राजस्थान में मतदान की अजब-गजब यात्रा

राजस्थान में मतदान की अजब-गजब यात्रा

अलबत्ता प्रथम आम चुनाव 1952 से मतदान के समय मतदाता की अंगुली पर अमिट स्याही का निशान लगाने की प्रणाली यथावत है। किसी रसायन से यह स्याही मिटाकर फर्जी मतदान कराए जाने की शिकायत भी होती आई है।

पन्द्रहवीं राजस्थान विधानसभा के गठन के लिए सात दिसम्बर 2018 को सम्पन्न मतदान में पहली बार ईवीएम वी वी पैट (वोटर वेरीफाएवल पेपर आॅडिट ट्रेल) मशीनों का उपयोग किया गया। पोलिंग बूथ पर फटाफट मतदान का दृश्य-मतदाता ने ईवीएम मशीन पर अपने इच्छित प्रत्याशी के नाम के आगे दर्ज चुनाव चिन्ह के सामने नीला बटन दबाया, विप की आवाज के साथ लाल बत्ती जल उठी और अगले सात सैकिण्ड तक वीवी पेट यूनिट की पारदर्शी स्क्रीन पर पर्ची दिखाई दी, जिस पर प्रत्याशी के क्रम की संख्या, नाम तथा उसका चुनाव चिन्ह अंकित था। यह पर्ची वीवी पैट के मोहरबंद डिब्बे में चली जाती है। वीवी पैट स्वतंत्र प्रिंटर प्रणाली है जिसे ईवीएम से जोड़ा गया है। थर्मल पेपर की पर्ची पर छपी हुई जानकारी पांच साल से अधिक समय तक पठनीय रहती है। इससे मतदाता संतुष्ट कि उसने सही मतदान किया है। और अब 71 साल पहले 1952 में सम्पन्न मतदान की अजब गजब दास्तां। तब मतदाता को अपना वोट डालने के लिए काफी मशक्कत करनी होती थी। जब मतदाता निर्धारित मतदान कक्ष में पहुंचता तब उसे कई मतपेटियां रखी दिखाई देती। यह मतदान पेटी एक प्रकार से टीन का कनस्तर हुआ करती थी। इस पर एक प्रत्याशी का चुनाव चिन्ह चस्पा किया जाता था। उस निर्वाचन क्षेत्र में जितने भी उम्मीदवार खड़े होते उतनी संख्या में मतपेटी याने प्रत्येक उम्मीदवार के लिए अलग-अलग मतदान पेटी। उसी मत पेटी के अन्दर भी प्रत्याशी के चुनाव चिन्ह की आकृति की बड़ी पर्ची रखी जाती थी ताकि मतगणना के समय यदि किसी कारणवश मतपेटी के बाहर चस्पा चुनाव चिन्ह वाली पर्ची गिर जाए तो संबंधित उम्मीदवार के पक्ष में मतपेटी में डाले गए वोटों की सही-सही गिनती की जा सके। मतदाता अपना वोट मतपेटी में डाले इससे पहले मत पत्र की बात। यह मतपत्र लगभग पुराने नोट के आकार के बराबर होता था। दिलचस्प बात यह कि इस पर न तो उम्मीदवार का नाम और न उसका चुनाव चिन्ह दर्ज होता था। इस मत पत्र पर भारत का राष्टÑीय चिन्ह अशोक एवं मत पत्र का नम्बर अंकित किया जाता था। अब इस मत पत्र को हाथ में लिए मतदाता बारी-बारी से प्रत्येक मतपेटी के पास जाता और उस पर चस्पा उम्मीदवार के चुनाव चिन्ह को देखता। इस प्रकार से चक्करघिन्नी मतदाता सभी मतपेटियों की परिक्रमा करता हुआ अपनी पसंद के प्रत्याशी के चुनाव चिन्ह की मतपेटी में अपना वोट डालता। इस उधेड़बुन में अगर गलत मतपेटी में वोट डल गया तो मतदाता केवल पछतावा कर सकता था।

वर्ष 1952 में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए गए थे। इन्हें आम चुनाव कहा जाता था। तब अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए अलग से निर्वाचित क्षेत्र सुरक्षित नहीं थे। इसलिए कुछ निर्वाचन क्षेत्रों को दो सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र माना गया। ऐसे निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता को दो-दो वोट देने होते थे। सुरक्षित सीट के लिए खड़े उम्मीदवार का चुनाव चिन्ह एक गोले के अन्दर अंकित होता था ताकि मतदाता आसानी से उसे पहचान सके। विधानसभा की तरह लोकसभा के निर्वाचन क्षेत्रों में भी मतदान की यह प्रणाली अपनाई गई। मतदान के बाद उम्मीदवारों के चुनाव चिन्ह वाली मतपेटियों पर अलग-अलग सील लगाकर संबंधित प्रत्याशियों के एजेंटों से हस्ताक्षर करवाए जाते। मतगणना के समय बारी-बारी से प्रत्येक उम्मीदवार की मतपेटी खोलकर उसमें डाले गए वोटों की गिनती की जाती और सर्वाधिक वोट हासिल करने वाले उम्मीदवार को विजयी घोषित किया जाता। 

वर्ष 1952 के प्रथम और वर्ष 1957 के द्वितीय आम चुनाव में इसी प्रणाली से चुनाव सम्पन्न हुए। भारत निर्वाचन आयोग ने वर्ष 1962 के तीसरे आम चुनाव से इस प्रणाली में परिवर्तन किया। सबसे पहले अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्र आरक्षित किए गए। इससे दो सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र समाप्त हो गए और वहां के मतदाताओं को दो-दो वोट डालने की मुसीबत से मुक्ति मिल गई। इसके साथ ही मतपत्र का स्वरूप भी परिवर्तित किया गया। अब मत पत्र पर राष्टÑीय चिन्ह अशोक के स्थान पर उम्मीदवार का नाम और उसका चुनाव चिन्ह अंकित किया जाने लगा। इस बार मतदान के लिए मतदान कक्ष में एक मजबूत पेटी रखी गई। मतदाता को मत पत्र दिया जाता और वह मतदान कक्ष में क्रास वाली मोहर का ठप्पा लगाकर अपना वोट मतपेटी मे डाल देता। इस प्रक्रिया में मतगणना के समय विवाद होने लगा। मतदाता द्वारा क्रास मोहर लगा मत पत्र गलत मोड़ देने से अक्सर उसकी छाप किसी दूसरे चुनाव चिन्ह पर दर्ज होने से मतगणना के समय विवाद होने लगे। इस विवाद को सुलझाने के लिए अगले चुनाव में केवल क्रास वाली मोहर को एन्टी क्लॉकवाईस मुद्रा में बदला गया। इससे यह पता चल जाता कि मतदाता ने किस उम्मीदवार के पक्ष में अपना वोट दिया है। इस पद्धति से मतगणना के समय होने वाले विवाद समाप्त हो गए। परम्परागत मतपत्रों और मतपेटी के आधार पर चुनाव की यह प्रक्रिया आगे बढ़ी। आने वाले वर्षों में चुनाव राजनीति मे धनबल एवं भुजबल का इस्तेमाल बढने से कई समस्यायें उत्पन्न होने लगी। कुछ रा’यों में मतदान बूथों पर कब्जा करनेए मतपत्र जला देने समाज कंटको द्वारा मतपत्र पेटी उठाकर ले जाने वाली घटनाओ में वृद्धि होने लगी। मतगणना के समय भी अवांछनीय गतिविधियां बढ़ने लगी। ऐसी सूरत में परम्परागत मतदान के तौर तरीकों में परिवर्तन के बारे मे सोचा जाने लगा। इस क्रम में इलेक्ट्रानिक मतदान की प्रणाली के बारे में चर्चा आरम्भ हुई और ईण्वीण्एमण् मशीनों से मतदान कराने की प्रक्रिया आरम्भ की गई। वर्ष 1982 में पहली बार केरल विधानसभा का चुनाव इन्ही मशीनों के उपयोग से कराया गया। राजस्थान में वर्ष 1998 में परीक्षण के तौर पर जयपुर एवं अजमेर जिले में मतदान के लिए ईवीएम मशीनों का उपयोग किया गया। वर्ष 2003 से तो सभी 200 विधान सभा क्षेत्रो में इसी तकनीक से मतदान होने लगा है। ईवीएम मशीनों में कथित गड़बड़ी की शिकायतों को लेकर निर्वाचन आयोग ने ईवीएम मशीन के साथ वी वी पैट यूनिट लगाने की प्रक्रिया अपनायी है ताकि मतदान की विश्वसनीयता को बनाये रखा जा सके।

अलबत्ता प्रथम आम चुनाव 1952 से मतदान के समय मतदाता की अंगुली पर अमिट स्याही का निशान लगाने की प्रणाली यथावत है। किसी रसायन से यह स्याही मिटाकर फर्जी मतदान कराए जाने की शिकायत भी होती आई है। अनेक शिकवा शिकायतों के बीच मतदान की यह लोकतांत्रिक यात्रा जारी है। 

-गुलाब बत्रा
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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