सीजेरियन डिलीवरी के बढ़ते मामले चिंताजनक

सीजेरियन डिलीवरी के बढ़ते मामले चिंताजनक

सीजेरियन डिलीवरी से पैदा होने वाले बच्चे का विकास प्रभावित होता ही है, साथ ही मां भी शारीरिक कमजोरी का शिकार हो जाती है।

वाकई यह बेहद चिंताजनक है कि देश में हर साल सर्जरी से पैदा होने वाले बच्चों की तादाद बढ़ रही है। यह संख्या सिर्फ  निजी अस्पतालों में ही नहीं बल्कि सरकारी अस्पतालों में भी बढ़ी है। यह जानकर बड़ा आश्चर्य होगा कि सीजेरियन आपरेशन की मदद से पैदा होने वाले बच्चों की वजह से मानव जाति के विकास पर असर पड़ता है। सीजेरियन डिलीवरी से पैदा होने वाले बच्चे का विकास प्रभावित होता ही है, साथ ही मां भी शारीरिक कमजोरी का शिकार हो जाती है। गौरतलब है कि भारत में बड़े पैमाने पर सीजेरियन आपरेशन हो रहे हैं और पिछले एक दशक में यह अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आकड़ों के मुताबिक 2010 तक भारत में सिर्फ साढ़े आठ फीसदी बच्चे सीजेरियन आपरेशन से होते थे। यह विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक 10-15 फीसदी से कम ही था, लेकिन राष्ट्रीय परिवार कल्याण सर्वे-5 (एनएचएफएस) के आंकड़ों के मुताबिक पिछले एक दशक में सीजेरियन आॅपरेशन के मामले में भारत इससे बहुत आगे चला गया है। राष्ट्रीय परिवार कल्याण सर्वे-5 (एनएचएफएस) के ताजा आंकड़े बताते हैं कि देश में हर साल औसतन 2.40 करोड़ बच्चे जन्म लेते हैं, जिनमें से करीब 80 फीसदी अस्पतालों में पैदा होते हैं। इनमें से 21.5 फीसदी यानी करीब 41 लाख बच्चों का जन्म हर साल सीजेरियन प्रसव से होता है। सर्वे के मुताबिक सीजेरियन प्रसव के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। वर्ष 2019-2021 के बीच देश में सीजेरियन प्रसव के मामले 21.5 फीसदी दर्ज किए गए हैं। मगर शहरी क्षेत्रों के निजी अस्पतालों में कमोबेश दो में से एक प्रसव सीजेरियन हो रहा है। इससे पूर्व जब 2015-16 में एनएचएफएस-4 सर्वे किया गया था, तब देश में सीजेरियन प्रसव के मामले 17.2 फीसदी थे। यानी पांच वर्षों में इसमें चार फीसदी से अधिक की बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा, स्वास्थ्य प्रबंधन सूचना प्रणाली यानी एचएमआईएस ने 2019-20 में सीजेरियन डिलीवरी के 20.5 फीसदी की सूचना दी है, जो 2020-21 में बढ़कर 21.3 फीसदी और फिर 2021-22 में 23.29 फीसदी हो गया। भारतीय राज्यों में, सीजेरियन डिलीवरी का उच्चतम फीसदी तेलंगाना में देखा गया।

अगर हम निजी और सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर होने वाले सीजेरियन डिलीवरी की बात करें तो निजी स्वास्थ्य केंद्रों में सीजेरियन प्रसव ज्यादा किए जाते हैं। ऐसे आरोप भी लगते रहे हैं कि ज्यादा बिल बनाने के लिए ऐसा किया जाता है। एनएचएफएस-5 सर्वे के आंकड़े भी इसी बात की तरफ ईशारा ज्यादा करते हैं। इसमें पाया गया कि जो प्रसव निजी स्वास्थ्य केंद्रों में हुए, वहां 47.4 फीसदी सीजेरियन हुए हैं। शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 49.3 फीसदी तक दर्ज किया गया है। जबकि, ग्रामीण क्षेत्रों में 46 फीसदी पाया गया। एनएचएफएस-4 सर्वे के आंकड़ों के अनुसार, निजी अस्पतालों में 40.9 फीसदी प्रसव सीजेरियन हो रहे थे। यानी यह आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है। जो वाकई बेहद चिंताजनक है।

यह सही है कि कई मामलों में सीजेरियन डिलीवरी के माध्यम से बच्चों का जन्म होना मां और बच्चे दोनों की सेहत के लिए फायदेमंद रहता है। तमाम महिलाओं को डिलीवरी के समय कुछ कारणों से जान जाने का भी खतरा होता है जिसकी वजह से सीजेरियन डिलीवरी करानी पड़ती है। लिहाजा मेडिकल साइंस की इस प्रगति को जीवन रक्षक भी माना जाता है। लेकिन, हमें यह समझना होगा कि सीजेरियन डिलीवरी का महिलाओं के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। कई शोध और अध्ययन इस बात की पुष्टि करते हैं कि सीजेरियन डिलीवरी का महिलाओं के स्वास्थ्य पर दीर्घकालीन प्रभाव रहता है। यह डिलीवरी महिलाओं के साथ-साथ पैदा होने वाले बच्चों की सेहत पर भी असर डालती है। बता दें कि जिन महिलाओं की नॉर्मल डिलीवरी होती है उनकी तुलना में सीजेरियन डिलीवरी वाली महिलाओं की रिकवरी में अधिक समय लगता है। जैसा कि सीजेरियन डिलीवरी से रिकवरी करने में औसतन 4 से 6 सप्ताह का समय लगता है। साथ ही, नॉर्मल डिलीवरी की तुलना में सीजेरियन डिलीवरी के कारण महिलाओं का शरीर अधिक कमजोर हो जाता है। इस डिलीवरी में महिलाओं के शरीर से अधिक मात्रा में रक्त निकलता है। जिसके कारण कमजोरी हो जाती है। कई बार सीजेरियन डिलीवरी के दौरान हुई दिक्कतों की वजह से महिला को लंबे समय तक इसके साइड इफेक्ट्स से जूझना पड़ता है। इसके अलावा, सीजेरियन डिलीवरी के बाद शरीर में नॉर्मल डिलीवरी की तुलना में अधिक बदलाव देखने को मिलते हैं जिसके कारण आगे चलकर कई गंभीर बीमारियों का खतरा भी बना रहता है। शरीर में मोटापे के अलावा कई अन्य बदलाव भी होते हैं। इन बदलावों के कारण कई तरह की बीमारियां भी हो सकती हैं। हालांकि नॉर्मल डिलीवरी के बाद भी शरीर में कई तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं, लेकिन इनका खतरा सीजेरियन डिलीवरी से कम होता है।लिहाजा, सीजेरियन डिलीवरी के लगातार बढ़ते मामलों पर अंकुश लगाने की दिशा में कोशिशें होनी चाहिए। यह देखा गया है कि पिछले एक दशक के भीतर महिलाओं की जीवनशैली और खान-पान में बड़े स्तर पर बदलाव हुआ है।  

-अली खान

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