देशभर में ‘प्रताप धन मुर्गी’ की डिमांड लाखों में, सप्लाई हजारों में

मेवाड़ के वैज्ञानिकों द्वारा तैयार यह नस्ल देती है सालाना 150 से अधिक अंडे

देशभर में ‘प्रताप धन मुर्गी’ की डिमांड लाखों में, सप्लाई हजारों में

 उदयपुर। महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमपीयूएटी) के वैज्ञानिकों द्वारा तैयार की गई प्रतापधन मुर्गी की देशभर में इतनी डिमांड है कि एमपीयूएटी द्वारा इसकी सप्लाई में ही पसीने छूट रहे हैं। जानकारी के अनुसार कश्मीर, मध्यप्रदेश और गुजरात से ही लाखों मुर्गियों की डिमांड है, लेकिन एमपीयूएटी हजारों में ही सप्लाई कर पा रहा है। चिकन और अंडा उत्पादन में अब तक की सबसे अव्वल रही इस नस्ल को जो व्यक्ति एक बार लेता है, उसे अन्य कोई प्रजाति रास नहीं आती है। कारण यह है कि इस नस्ल की मुर्गियां एक साल में 150 से अधिक अंडे दे देती हैं तो इस नस्ले के मुर्गे पांच माह में ही तीन से साढ़े तीन किलो वजनी भी हो जाते हैं। एमपीयूएटी के वैज्ञानिकों ने इस नस्ल को करीब चार साल पहले तैयार किया था। प्रतापधन को लेकर देश के कई राज्यों से ऑर्डर प्राप्त हो रहे हैं, तो कई फर्म एडवांस राशि देकर भी बुकिंग करवाने को तैयार है, लेकिन इस प्रजाति की सप्लाई तैयार करने में लगने वाला अत्यधिक समय इसकी डिमांड में रोड़ा बना हुआ है। बता दें, यह ऐसी प्रजाति है जिसे किसी तरह की बीमारी भी नहीं लगती और इसका सेवन करने वालों को भी कोई परेशानी नहीं होती है।

1.25 से 1.50 लाख पहुंची सालाना डिमांड

एमपीयूएटी से मिली जानकारी के अनुसार वर्तमान में प्रतापधन मुर्गी की डिमांड बीते साल की तुलना में बढ़ी है। बताया गया कि बीते साल करीब 1.25 लाख चूजों की सालाना डिमांड थी, जो इस वर्ष बढ़कर 1.50 तक जा पहुंची है। इसकी तुलना में पूर्ति करीब 85 हजार चूजों की ही हो पा रही है। बताया गया कि देशभर में सर्वाधिक मांग कश्मीर, गुजरात व मध्यप्रदेश से आ रही है। कुलपति प्रो. एनएस राठौड़ ने बताया कि रोड आइलैंड रेड (आरआईआर) जो सालाना दो सौ अंडे देती है, कलर ब्राइलर, जो पांच माह में ढाई किलो हो जाती है और मेवाड़ी मुर्गी जिसमें बीमारी बेहद कम लगती है। इन तीनों नस्लों को मिलाकर उन्नत मूर्गी प्रताप धन तैयार की गई। नस्ल को नेशनल ब्यूरो आॅफ एनिमल जेनेटिक रिसोर्स करनाल से रजिस्टर्ड करवाया गया है।

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