श्रीकृष्ण का जीवन दर्शन और लीलाएं

बाल्याकाल से लेकर बड़े होने तक श्रीकृष्ण की अनेक लीलाएं विख्यात हैं

श्रीकृष्ण का जीवन दर्शन और लीलाएं

मथुरा के कारागार में वसुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से रात्रि 12 बजे श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था। अपने बाल्याकाल में श्रीकृष्ण ने अनेकों लीलाएं कीं, जन्माष्टमी के अवसर पर ऐसी ही अनेक लीलाओं का मंचन किया जाता है।

सम्पूर्ण भारत में प्रति वर्ष भाद्रपक्ष कृष्णाष्टमी को भारतीय जनमानस के नायक योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में जन्माष्टमी पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व हमें प्रेरणा देता है कि हम अपनी बुद्धि और मन को निर्मल रखने का संकल्प लेते हुए अहंकार,ईर्ष्या, द्वेष रूपी मन के विकारों को दूर करें। माना जाता है कि इसी दिन मथुरा के कारागार में वसुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से रात्रि 12 बजे श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था। अपने बाल्याकाल में श्रीकृष्ण ने अनेकों लीलाएं कीं, जन्माष्टमी के अवसर पर ऐसी ही अनेक लीलाओं का मंचन किया जाता है। उनकी दिव्य लीलाओं को समझना जहां पहुंचे हुए ऋषि-मुनियों और बड़े-बड़े विद्वानों के बूते से भी बाहर था, वहीं अनपढ़, गंवार माने जाते रहे निरक्षर और भोले-भाले ग्वाले और गोपियां उनका सानिध्य पाते हुए उनकी दिव्यता का सुख पाते रहे। वे महाभारत काल के ऐसे आध्यात्मिक और राजनीतिक दृष्टा रहे, जिन्होंने धर्म, सत्य और न्याय की रक्षा के लिए दुर्जनों का संहार किया। वे शांति, प्रेम एवं करूणा के साकार रूप थे। उनके आदर्श, उनके जीवन की विद्वत्ता, वीरता, कूटनीति, योगी सदृश उज्जवल, निर्मल एवं प्रेरणादायक पक्ष, सब हमारे लिए अनुकरणीय हैं। पाप-पुण्य, नैतिक-अनैतिक, सत्य-असत्य से परे पूर्ण पुरुष की अवधारणा को साकार करते श्रीकृष्ण भारतीय परम्परा के ऐसे प्रतीक हैं, जो जीवन का प्रतिबिम्ब हैं और सम्पूर्ण जीवन का चित्र प्रस्तुत करते हैं।

जन्माष्टमी पर्व का भारतीय संस्कृति में इतना महत्व क्यों है, यह जानने के लिए कृष्ण के जीवन दर्शन और उनकी अलौकिक लीलाओं को समझना जरूरी है। दरअसल बाल्याकाल से लेकर बड़े होने तक श्रीकृष्ण की अनेक लीलाएं विख्यात हैं। श्रीकृष्ण ने अपने बड़े भाई बलराम का घमंड तोड़ने के लिए हनुमान जी का आव्हान किया था, जिसके बाद हनुमान ने बलराम की वाटिका में जाकर बलराम से युद्ध किया और उनका घमंड चूर-चूर कर दिया था। मथुरा के राजा और श्रीकृष्ण के मामा कंस ने उन्हें मारने के लिए अनेक प्रयास किए। श्रीकृष्ण को मौत के घाट उतारने के लिए अनेक राक्षसों को गोकुल भेजा गया किन्तु एक-एक कर सभी कृष्ण के हाथों मारे गए। एक बार कंस ने कृष्ण का वध कराने के लिए अपने खास निजी सेवक तृणावर्त नामक राक्षस को गोकुल भेजा। तृणावर्त बवंडर का रूप धारण कर गोकुल पहुंचा और उसी बवंडर में श्रीकृष्ण को अपने साथ आकाश में उड़ा ले गया। उस मायावी बवंडर के चलते पूरा गोकुल थोड़े समय के लिए अंधकारमय हो गया था, इसलिए गोकुलवासी कुछ भी देखने में असमर्थ थे। बवंडर शांत होने के पश्चात् जब माता यशोदा ने श्रीकृष्ण को आंगन से गायब पाया तो वह अत्यंत चिंतित होकर रोने लगी। उधर तृणावर्त अपने मायावी बवंडर में कृष्ण को अपने साथ लेकर आकाश में उड़ तो गया, किन्तु उसी दौरान कृष्ण ने अपना भार इतना बढ़ा दिया कि तृणावर्त उस भार को संभालने में असमर्थ हो गया। इस कारण तृणावर्त के मायावी बवंडर की गति एकाएक कम हो गई और तृणावर्त के लिए आगे बढ़ना मुश्किल हो गया। तभी कृष्ण ने तृणावर्त का गला इतनी जोर से पकड़ा कि वह लाख प्रयासों के बावजूद उनसे अपना गला नहीं छुड़ा पाया और अंतत: उस भयानक राक्षस तृणावर्त के प्राण पखेरू उड़ गए। श्रीकृष्ण को खोजने निकले गोकुलवासियों ने देखा कि एक भयानक राक्षस पास की एक विशाल चट्टान पर गिरा पड़ा है, जिसके सारे अंग चकनाचूर हो चुके थे और कृष्ण उसके शरीर पर बैठे हुए थे। कृष्ण को वहां सकुशल देखकर सभी बेहद प्रसन्न हुए किन्तु सब आश्चर्यचकित भी थे कि इतने विशालकाय राक्षस को इस छोटे से बालक ने कैसे मौत के घाट उतार दिया। यह श्रीकृष्ण की अलौकिक लीला ही थी कि महाभारत युद्ध से ठीक पहले दुर्योधन मदद की गुहार लेकर सबसे पहले श्रीकृष्ण के पास द्वारिका पहुंचा और अर्जुन दुर्योधन के बाद पहुंचे। दोनों जब द्वारिकाधीश के पास पहुंचे, उस समय वे सो रहे थे। दुर्योधन उनके सिर से पास बैठ गया जबकि अर्जुन पैरों की ओर। जब श्रीकृष्ण की नींद खुली तो उनकी दृष्टि पैरों की ओर बैठे अर्जुन पर पहले पड़ी। इसलिए उन्होंने अर्जुन से उनकी नारायणी सेना या स्वयं श्रीकृष्ण में से किसी को एक को चुनने के लिए कहा। दुर्योधन ने विरोध जताते हुए कहा कि पहले वो उनके पास आया है, इसलिए उनसे कुछ मांगने का अधिकार उसे ही मिलना चाहिए। श्रीकृष्ण के हां कहने के पश्चात् दुर्योधन ने उनकी विशाल नारायणी सेना मांगी और इस तरह अर्जुन को महाभारत युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण का साथ मिला।श्रीकृष्ण को प्रेम एवं मित्रता के अनुपम प्रतीक के रूप में भी जाना जाता है। बचपन के निर्धन मित्र सुदामा को उन्होंने अपने राज्य में जो मान-सम्मान दिया, वह मित्रता का अनुकरणीय उदाकरण बना। महाभारत युद्ध के समय शांति के सभी प्रयास असफल होने पर उन्होंने संशयग्रस्त धनुर्धारी अर्जुन को ज्ञान का उपदेश देकर कर्त्तव्य मार्ग पर अग्रसर किया और अन्याय की सत्ता को उखाड़ने के लिए अपने ही कौरव भाइयों के साथ युद्ध करते हुए उन्हें अपने कर्मों का पालन करने के लिए गीता का उपदेश दिया। 

-योगेश कुमार गोयल
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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