सतरंगी सियासत

सतरंगी सियासत

कर्नाटक में कांग्रेस क्या जीती। कई क्षत्रपों के अरमान डंठे पड़ गए। इसमें ममता बनर्जी, शरद पवार, नितीश कुमार और अरविंद केजरीवाल जैसे नेता। कांग्रेस की जीत से राहुल गांधी की दावेदारी मजबूत होगी।

बीमारी नहीं गई!
कर्नाटक में सीएम का निर्णय काफी सियासी माथापच्ची के बाद हुआ। पार्टी नेतृत्व ने नाम की घोषणा करने में समय लिया। लेकिन ऐसी बातें तो परिणाम आने के बाद आंकड़े देखकर लगभग तय सी हो जातीं। अगले ही दिन विधायक दल की बैठक बुलाई गई। एक पंक्ति का प्रस्ताव पारित कर दिया। जो भी नाम आलाकमान तय करेगा। वह सभी को मान्य। उसके बावजूद खींचतान की नौबत। यही कांग्रेस की पुरानी बीमारी। जो अभी तक गई नहीं। इसीलिए कई बार सही निर्णय काफी देरी से और गलत निर्णय जल्दी से लिए जाते। वैसे यह कांग्रेस की सपाट जीत। जिसमें आम जनता चाहत। पूरे पांच साल सरकार निर्बाध चले। ताकि जनता के हित में सही निर्णय हों और उनकी ठीक से क्रियान्विती हो। अब जनता असमंजस की स्थिति नहीं चाहती! यह कांग्रेस को समझना होगा। वैसे भी राजनीति में अब हर तौर-तरीका बदल चुका।

अरमान ठंडे!
कर्नाटक में कांग्रेस क्या जीती। कई क्षत्रपों के अरमान डंठे पड़ गए। इसमें ममता बनर्जी, शरद पवार, नितीश कुमार और अरविंद केजरीवाल जैसे नेता। कांग्रेस की जीत से राहुल गांधी की दावेदारी मजबूत होगी। वैसे कई क्षत्रप मजबूरी में कांग्रेस के साथ। क्योंकि मोदी से पटरी बैठेगी नहीं। सो, कांग्रेस के साथ जाने का ही विकल्प शेष। लेकिन क्षत्रपों का इरादा इसकी पूरी कीमत वसूलने का। वहीं, कांग्रेस को भी पूरा हिस्सा चाहिए। संयुक्त विपक्ष का प्रत्याशी उतारने की स्थिति में उसे अधिकतम लोकसभा सीटें चाहिए। अब क्षत्रप किस आंकड़े पर मानेंगे। यह देखने वाली बात। वैसे कांग्रेस की मंशा। विधानसभा चुनावों में वह क्षेत्रीय दलों के पीछे चलेगी। यदि लोकसभा चुनाव में क्षेत्रीय दल कांग्रेस के पीछे चलें। पर यह फामूर्ला कई दलों को नहीं भाता। विपक्षी एकता की बड़ी बाधा भी यही। असल में, अपनी राजनीतिक जमीन कोई नहीं छोड़ना चाहता।

अल्टीमेटम!
तो सचिन पायलट ने सीएम गहलोत को 15 दिन में तीन मांगे मानने का अल्टिमेटम दे डाला। सवाल यह कि नौबत यहां तक क्यों आ गई? लग रहा। उन्होंने टाइमिंग बहुत सोच समझकर तय की। जब कर्नाटक में मतदान होने वाला था। उसके एक दिन पहले उन्होंने जन संघर्ष पदयात्रा की घोषणा की। जब मतदान हो गया। उसके अगले दिन पायलट सड़क पर उतर गए। इसी बीच, 13 मई को परिणाम आ गया। यह नतीजा कई के लिए अच्छा और कई को परेशान कर रहा। केवल कांग्रेस में ही नहीं। बल्कि भाजपा में भी यही आलम। पायलट की गतिविधियों पर आलाकमान की नजर। एक राय यह कि अब पायलट पर नरमी बरती जाएगी। वहीं, दूसरी राय यह कि उनके हाल पर छोड़ा जाएगा। विधानसभा चुनाव गहलोत की अगुवाई में ही होंगे। ऐसी चर्चा। लेकिन होगा क्या? यह कोई पूरे विश्वास से नहीं कह सकता।

खदबदाहट!
राजनीतिक हलचल तो राजस्थान भाजपा में भी। वहां सीएम के संभावित दावेदार बढ़ते ही जा रहे। अब पीएम मोदी ने अर्जुनराम मेघवाल का राजनीतिक कद बढ़ाकर एक और लकीर खींच दी। वैसे चर्चा मेघवाल को चुनाव अभियान समिति की कमान देने की थी। लेकिन अब वह कानून मंत्री (स्वतंत्र प्रभार)। मतलब मोदी की नजर कहीं आगे। सो, अब असल खदबदाहट तो वसुंधरा कैंप में भी बताई जा रही। उन्हें चुनाव से पहले बड़ी जिम्मेदारी मिलने की चर्चा। और कैंपेन कमेटी की अगुवाई बची हुई। ऐसे में उनके बारे में शीर्ष भाजपा नेतृत्व कब, क्या निर्णय करेगा। यह समय बताएगा। लेकिन जानकारों की नजर तो बराबर लगी ही हुई। वैसे कर्नाटक की हार से कई राजनीतिक समीकरण गड़बड़ा गए। अब यह किसके पक्ष में और किसके खिलाफ जाएंगे। यह भी देखने वाली बात। लेकिन फिलहाल जितनी हलचल कांग्रेस में। उससे कम भाजपा में भी नहीं!

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हनक बरकरार!
कर्नाटक प्रकरण से साफ हो गया। गांधी परिवार की कांग्रेस में हनक बरकरार। पांच दिन तक चले घटनाक्रम के बाद तय हो पाया। कर्नाटक का मुख्यमंत्री कौन होगा? इसमें भी अंतिम बात सोनिया गांधी की ही मानी गई। जब उन्होंने खुद देर रात डीके को कॉल किया। इससे पहले डीके और सिद्धारमैया कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी से मिले। लेकिन बात बनी नहीं। या कह लें। इसे लंबा खींचा गया। क्योंकि मामला सत्ता के बंटवारे और इसमें अपना हिस्सा बटोर लेने का था। जबकि रविवार 14 मई की शाम को विधायक दल की बैठक में प्रस्ताव पारित कर दिया गया। कांग्रेस आलाकमान का निर्णय सभी को मंजूर। उसके बावजूद घंटों लंबा मंथन, चर्चा और विचार-विमर्श चला। खुद खड़गे बोले, पार्टी आलाकमान निर्णय करेगा। लेकिन अंतिम फैसला सोनिया गांधी का कॉल जाने के बाद ही हुआ। मतलब गांधी परिवार का रूआब बरकरार।

आमने-सामने!
पाकिस्तान में सेना और इमरान खान की पार्टी पीटीआई आमने-सामने। ऐसा पाक में पहली बार। वहां सेना का मतलब, मुल्क की तारणहार, पालनहार, खैवनहार। लेकिन क्रिकेटर से नेता बने इमरान के समर्थकों ने सेना का सारा तिलिस्म तोड़ दिया। दशकों से गढ़ा गया आभासी रूआब उतार दिया। इसमें बहुत हद तक वहां का सुप्रीम कोर्ट भी इमरान के साथ। कोर्ट के इस रवैये से वहां का वर्तमान निजाम भी असहज। क्योंकि कोर्ट ने सरकार के न चाहते हुए भी इमरान को जमानत दे दी। इधर, सेना प्रमुख जनरल मुनीर ने सख्ती से कहा। कार्रवाई होगी। लेकिन कब और किस स्तर की? क्या वर्तमान हालात में सेना कुछ भी करने में सक्षम? जब जनता सड़कों पर। सेना के खिलाफ नारेबाजी ही नहीं। बल्कि अवाम हिंसा पर उतारू। सेना के ठिकानों में भीड़ धुस गई। सो, अब बचा क्या? जब विवाद इस स्तर पर आ गया!

संकेत!
पीएम मोदी 28 मई को नए संसद भवन का उद्घाटन करेंगे। यह अपने आप में ऐतिहासिक होगा। पीएम लगातार देश की जनता से गुलामी की मानसिकता एवं चिन्हों को पीछे छोड़ने का आहवान कर रहे। सो, सियासी जानकार 28 मई का मतलब निकाल रहे। वैसे 28 मई को स्वातंत्र्य वीर विनायक दामोदर सावरकर की जन्मतिथि। जिन पर विपक्षी नेता राहुल गांधी काफी मुखर और आक्रामक। हां, भाजपा की ओर से प्रतिवाद स्वाभाविक। यहां तक कि शिवसेना (उद्धव गुट) भी कांग्रेस के इस रवैये से नाराज। इस इमारत के निर्माण पर भी कांग्रेस को कड़ी आपत्ति रही। जबकि सरकार का तर्क। वर्तमान संसद भवन अगले 50 सालों की आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम नहीं। ऐसे में यह मामला आम चुनाव में गर्माएगा। फिर वैसे भी मोदी के अधिकांश एक्शन राजनीतिक दृष्टिकोण लिए हुए रहते। मतलब, क्या अगला चुनाव हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर होगा?      

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