दोषी सांसदों और विधायकों के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगाना होगा कठोर : केंद्र सरकार ने प्रतिबंध लगाने वाली याचिका का किया विरोध, कहा- सजा की अवधि सीमित रखना संवैधानिक
समझ के आधार पर आजीवन प्रतिबंध लगाना उचित नहीं होगा
विवादित धाराओं के तहत अयोग्यता संसदीय नीति के अनुसार समयबद्ध है। याचिकाकर्ता की समझ के आधार पर आजीवन प्रतिबंध लगाना उचित नहीं होगा।
नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दोषी सांसदों-विधायकों के चुनाव लड़ने पर आजीवन प्रतिबंध लगाने की मांग वाली याचिका का विरोध किया है। सरकार का कहना है कि सजा की अवधि सीमित रखना संवैधानिक है। इससे कठोरता से बचते हुए अपराध रोकने में मदद मिलती है। यह मामला अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की जनहित याचिका से जुड़ा है। इस याचिका में जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 8 और 9 को चुनौती दी गई है। सरकार ने कहा कि संसद को सजा की अवधि तय करने का अधिकार है। अदालत इस मामले में 4 मार्च को सुनवाई करेगी। केंद्र सरकार ने क्या दलीलें दीं: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया है। इस हलफनामे में सरकार ने कहा है कि दोषी सांसदों-विधायकों की अयोग्यता की अवधि 6 साल तक सीमित रखने का प्रावधान आनुपातिकता और तर्कसंगतता के सिद्धांतों पर आधारित है। सरकार का तर्क है कि संसद को सजा की अवधि तय करने का विशेषाधिकार है। कानून मंत्रालय की ओर से मंगलवार को दायर हलफनामे में कहा गया, विवादित धाराओं के तहत अयोग्यता संसदीय नीति के अनुसार समयबद्ध है। याचिकाकर्ता की समझ के आधार पर आजीवन प्रतिबंध लगाना उचित नहीं होगा।
क्या है याचिकाकर्ता की मांग?: यह हलफनामा अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की जनहित याचिका के जवाब में दायर किया गया है। उपाध्याय ने अपनी याचिका में जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 8 और 9 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। याचिका में दोषी सांसदों-विधायकों पर चुनाव लड़ने के लिए आजीवन प्रतिबंध लगाने की मांग की गई है। हलफनामे में कहा गया है, याचिकाकर्ता जो राहत चाहता है, वह जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 8 के सभी उप-धाराओं में 6 साल के बजाय आजीवन पढ़ने की मांग करता है। यह प्रावधान को फिर से लिखने जैसा है। यह हलफनामा सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ की ओर से 10 फरवरी को दिए गए आदेश के जवाब में दायर किया गया था। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली पीठ ने अयोग्यता की अवधि 6 साल तक सीमित रखने के औचित्य पर सवाल उठाया था। पीठ ने कहा था कि एक कानून तोड़ने वाले को कानून बनाने की अनुमति देने में हितों का टकराव है। अदालत 2016 में उपाध्याय की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
केंद्र ने दिया इन मामलों का हवाला
केंद्र ने हलफनामे में कहा कि न्यायपालिका के पास असंवैधानिक कानून को रद्द करने की शक्ति है। अदालतें संसद को किसी विशेष तरीके से कानून बनाने या संशोधित करने का निर्देश नहीं दे सकतीं। हलफनामे में मद्रास बार असोसिएशन बनाम भारत संघ (2021) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया है। फैसले में कहा था कि अदालतें विधायिका को किसी विशेष तरीके से कानून बनाने या लागू करने का निर्देश नहीं दे सकतीं। केंद्र ने हिमाचल प्रदेश बनाम सतपाल सैनी (2017) के फैसले का भी हवाला दिया। इसमें कहा गया था कि नीति निर्माण कार्यपालिका और विधायिका का क्षेत्र है और अदालतें नीतिगत निर्णयों में तब तक हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं जब तक कि वे संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन न करें।
धारा 8 और 9 में क्या प्रावधान?
धारा 8 के तहत, दोषी सांसद-विधायक अपनी सजा पूरी करने के बाद 6 साल तक चुनाव नहीं लड़ सकते। यह कई अपराधों पर लागू होता है, जिनमें दो या दो साल से अधिक की सजा शामिल है। धारा 9 के तहत, भ्रष्टाचार या राज्य के प्रति निष्ठाहीनता के लिए सरकारी सेवा से बर्खास्त किए गए व्यक्ति बर्खास्तगी की तारीख से 5 साल तक चुनाव नहीं लड़ सकते। धारा 8, 1951 के कानून के लागू होने के समय से ही इसका हिस्सा रही है।
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