Voice of youth : धन बरसे न बरसे, कोई रोटी को न तरसे; जरूरतमंदों के जीवन में खुशियों का दीप जलाएं युवा
जरूरतमंदों की मदद और बेजुबान जीवों की सेवा से मनाते हैं दीपावली
कोटा । दीपावली केवल घरों को रोशन करने, नए कपड़े पहनने, मिठाइयां बांटने और आतिशबाजी करने का त्योहार नहीं है, बल्कि यह किसी जरूरतमंद के जीवन में खुशियों का दीप जलाने का भी अवसर है। जब हम अपने घरों में पकवानों का आनंद ले रहे होते हैं, तब हमारे आसपास कई ऐसे परिवार भी होते हैं, जिनके लिए दो वक्त की रोटी जुटाना तक मुश्किल होता है। ऐसे में दीपावली की खुशियां तभी सार्थक होंगी, जब हमारे उत्सव की रोशनी किसी गरीब की जिंदगी के अंधेरे को भी दूर कर सके। मां लक्ष्मी से यही प्रार्थना होनी चाहिए कि धन बरसे न बरसे, लेकिन कोई रोटी के लिए न तरसे। किसी जरूरतमंद को मिठाई, कपड़े और भोजन देकर उसके चेहरे पर मुस्कान लाना ही सच्चे अर्थों में मां लक्ष्मी की आराधना है।
साथ ही, त्योहार की खुशियों में उन बेजुबान पक्षियों और जीवों का भी ख्याल रखना जरूरी है, जो पटाखों के शोर से सहम जाते हैं। पेड़ों और उनके आसपास आतिशबाजी से परहेज कर हम प्रकृति के प्रति अपनी संवेदनशीलता भी जाहिर कर सकते हैं। आखिर दीपावली का असली उजाला दीयों की लौ से नहीं, बल्कि हमारे भीतर जलने वाली इंसानियत, करुणा और परोपकार की रोशनी से फैलता है। जरूरतमंद के घर खुशियों का दीप जलाना, भूखे को भोजन कराना और दूसरों को भी नेक कामों के लिए प्रेरित करना ही वह पूजा है, जिससे त्योहार का अर्थ और उसकी सार्थकता दोनों बढ़ जाते हैं। कुछ ऐसी ही संवेदनशील सोच के साथ दैनिक नवज्योति के 'वॉयस ऑफ यूथ' में युवाओं ने दीपावली मनाने का संदेश दिया।
कच्ची बस्ती में बांटते हैं कपड़े और खिलौने
दीपावली पर हम सभी अपने घरों की साफ-सफाई करते हैं। इस दौरान कई बार हमारे पास ऐसे कपड़े और सामान निकलते हैं, जो हमारे लिए भले ही उपयोगी न हों, लेकिन किसी जरूरतमंद के काम आ सकते हैं। हम हर साल दीपावली पर ऐसा सामान लेकर कच्ची बस्ती में जाते हैं और वहां रहने वाले जरूरतमंद परिवारों को कपड़े, खिलौने और अन्य उपयोगी वस्तुएं वितरित करते हैं। इस बार भी कई झोपड़ियों में जाकर लोगों को कपड़े और दीपक बांटे हैं। हमारा मानना है कि त्योहार की खुशियां दूसरों के साथ बांटने से ही दोगुनी होती हैं। दूसरों के चेहरों पर मुस्कान लाना ही हमारी सबसे बड़ी खुशी है। साथ ही हम दूसरे लोगों को भी इस तरह के नेक कार्यों के लिए प्रेरित करते हैं।
-हिमांशु मीणा, कॉलेज स्टूडेंट
जरूरतमंद बच्चों की मुस्कान ही हमारी खुशी
हम हर साल दीपावली के दिन परिवार और दोस्तों के साथ कच्ची बस्ती में जाते हैं। वहां अपनी सामर्थ्य और क्षमता के अनुसार गरीब बच्चों को पटाखे और मिठाइयां वितरित करते हैं। जब बच्चे मिठाई और उपहार पाकर खुश होते हैं और उनके चेहरों पर मुस्कान आती है, तो हमें भी मन से सुकून मिलता है। दीपावली की खुशियों में हम बेजुबान पशु-पक्षियों को भी नहीं भूलते। गायों को हरा चारा खिलाते हैं और पक्षियों के लिए दाना-पानी रखते हैं। घर के बड़े-बुजुर्ग भी हमें सिखाते हैं कि जरूरतमंदों की मदद और जीवों की सेवा करने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं। हमारा मानना है कि त्योहार की असली खुशी दूसरों के जीवन में खुशियां बांटने में ही है।
-अभिषेक बाबू, कॉलेज स्टूडेंट
दूसरों की सेवा करना सबसे बड़ा पुण्य
दीपावली खुशियों और आपसी प्रेम का त्योहार है। इस दिन हम अपने घरों में मिठाइयां खाते हैं, पकवान बनाते हैं और उत्सव मनाते हैं। ऐसे में यदि हम अपनी खुशियों में से थोड़ा हिस्सा किसी जरूरतमंद के साथ बांट लें, तो इससे हमारा कुछ कम नहीं होगा, बल्कि किसी गरीब परिवार के चेहरे पर मुस्कान जरूर आ जाएगी। जरूरतमंदों की दुआएं और उनका आशीर्वाद ही सबसे बड़ी पूंजी है। मेरा मानना है कि केवल पूजा-पाठ करने से ही भगवान प्रसन्न नहीं होते, बल्कि दूसरों की मदद करने और उनके दुख-दर्द को समझने से भी ईश्वर का आशीर्वाद मिलता है। यदि हम किसी के जीवन में थोड़ी सी भी खुशी ला सकें, तो इससे बड़ा पुण्य कोई दूसरा नहीं हो सकता।
-प्रमिला सुमन, कॉलेज स्टूडेंट
गायों को चारा खिलाकर मनाते हैं दीपावली
दीपावली के अवसर पर हम गायों को हरा चारा खिलाते हैं और घर के बाहर कोई जरूरतमंद व्यक्ति कुछ मांगने आता है, तो उसे खाली हाथ नहीं लौटाते। हमारा मानना है कि जब ईश्वर ने हमें अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त दिया है, तो हमें भी त्योहार के अवसर पर खुले दिल से दान-पुण्य करना चाहिए। अपनी खुशियों में जरूरतमंदों को शामिल करना हमारी जिम्मेदारी है। केवल घर में मां लक्ष्मी की पूजा करना और पटाखे फोड़ना ही दीपावली नहीं है। असली दीपावली तो दूसरों की सेवा करने, भूखों को भोजन कराने और बेजुबान जीवों की देखभाल करने में है। दूसरों के जीवन में खुशियों का उजाला फैलाना ही सच्चे अर्थों में दीपावली मनाना है।
-सेलीन पहाड़िया, कॉलेज स्टूडेंट

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