सन्नाटा, शॉट और वह काली अंधेरी रात

रेस्क्यू आॅपरेशन: वन मंडल और वन्यजीव विभाग ने टीम भावना से दिया आॅपरेशन को अंजाम, परफेक्ट प्लानिंग, मजबूत इरादे और अचूक निशाने से धरा गया लेपर्ड, आंखों देखी खौफनाक था रात में महल का नजारा

सन्नाटा, शॉट और वह काली अंधेरी रात

आखिरकार देर रात लेपर्ड को ट्रैंकुलाइज कर लिया। इस कामयाबी के पीछे वनकर्मियों की कड़ी मेहनत, लगन और महल की डरावनी रात में डटे रहना शामिल है। इसी का नतीजा है, बुधवार रात 11.40 बजे ट्रैंकुलाइज कर अगले दिन दोपहर 1 बजे मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में छोड़ दिया।

कोटा। खौफ-दहशत और आतंक के साए में बीते 6 दिन से जी रहे नांतावासियों के लिए गुरुवार की सुबह खुशियों भरी रही। परफेक्ट प्लानिंग और मजबूत इरादों के साथ मैदान में उतरी  वन विभाग की टीम ने आखिरकार देर रात लेपर्ड को ट्रैंकुलाइज कर लिया। रेस्क्यू आॅपरेशन की सफलता रात के अंधेरे को चीरती जैसे ही महल के बाहर पहुंची तो लोगों ने पटाखें फोड़ खुशियां मनाई। नांता में जहां देर रात दिवाली जैसा माहौल था। वहीं, वन विभाग के लिए भी यह पल खास था। क्योंकि, एक ही वन की दो शाखाएं वन्यजीव और वन मंडल के बीच जबरदस्त टीम भावना नजर आई और सवाईमाधोपुर की एक्सपर्ट टीम के सहयोग से सफलतापूर्वक रेस्क्यू आॅपरेशन को अंजाम दिया। लेकिन, इस कामयाबी के पीछे वनकर्मियों की कड़ी मेहनत, लगन और महल की डरावनी रात में डटे रहना शामिल है। इसी का नतीजा है, बुधवार रात 11.40 बजे ट्रैंकुलाइज कर अगले दिन दोपहर 1 बजे मुकुंदरा टाइगर रिजर्व में छोड़ दिया। लेपर्ड नर है और उसकी उम्र करीब 4 साल है। क्षेत्रवासियों व शिक्षकों ने दोपहर को सभी वनकर्मियों का स्वागत सम्मान किया। 

सुनसान गलियां, वॉर्निंग कॉल से खड़े हुए रोंगटे
महल के बाहर तैनात वनकर्मी वीरेंद्र सिंह हाड़ा, रमेशचंद मीणा, धर्मेंद्र चौधरी ने बताया कि रात 8 बजे बाद नांता की गलियां सूनी हो गई। सर्द मौसम और बढ़ते कोहरे के बीच पक्षियों व बंदरों की वॉर्निंग कॉल से रौंगटे खड़े हो गए। रात 9 बजे का समय था। महल की दीवार से सटे बरगद के पेड़ की शाखाएं जोर-जोर से हिल रही थी। चिल्लाते बंदरों की उछलकूद सामान्य नहीं थी। वे लगातार खतरे का संकेत दे रहे थे। पेड़ की शाखाओं पर देखा तो लेपर्ड घात लगाए बैठा था।  हमारी ओर देख गुर्रा रहा था। 20-25 साथी साथ होने से वह हमारी तरफ नहीं आया और शिकार के लिए एक के बाद एक शाखाओं पर छलांग लगाता रहा।  

महल की वो काली रात... 
ट्रैंकुलाइज टीम में शामिल वन मंडल के फोरेस्टर रामस्वरूप गोचर ने बताया कि शाम 5 बजे का वक्त था। हम तीन लोग महल के अंदर थे। 4 से 5 फीट चौड़ी सीढ़ियों पर ट्रैंकुलाइज गन के साथ लेपर्ड के इंतजार में बैठे थे। मोबाइल बंद और इशारों में बात कर रहे थे। जैसे-जैसे अंधेरा गहराया वैसे खंडहर महल में रात खौफनाक होती गई। रात 9 बजे से बंदर, पक्षियों व पिंजरों में बंधे प्रे-बेस की वॉर्निंग कॉल लेपर्ड की मौजूदगी का अहसास करा  रही थी, जो 10 बजे तक जारी रहा। रात 11 बजकर 20 मिनट पर लेपर्ड पश्चिम दिशा से सीढ़ियां उतरते हुए पानी के कुंड पर पहुंचा। ट्रैंकुलाइजर की अंगुली ट्रैंकुलाइज गन के ट्रिगर पर थी । लेपर्ड  खतरे को भांपते हुए थोड़ा ठिठका। फिर कुछ कदम आगे बढ़ा और चारों तरफ देखा और बैठकर पानी पीने लगा। इसके बाद वह जैसे ही उठा तो ट्रैंकुलाइजर ने डॉट मार दिया।  निशाना सटीक बैठा तो जान में जान आई। 

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सीढ़ियों पर बिछाई राख
वन मंडल के वनरक्षक धर्मेंद्र सिंह चौधरी ने बताया कि सवाईमाधोपुर से आई टीम के सुपरविजन में दिनभर महल में रेस्क्यू अभियान की कार्ययोजना को अंतिम रूप दिया।  एस्टपर्टस ने कुंड के आसपास मौजूद 3-4 सीढ़ियों का अवलोकन किया फिर इनमें से सबसे नजदीक जगह ट्रैंकुलाइज करने के लिए चिन्हित की। शेष सीढ़ियों पर राख बिछाई गई ताकि लेपर्ड के आने और ट्रैंकुलाइज के बाद भागने पर पगमार्क मिल सके। वहीं, निशाना लगाने के लिए थोड़े उजाले के लिए कुंड के उपर 100 वॉट का बल्ब लगाया। लेपर्ड की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए रणनीति बनाई। 

6 दिन की कड़ी मेहनत, फिर मिली सफलता
अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क की रेस्क्यू टीम के इंचार्ज फोरेस्टर बुद्धराम जाट ने बताया कि 18 नवम्बर की रात महल की दीवार पर लेपर्ड दिखाई दिया। वीडियो में उसकी पुष्टि हुई। 19 नवम्बर को महल के चप्पे-चप्पे पर सर्च किया फिर मूवमेंट जानने के लिए तीन जगहों पर पिंजरे और 7 कैमरा ट्रैप लगाए। लगातार कैमरों में लेपर्ड की तस्वीरें कैद होने पर उसके मूवमेंट वाली सभी जगह और उसकी लोकेशन ट्रेस हो गई। लगातार मेहनत से एकत्रित हुआ डेटा लेपर्ड को ट्रैंकुलाइज करने में मील का पत्थर साबित हुआ।

शॉट के बाद लगा पैंथर के हमले का डर
चिकित्सक सीपी मीणा ने कहा, 11.20 बजे लेपर्ड को शॉट मारा तो वह जोर से उछला। इस वक्त वह आक्रामक तेवर में खड़ा चारों तरफ देखने लगा। वह आसपास हमारी मौजूदगी महसूस करने की कोशिश कर रहा था। हम भी सांसें रोके साइलेंट मोड पर थे। 5 मिनट बाद वह धीरे-धीरे चलने लगा फिर दौड़ता हुआ नजरों से ओझल हो गया। हमारे बाहर निकलने पर लेपर्ड द्वारा पलट कर हमले का डर था। डॉट पूरी लगी या नहीं, दवा शरीर में गई या नहीं तमाम सवाल मन में उठ रहे थे। सुरक्षा के लिए हमारे पास एक लाठी थी। हिम्मत कर सीढ़ियों का गेट खोल मौके पर पहुंचे । इंजेक्शन जमीन पर पड़ा था। जिसमें दवा नहीं होने से सफल ट्रैंकुलाइज से आश्वश्त हो गए। फिर बाहर महल के बाहर खड़ी टीम को मौके पर बुलाकर सर्च किया। वह करीब 30 मीटर दूर छत पर बेहोश मिला।

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4 फीट चौड़ी जगह में 6 घंटे एक ही पॉजिशन में किया इंतजार
ट्रैंकुलाइज एक्सपर्ट राजवीर सिंह ने बताया कि कुंड से हमारी दूरी 20 मीटर थी। शाम 5 बजे मैं अपने साथियों के साथ 4 फीट चौड़ी गैलरीनुमा सीढ़ियों पर लेपर्ड के इंतजार में बैठ गया। दीवार में छेद कर गन बाहर निकाली। शाम 6 बजे से लेपर्ड का मूवमेंट शुरू होने के साथ हम अलर्ट हो गए। साढ़े छह बजे वह महल की दीवार पर था। बंदर वॉर्निंग कॉल दे रहे थे। कभी एक दीवार से दूसरी दीवार पर छलांग लगाता तो कभी शिकार के लिए पेड़ की शाखाओं पर चढ़ता। रात 9 बजे तक यही सिलसिला जारी रहा। 10 बजे फिर से पक्षियों, बंदरों व पिंजरों में बंधे जानवर चिल्लाने लगे। लेपर्ड हमारे आसपास था। खांसने, छींकने, बात करने की इजाजत नहीं थी। लगातार 6 घंटे एक ही पोजीशन में बैठा रहना आसान नहीं था। हम इंतजार करते रहे। रात 11 बजे वह सीढ़ियों से नीचे आता नजर आया। 20 मिनट बाद वह कुंड पर पहुंचा। वह हमसे 30 से 35 फीट की दूरी पर था। गन में 4 एमएल की डॉज का इंजेक्शन लोड कर प्रेशर 6 पौंड पर रखा और अंगुली  ट्रिगर पर थी। डॉट गर्दन, आंख, पेट, छाती, हड्डी पर न लगे इसका ध्यान भी रखना था। ट्रैंकुलाइज के लिए जरूरी है कि डॉट कूल्हे पर ही लगे, इसलिए थोड़ा इंतजार किया। पानी पीने के बाद वह जैसे ही उठा तो पूरे प्रेशर के साथ डॉट मार ट्रैंकुलाइज कर लिया। वह 30 मीटर दौड़ता हुआ तीसरी मंजिल पर जाकर बेहोश हो गया। 

सर्वाधिक बाघ किए ट्रैंकुलाइज 
राजवीर ने 27 साल की नौकरी में राजस्थान में सर्वाधिक 43 बाघ ट्रैंकुलाइज किए हैं। वहीं, 34 पैंथर, 27 भालू सहित करीब 1200 एनीमल को रेस्क्यू कर चुके हैं। राजस्थान व मध्यप्रदेश में स्थित टाइगर रिजर्व व आबादी क्षेत्र में घुसे वन्यजीव को रेस्क्यू करने के लिए राजवीर को ही भेजा जाता है। 

वन कर्मियों का किया स्वागत 
लेपर्ड रेस्क्यू आॅपरेशन सफलतापूर्वक अंजाम देने और क्षेत्रवासियों को भयमुक्त करने पर सहवरित पार्षद लटूर सैनी के नेतृत्व में स्थानीय निवासियों ने वनकर्मियों का स्वागत किया। वहीं, स्कूल के शिक्षक व स्टाफ ने भी माला पहनाकर व साफा बांधकर अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क, वन मंडल व सवाईमाधोपुर से आई टीम के सदस्यों का अभिनंदन कर आभार जताया। 

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चुनौतिपूर्ण टॉस्क, टीम भावना से दिया काम को अंजाम
वन मंडल, वन्यजीव विभाग और सवाईमाधोपुर से आए एक्सपर्ट सभी ने टीम भावना से रेस्क्यू अभियान को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है। टॉस्क काफी चुनौतीपूर्ण था। क्योंकि, महल की भौगोलिक स्थिति आॅपरेशन के विपरीत थी। इसके बावजूद वन विभाग की सभी टीम एक साथ जुटी और परफेक्ट प्लानिंग व कार्यकुशलता के साथ लेपर्ड को रेस्क्यू कर लिया। गुरुवार दोपहर को उसे मुकुंदरा के दरा अभयारण्य में सुरक्षित छोड़ दिया है।  
- जयराम पांड्य, डीएफओ वन मंडल कोटा

 

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