दर की गणना की जा रही है, जो कि पूर्णतया अव्यवहारिक प्रतीत होता है तथा एक प्रश्न इस सोच पर भी खड़ा करता है कि सीपीआई की दर में हुई कमी कैसी आम आदमी को महंगाई से राहत दिला रही है? महंगाई की दर की गणना करने के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक एक बहुत विस्तृत आधार है। इस इंडेक्स में एक ग्रामीण उपभोक्ता तथा शहरी उपभोक्ता की भिन्न-भिन्न वस्तुओं की खरीदारी के लिए सोच को भी देखा जाता है। इसके अलावा इस इंडेक्स से भारत के विभिन्न राज्यों में ग्रामीण तथा शहरी उपभोक्ताओं की क्रय मानसिकता के अंतर को भी देखा व समझा जा सकता हैं। वर्तमान समय में 16 राज्यों में ग्रामीण क्षेत्रों की महंगाई दर, शहरी क्षेत्रों से अधिक है जो की एक अचंभित करने वाला तथ्य लगता है पर ये एक सच्चाई है। इसके अलावा राष्टÑीय स्तर पर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 6 प्रतिशत से कम दर्ज हुआ है लेकिन कुछ राज्य जैसे तेलंगाना, मध्य प्रदेश, हरियाणा तथा आंध्र प्रदेश में में ये वर्तमान में काफी अधिक है।        

  -डॉ.पी.एस. वोहरा
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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तेलंगाना में ये दर वर्तमान समय में 7.89 प्रतिशत है लेकिन इसका देश के सभी राज्यों की औसतन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में इसलिए ज्यादा नकारात्मक असर नहीं पड़ा, क्योंकि सभी राज्यों की औसत में तेलंगाना की वेटेज मात्र 3.5 प्रतिशत ही है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की महंगाई की दर में सबसे अधिक महत्वत्ता महाराष्टÑ तथा उत्तर प्रदेश राज्यों से आती है। इससे स्पष्ट है कि अगर महाराष्टÑ के शहरी या ग्रामीण क्षेत्र या उत्तर प्रदेश के शहरी अथवा ग्रामीण क्षेत्र में खाद्य व पेय पदार्थों के मूल्यों में बढ़ोतरी हो या कमी तो उसका बहुत बड़ा प्रभाव देश की महंगाई दर पर देखने को मिलता है। क्या ये तर्क संगत है? 

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वहीं दूसरी तरफ भारत का केंद्रीय बैंक रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया महंगाई को लेकर लगातार ब्याज की दरों में लगातार परिवर्तन कर रहा है ताकि उपभोक्ता की क्रय क्षमता नियंत्रित रहे। प्रारंभिक स्तर पर ये एक आवश्यक कदम महसूस होता है परंतु आर्थिक विश्लेषण के आधार पर ये समझना भी आवश्यक होगा कि रेपो रेट में हुई वृद्धि वित्तीय ण की ष्ईएमआईष् या मासिक किस्त को भी बढ़ाता है जिसका आर्थिक बोझ एक आम उपभोक्ता के हिस्से में ही आता है। इसलिए एक आम आदमी की ये सोच शायद गलत नहीं है कि महंगाई दर के आंकड़ों में हुए बदलाव उसे ’यादा प्रभावित नहीं करते हैं। वास्तविकता में ये आंकड़ों का खेल है। ये जरूर तर्कसंगत प्रतीत होता है कि सीपीआई तथा डब्ल्यूपीआई दोनों का 6 प्रतिशत से कम के स्तर पर आना अर्थव्यवस्था के तीसरी तिमाही के जीडीपी की दर में एक उछाल का संकेत देता है जो कि आने वाले समय में देखने को मिलेगा। 

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