विश्व के लिए चुनौती बनता मानसिक अवसाद

विश्व के लिए चुनौती बनता मानसिक अवसाद

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्वास्थ्य का अर्थ केवल बीमारी न होना और शारीरिक सेहत से नहीं होता। बल्कि स्वास्थ्य सामाजिक, मानसिक और शारीरिक तीनों से जुड़ा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्वास्थ्य का अर्थ केवल बीमारी न होना और शारीरिक सेहत से नहीं होता। बल्कि स्वास्थ्य सामाजिक, मानसिक और शारीरिक तीनों से जुड़ा है। इन तीनों में जहां भी व्यक्ति कमजोर है वहां वो अस्वस्थ माना जाता है। उसे सेहतमंद नहीं कह सकते। अच्छी सेहत वाला व्यक्ति वो है, जो इन सभी मानकों पर खुश है और हर स्तर पर अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रहा है। जो जीवन में सामान्य तनावों का सामना करने में सक्षम है। उत्पादक तरीके से काम करता है। अपने समुदाय में योगदान देने में तैयार है। दरअसल मानसिक स्वास्थ्य का संबंध इंसान के भावनात्मक पहलू से है, जो उसके सोचने, समझने, कार्य करने की शक्ति को प्रभावित करता है। यूं तो मानसिक विकार कई तरह के होते हैं। मसलन डिमेंशिया, तनाव, चिंता, भूलना, अवसाद, डिस्लेसिया आदि। लेकिन इन सभी में अवसाद ऐसा मनोविकार है जिससे पूरी दुनिया त्रस्त है। हर आयु, वर्ग का व्यक्ति आज मानसिक अवसाद के दौर से गुजर रहा है। इस अवसाद के तमाम कारण सामने आ रहे हैं।

डब्लूएचओ के अनुसार पिछले एक दशक में तनाव और अवसाद के मामले में 18 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। भारत की करीब 6.5 प्रतिशत से 7.5 प्रतिशत आबादी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी मेंटल हेल्थ के मुद्दे के प्रति न्यायपालिका को संवेदनशील होने पर जोर देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य को वनसाइज फिट फॉर ऑल के दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए। अच्छी मेंटल हेल्थ हर व्यक्ति का मानवाधिकार है। जिससे उसे वंचित नहीं किया जा सकता। गौरतलब है कि मेंटल स्ट्रेस आनुवांशिक, सामाजिक, आर्थिक, पारिवारिक हर तरह की हो सकती है। इस अवस्था से किसी इंसान को बाहर निकालना आज के समय में सबसे बड़ी चुनौती है। जिससे डॉक्टर और एक्सपर्ट्स भी परेशान हैं। देखा गया है कि कई बार प्रारंभिक जीवन के बुरे अनुभव, हादसे और घटनाएं मन को इतना इफेक्ट करती हैं कि उनके असर से इंसान मेंटली इल हो जाता है। एक प्रकार के मनोविकारों का शिकार हो जाता है। ये मनोविकार और नकारात्मकता उसके मन और सेहत दोनों को खराब करती जाती है। मानसिक अवसाद का बड़ा कारण बेरोजगारी और गरीबी भी है। 2011 की जनगणना के अनुसार देखें तो आंकड़े बताते हैं कि मानसिक रोगों से ग्रस्त करीब 78.62 प्रतिशत लोग बेरोजगारी से जूझ रहे हैं। आज युवाओं में बढ़ते आत्महत्या के मामले भी इसकी पुष्टि करते हैं। कि बेरोजगारी से परेशान युवा इस कदर मानसिक नकारात्मकता के दौर से गुजर रहे हैं कि वो सुसाइड जैसा गंभीर कदम उठाने को मजबूर हैं। ये आंकड़े इशारा करते हैं कि युवाओं में तेजी से मानसिक अवसाद फैल रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार जब किसी देश की आर्थिक हालत गंभीर होती है तो वहां मानसिक अवसाद भी बढ़ जाता है।

डब्लूएचओ ने 2013 में मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य के बराबर महत्व देते हुए वर्ल्ड हेल्थ एसेंबली में एक व्यापक मानसिक स्वास्थ्य कार्य योजना को मंजूरी दी थी। जो 2013-2020 तक के लिए थी। इस कार्य योजना में सभी देशों ने मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने की कसम खाई थी। भारत ने भी इस कार्य योजना को अपने यहां लागू किया था। लेकिन आज भी भारत में मेंटल हेल्थ के हालात भयावह हैं। इसके पीछे तमाम कारण है। इसमें बड़ा कारण मेंटल हेल्थ पर खर्च होने वाला बजट है। आज भी भारत में मानसिक स्वास्थ्य पर किया जाने वाला व्यय बहुत कम है। भारत अपने कुल सरकारी स्वास्थ्य व्यय का मात्र 1.3 प्रतिशत ही मेंटल हेल्थ पर खर्च करता है। 2011 की जनगणना के अनुसार 1.5 मिलियन लोग बौद्धिक अक्षमता और तकरीबन 722826 लोग मनोसामाजिक दिव्यांगता का शिकार हुए थे।
यह संख्या पिछले दस सालों में करीब दोगुनी हो गई है। लेकिन उस पर खर्च होने वाला बजट आज भी कम है। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों, की कमी भी एक महत्वपूर्ण कारण है। डब्लूएचओ के अनुसार साल 2011 में भारत में मेंटल इलनेस से पीड़ित प्रत्येक एक लाख रोगियों के लिए 0.301 मनोचिकित्सक और 0.07 मनोवैज्ञानिक थे। यह हालत पिछले दस सालों में बहुत बेहतर नहीं हुई है। आंकड़े बताते हैं कि साल 2017 में भारत की विशाल जनसंख्या के लिए मात्र 5 हजार मनोचिकित्सक और 2000 से भी कम मनोवैज्ञानिक थे।वहीं कॉमनवेल्थ देशों के नियमानुसार प्रति दस हजार पर पांच मनोचिकित्सक होना चाहिए। हाल में जारी वैश्विक प्रसन्नता सूचकांक के आंकड़े दर्शाते हैं कि भारत में पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं कम प्रसन्न और तनावग्रस्त अधिक होती हैं। इसलिए यहां महिला आत्महत्या दर पुरुषों से कहीं ज्यादा है। दरअसल भारत में घरेलू हिंसा, कम उम्र में शादी, युवा मातृत्व, लैंगिक भेदभाव काफी है। जो महिलाओं में मानसिक अवसाद और मनोविकारों का प्रमुख कारण है।

-सीमा अग्रवाल
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

Read More प्रवासी कामगारों से मजबूत होती अर्थव्यवस्था

 

Read More जानिए क्या है राजकाज में खास

Read More लू से जिंदगी की जंग हार जाते हैं डेढ़ लाख से अधिक लोग

 

Read More जानिए क्या है राजकाज में खास

Read More लू से जिंदगी की जंग हार जाते हैं डेढ़ लाख से अधिक लोग

Post Comment

Comment List

Latest News

नौतपा से पहले ही तपा प्रदेश, अगले तीन-चार दिन तक भीषण गर्मी का रेड अलर्ट नौतपा से पहले ही तपा प्रदेश, अगले तीन-चार दिन तक भीषण गर्मी का रेड अलर्ट
चिकित्साकर्मियों के अवकाश निरस्त, चिकित्साकर्मी विशेष परिस्थितियों में ही सक्षम स्तर से स्वीकृति उपरांत ही अवकाश पर जा सकेंगे।
मुख्य सचिव की सहमति: महंगी बिजली खरीदकर सप्लाई सुचारू करेगी सरकार
टीबी दवाओं की आपूर्ति स्थानीय स्तर पर खरीद कर उपलब्ध करवाई जा रही दवा, केंद्र से आपूर्ति बाधित
जहां पर समर्थन मूल्य पर सरसों चना की खरीद रहेगी शून्य, वे खरीद केंद्र अगले सीजन में होंगे बंद
फर्जी चेकिंग निरीक्षक बन कर रहा था बस चैक, पकड़ा
डंपर की टक्कर से बाइक सवार की मौत, एक घायल
लाखेरी का जिग जेग बांध प्रशासन की अनदेखी के चलते खाली हुआ