हाथरस हादसे की जवाबदेही तय हो 

घटना ने पूरे देश को विचलित किया है

हाथरस हादसे की जवाबदेही तय हो 

हाथरस की घटना कितनी अधिक गंभीर एवं चिन्ताजनक हैं, इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री ने लोकसभा में अपने संबोधन के बीच इस हादसे की जानकारी दी एवं शोक-संवेदना व्यक्त की।

उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक सत्संग के समापन के बाद मची भगदड़ में एक सौ इक्कीस लोगों के मरने एवं सैकड़ों लोगों के घायल होने की हृदयविदारक, दु:खद एवं दर्दनाक घटना ने पूरे देश को विचलित किया है। ऐसी घटनाएं न केवल प्रशासन की लापरवाही और गैर जिम्मेदारी को उजागर कर रही हैं बल्कि धर्म के नाम पर पनप रहे आडम्बर, अंधविश्वास एवं पाखण्ड को भी उजागर कर रही हैं। ऐसी त्रासदियां एवं दिल को दहलाने देने वाली घटनाओं से जुड़े पाखण्डी बाबाओं की कारगुजारियों से  धर्म भी बदनाम हो रहा है। यह हादसा अनेक सवालों को खड़ा करता है, बड़ा सवाल है कि ऐसे बड़े आयोजन में सुरक्षा उपायों की अनदेखी क्यों होती है? सवाल उठता है कि इतना बड़ा आयोजन बिना पुख्ता इंतजाम के किसकी अनुमति से किया जा रहा था? क्या सुरक्षा मानकों का पालन किया गया? क्या इतने बड़े आयोजन की सुरक्षा का जिम्मा पुलिस-प्रशासन का नहीं होता? क्या आयोजन-स्थल पर निकास द्वार, पानी, हवा, वैकल्पिक चिकित्सा एवं चिकित्सक, गर्मी से बचने के पुख्ता इंजताम जरूरी नहीं थे? जवाबदेही तय हो भगदड़ में गयी जानों की। जाहिर है मौतों के बढ़ते आंकड़ों के साथ ही घटना पर लीपापोती की कोशिश भी जमकर होगी, राजनीतिक दल एक- दूसरे को जिम्मेदार ठहराते हुए जमकर राजनीति भी करेंगे।  हाथरस के सिकंदराराऊ के निकट फुलरई के एक खेत में कथित हरि बाबा के एक दिवसीय सत्संग के दौरान यह हादसा हुआ। इस बाबा से जुड़ी बातें विसंगतियों से भरी है। सफेद कोट-पेंट, टाई पहनने वाला यह बाबा कोई पंडित नही है न साधु संत है, यह जूता पहनकर प्रवचन देता था। इस बाबा को कितने वेद पुराण का ज्ञान है? यह किस परंपरा से है? इसके गुरु कौन हैं? ऐसे अनेक प्रश्न हैं जो बाबा को शक एवं संदेह के घेरे में लेते हैं। यह बाबा पहले पुलिस सेवा में थे और जिनका मैनपुरी में भव्य एवं महलनुमा आश्रम है। घटना के बाद बाबा फरार है। पुलिस उसकी तलाश में जुटी है। भारत में भोली-भाली जनता को ठगने एवं गुमराह करने वाले ऐसे पाखण्डी बाबाओं की बाढ़ आई हुई है। इस तरह की घटनाएं केवल जनहानि का कारण ही नहीं बनतीं, बल्कि देश एवं धर्म की बदनामी भी कराती हैं। इन घटनाओं पर पीड़ितों के प्रति संवेदना व्यक्त करने के बजाए राजनीति करना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है और निंदनीय भी।

हाथरस की घटना कितनी अधिक गंभीर एवं चिन्ताजनक हैं, इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री ने लोकसभा में अपने संबोधन के बीच इस हादसे की जानकारी दी एवं शोक-संवेदना व्यक्त की। दुनिया भर में इस घटना को लेकर दु:ख जताया जा रहा है। प्रश्न यह भी है कि आखिर धार्मिक आयोजनों में धर्म-कर्म का उपदेश देने वाले लोगों को संयम और अनुशासन की सीख क्यों नहीं दे पाते? कब तक ऐसे आयोजन धन कमाने के माध्यम बनते रहेंगे, जब- जब धर्म का ऐसे पाखण्ड एवं पाखण्डियों से गठबंधन हुआ है, तब तक धर्म अपने विशुद्ध स्थान से खिसका है। यह प्रश्न इसलिए, क्योंकि कई बार ऐसे आयोजनों में भगदड़ का कारण लोगों का असंयमित व्यवहार भी बनता है। ऐसा लगता है कि अपने देश में धार्मिक-सामाजिक आयोजनों में कोई इसकी परवाह नहीं करता कि यदि भारी भीड़ के चलते अव्यवस्था फैल गई तो उसे कैसे संभाला जाएगा? क्या इसलिए कि प्राय: मारे जाने वाले लोग निर्धन एवं गरीब वर्ग के होते हैं? एक डरावनी एवं संवेदनहीन हकीकत है कि हम ऐसे धर्म एवं धार्मिकता से जुड़े पिछले हादसों से कोई सबक नहीं सीखते। हाल के दिनों में भीड़भाड़ वाले धार्मिक आयोजनों में भगदड़ में लोगों के मरने के मामले लगातार बढ़े हैं। सवाल उठना स्वाभाविक है कि भीड़ के बीच होने वाले हादसों को कैसे रोका जाए।  

यह हैरानी की बात है कि किसी ने यह देखने-समझने की कोई कोशिश नहीं की कि भारी भीड़ को संभालने की पर्याप्त व्यवस्था है या नहीं? यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं  कि इस आयोजन की अनुमति देने वाले अधिकारियों ने भी कागजी खानापूर्ति करके कर्तव्य की इतिश्री कर ली। यदि ऐसा नहीं होता तो किसी ने इस पर अवश्य ध्यान दिया होता कि आयोजन स्थल के पास का गड्ढा लोगों की जान जोखिम में डाल सकता है। जैसे-जैसे जीवन में धर्म का पाखण्ड फैलता जा रहा है, सुरक्षा उतनी ही कम हो रही है, जैसे-जैसे प्रशासनिक सर्तकता की बात सुनाई देती है, वैसे-वैसे प्रशासनिक कोताही के सबूत सामने आते हैं, ऐसे आयोजनों में मरने वालों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन हर बड़ी दुर्घटना कुछ शोर-शराबे के बाद एक और नई दुर्घटना की बाट जोहने लगती है। बहरहाल आने वाले दिनों में जांच के बाद किसी के सिर पर लापरवाही का ठीकरा फोड़ा जाएगा। 

  -ललित गर्ग
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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