तपोभूमि विश्वविद्यालय का अधूरा सपना

तपोभूमि विश्वविद्यालय का अधूरा सपना

बाणासुर की नगरी बयाना से वैर आने वाले मार्ग पर कदम्ब के लाखों पेड़ों से आच्छादित नौलखा बाग के अनुपम सौन्दर्य को देख डॉ. रांगेय राघव ने वहां तपोभूमि विश्वविद्यालय का सपना संजोया था।

केवल चार दशक की अल्पायु में 150 से अधिक अमूल्य ग्रन्थों एवं कालजयी रचनाओं के सर्जक मूर्धन्य साहित्यकार डॉ.रांगेय राघव की अपनी कर्मस्थली भरतपुर जिले के वैर कस्बे में शांति निकेतन की तर्ज पर तपोभूमि विश्वविद्यालय की कल्पना साकार नहीं हो सकी। दक्षिण भारत से ब्रजवासी बने रामानुज सम्प्रदाय से दीक्षित एवं वंशानुगत विद्या व्यसनी श्रीनिवासाचार्य परिवार के नक्षत्र टी.एन.वी. आचार्य (तिरूमल्लै नम्बाकम वीर राघव आचार्य) ने डॉ. रांगेय राघव के रूप में साहित्य जगत को आलोकित किया। अपनी मृत्यु से एक साल पहले 1961 में उपन्यास ‘धरती का घर’ में वैर के नौलखा बाग और दौला वाले बाग का उल्लेख करने वाले डॉ. रांगेय राघव के मन मस्तिष्क में कर्मस्थली वैर में गुरूकुल परम्परा का विश्वविद्यालय स्थापित करने की इच्छा बलवती हुई। इसका नामकरण भी हुआ तपोभूमि। लेकिन काल के प्रवाह में यह सपना साकार नहीं हो पाया। आगरा में 17 जनवरी 1923 को जन्मे डॉ. रांगेय राघव का 12 सितम्बर 1962 को मुम्बई में निधन हुआ। विडम्बना यह है कि उनके जन्म शताब्दी वर्ष के बारे में किसी स्तर पर कोई सुध नहीं है। उनकी कार्यस्थली वैर ने भी उन्हें भुला सा दिया है। वर्ष 1973 में उनकी स्मृति में वैर में स्थापित पुस्तकालय का अब कोई अस्तित्व नहीं है। जिस भूमि पर विश्वविद्यालय की उन्होंने कल्पना की थी वह नौलखा बाग जहां कभी कदम्ब के लाखों पेड़ थे उसका अब नक्षा बदल गया है। 

बाणासुर की नगरी बयाना से वैर आने वाले मार्ग पर कदम्ब के लाखों पेड़ों से आच्छादित नौलखा बाग के अनुपम सौन्दर्य को देख डॉ. रांगेय राघव ने वहां तपोभूमि विश्वविद्यालय का सपना संजोया था। लेकिन वह कभी साकार नहीं हो पाया। नौलखा बाग के एक हिस्से में वर्ष 1907 में बने अस्पताल को एक सौ साल बाद रेफरल अस्पताल का दर्जा मिला। बयाना वैर भुसावर मार्ग को जयपुर से जोड़ने के लिए इसी बाग से बाईपास बनाया गया। तहसील मुंसिफ  कोर्ट, उपखण्ड अधिकारी तथा बिजली विभाग का कार्यालय वहां भी खुल गया।

सरकार के स्तर पर रांगेय राघव जैसे साहित्यकार की घोर अनदेखी की गई। उनके नाम पर कॉलेज खोलने के लिए 1978 में 28 दिनों तक आंदोलन करने वाले विद्यार्थी परिसर के तत्कालीन सचिव और बाद में पत्रकार एडवोकेट बने मुरारीलाल शर्मा के अनुसार राज्य सरकार ने इसी पत्र में सरकारी कॉलेज खोला है जो पुराने मिडिल स्कूल में चलाया जा रहा है। सीनियर सैकण्डरी स्कूल में एक दानदाता ने डॉ.रांगेय राघव की प्रतिभा लगवाई थी। एक निजी कॉलेज भी उनके नाम पर है। अलबत्ता राजस्थान साहित्य अकादमी ने हमारे पुरोधा श्रृंखला में डॉ.सुदेश बत्रा के सम्पादन में डॉ.रांगेय राघव पुस्तक 1998 में प्रकाशित की थी। अकादमी उनके नाम से साहित्यकारों को पुरस्कृत करती है। 
वैर के सीताराम मन्दिर में मकर संक्रान्ति पर सुयोग्य विद्यार्थियों को सम्मानित करने की परम्परा में शिक्षक और वैद्यकीय में निपुण पं. रामकृष्ण मिश्र की डॉ.रांगेय राघव से भेंट उनके मंझले भाई टीएनके आचार्य ने करवाई। पं. मिश्र ने इस भेंट का चित्रण यूं किया-ऐसा लगा कि रामचरित मानस की छपी पुस्तकों में प्रारम्भ में गोस्वामी तुलसीदास का जो चित्र बना होता है वही सजीव होकर सामने बैठा है। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि आदमी को देखकर चित्र बनाया जाता है, पर यहां तो चित्र के अनुसार ईश्वर ने इस मानव की रचना की है। मंझले भाई ने पं. मिश्रजी को वैद्य जी सम्बोधन से संकेत करते हुए डॉ. रांगेय राघव को कहा-पप्पू इनसे अपने बालों के विषय में बातें करों। कविता और कहानी लिखने पढ़ने की बातें भी इनसे बहुत होगी, लेकिन उन्हें पीछे करते रहना। तब पप्पू ने अपनी व्यथा बताई- पता नहीं क्यों कुछ दिन पूर्व से मेरे सिर के बाल झड़ने शुरू हो गए है। वैद्य जी ने बाल झड़ने की इस प्रक्रिया को मानसिक चिंतन और परिश्रम के परिणाम स्वरूप होना बताया। बाद में वनोषधियों से तेल बनाने की चर्चा हुई। कविता-लिखने पढ़ने की पं.मिश्र की रूचि जानकर पप्पू ने पूछा-आप किन-किन कवियों को अधिक पढ़ते हैं। तब के प्रसिद्व कवियों के नाम सुन पप्पू ने गंभीर स्वर में कहा-आपने डॉ.रांगेय राघव को पढ़ा है। सकुचाते हुए मिश्र ने राघव का साहित्य उपलब्ध कराने का आग्रह किया। बाद में दोनों की घनिष्ठता बढ़ती गई। अपने साहित्य के बारे में डॉ. रांगेय राघव ने एक बार टिप्पणी की थी-अच्छा साहित्य तो हमेशा हीरे की तरह चमकता है। मुझे विश्वास है कि मेरी रचनाएं अभी नहीं, मेरे मरने के बाद सिर पर उठाई जाएंगी। मैंने खून पसीना बहाकर लिखा है, खेल नहीं खेला।

डॉ.रांगेय राघव का यह कथन कठोर सच्चाई है। महज 14 वर्ष की अल्पायु में उनका रचित प्रथम गीत कोलकत्ता से प्रकाशित साप्ताहिक विश्वामित्र में छपा। विशाल भारत, हंस, सदृश पत्रिकाओं में उनकी रचनाओं को स्थान मिला। विद्यार्थी जीवन में उन्होंने घरौंदे उपन्यास लिखा और 1948 में पी.एच.डी की उपाधि प्राप्त की। बहुप्रतिभा सम्पन्न इस रचनाकार ने जीवन पर्यन्त कलम को विराम नहीं दिया। लेखन के लिए रूग्णावस्था में उन्होंने और दस वर्ष जीने की इच्छा जताई थी।

-गुलाब बत्रा
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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