वंचितों को ही मिले आरक्षण का लाभ

आरक्षण की नीति स्वीकार की गई

वंचितों को ही मिले आरक्षण का लाभ

सुप्रीम कोर्ट ने एन नागराज केस में स्पष्ट कहा है आरक्षित वर्ग के जो लोग सामाजिक रूप से पिछड़े नहीं रहे, उनके स्थान पर उसी वर्ग के उन लोगों को लाभ मिलना चाहिए, जो अब तक वंचित है।

सुप्रीम कोर्ट ने एन नागराज केस में स्पष्ट कहा है आरक्षित वर्ग के जो लोग सामाजिक रूप से पिछड़े नहीं रहे, उनके स्थान पर उसी वर्ग के उन लोगों को लाभ दिया जाना चाहिए, जो अब तक वंचित है। आरके सबरवाल बनाम पंजाब में इसे दोहराया है और कहा कि सूचियों का रिवीजन हो, अपवर्जन का सिद्धान्त अपनाया जाए। न्यायालय ने कहा है आरक्षण का लाभ राजनीतिक रूप से सजग, शिक्षित, भूमिधारी, सत्ताधारी व्यक्ति उठा रहे हैं। आरक्षित वर्ग में वंचितों की संख्या बढ़ रही है। रत में निषेदों व नियोग्यताओं के चलते दलितों, जनजातियों व अत्यधिक सामाजिक शैक्षणिक  रूप से पिछड़ों को सामाजिक भेदभाव असमानता, अशिक्षा और शोषण के बीच सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व नहीं मिला। ऐसे वर्गों को संविधान निर्माण के समय, हितकार भेदभाव की नीति अपनाकर उन्हें समान स्तर पर लाने के लिए आरक्षण की नीति स्वीकार की गई। राजनीतिक आरक्षण के लिए स्वयं डॉ. अम्बेडकर ने दस वर्ष की अवधि का प्रावधान किया, जो समय-समय पर अब बढ़ती हुई 70 साल तक बढ़ाई जाती रही। आरक्षण साधन नहीं साध्य हो गया।

संविधान निर्माताओं की मंशा व इरादा स्थायी रूप से आरक्षण की बैशाखी थमाने का नहीं था। डॉ. किरोड़ी लाल मीणा 1985 में विधायक बने। जसकौर 1985 शिक्षा विभाग में प्रिंसीपल थी। तब से दोनों अनेक बार विधायक, एम.पी. राज्य व केन्द्र में मंत्री रहे। जसकौर मीणा ने अब 70 साल बाद अनुसूचित जनजाति मीणा समाज में शिक्षित, समृद्ध, पर्याप्त उच्चता प्राप्त व पदस्थापितों को अपने स्वजातीय अब तक आरक्षण के लाभ सुविधाओं व विशेष सहायता से वंचित मीणा परिवारों को लाभ देने के लिए स्वयं के परिवार को लाभ नहीं लेने-देने की बात कही है। जिस पर बवाल मचा है। उन्होंने राजनीतिक आरक्षण के संबंध में बात नहीं कही है। कदाचित जसकौर का लक्ष्य व्यक्तिगत केवल हित व सामाजिक हित के बीच सामंजस्य स्थापित करने का है। परिणाम की समानता का सिद्धान्त ही वास्तविक समतावादी सिद्धान्त हैं। जनजाति आरक्षण में जब हम निर्बल और बलवान को समान रूप से प्रतियोगिता में उतारते हैं तो पर्याप्त उन्नत सुविधा सम्पन्न बलवान का पक्ष स्वत: ही बन जाता है। प्रतियोगिता हास्यास्पद बन जाती है। राजनीतिक शक्ति पूरे समाज के सामाजिक आर्थिक क्षेत्र को प्रभावित करती है। जनजाति समाज में असमानता के रहते हुए समानता का व्यवहार असमानता में और अधिक वृद्धि करेगा।

उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट कहा है आरक्षित वर्ग के जो लोग सामाजिक रूप से पिछडेÞ नहीं रहे, उनके स्थान पर उसी वर्ग के उन लोगों को लाभ मिलना चाहिए, जो अब तक वंचित है। आर.के. सबरवाल बनाम पंजाब में इसे दोहराया है और कहा है समय -समय पर सूचियों का रिवीजन हो, अपवर्जन का सिद्धान्त अपनाया जाएं। न्यायालय ने कहा है आरक्षण का लाभ राजनीतिक रूप से सजग, शिक्षित, भूमिधारी, सत्ताधारी व्यक्ति उठा रहे हैं आरक्षित वर्ग में वंचितों की संख्या बढ़ रही है। आरक्षण व्यवस्था दिशा-निर्देश भी है। जिन्होंने आरक्षण का अधिकार प्राप्त कर अपने को सभ्य व सक्षम बना लिया, शहर के महंगें इलाकों में भव्य मकानों के निवासी हैं, परिवार को प्रत्येक सदस्य गाड़ी लेकर बाहर निकलता है, बच्चे उच्च शिक्षण संस्थाओं में पढ़ रहे हैं। राज्य सत्ता में हावी हो रहे हैं, अपने गरीब अशिक्षित भाइयों को भूलकर उनके हक का लाभ प्राप्त कर रहे हैं। सामाजिक, आर्थिक राजनीतिक ताकत हाथ में है, उन्हें नियम कायदों से हतोत्साहित कर सीमित कर उनके वर्गों के (आश्रितों) वंचित लोगों को अधिकार पहुंचाना होगा। संविधान निर्माताओं की मंशा सक्षम को स्थायी बैशाखी थमाने की नहीं थी। नीति अनुरूप नीयत व क्रियान्वयन नहीं होने से असमानता व वंचितों को विशेष अवसर प्रदान करने का साधन नहीं रहा। राजनीतिक हथियार बन गया। अत्यधिक वंचितों का साधन नहीं रहा।

आरक्षण को अब राजनीतिक चश्मे से देखा जा रहा है। फलस्वरूप एक तरफा हो रहा है। आधार सम्यक नहीं रहा, उसका लाभ अन्य को नहीं मिला है। अन्यथा समानता का कोई अर्थ नहीं है। विकसित को चाहे अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का हो नागरिकता का आधुनिक बोध आवश्यक है। उसके वर्ग के वंचित को लाभ नहीं मिले व कुछ समृद्ध उन्नत ही लाभ लेते रहे यह सामाजिक न्याय नहीं है। अधिक शक्तिशाली लोग अपने वर्ग का सम्पूर्ण लाभ उठाते रहे यह हितकर भेदभाव, की नीति के विरूद्ध है। राष्ट्र की मजबूती के लिए हर अंग मजबूत है, उनमें गहरी सामाजिक एकता व समानता हो, आरक्षण को राजनीतिक चश्में से न देखा जाए, लाभ अन्य तक पहुंचे यह देखना समाज का कर्तव्य है। आरक्षण का लाभ जब उन्नत ही उठाएंगे और सबसे पिछड़ों को वंचित कर देंगे, शिक्षा, स्कालरशिप, नि:शुल्क आवास जब वर्ग में उन्नत समृद्ध, विकसित ही उठाएंगे तो वर्गों में सामाजिक असमानता बढ़ेगी।

यदि उच्च्तम न्यायालय के निर्णयों का पालन नहीं होगा, सक्षम संपन्न, शक्तिशाली व उन्नत परिवार ही लाभ उठाएंगे, तो आरक्षित वर्ग के दबे कुचले, वंचित, शोषित आगे नहीं बढ़ पाएंगे। असमानता कम नहीं होगी, असंतोष बढ़ेगा। उच्चतम न्यायालय के फैसलों के अनुसार क्रीमीलेयर लागू करना होगा। यदि आईएएस, आईपीएस, विधायक, लोकसभा सदस्य, सामाजिक, शैक्षणिक आर्थिक रूप से सम्पन्न अपने परिवार के बच्चों को ही लाभ दिलाएंगे, तो अन्य अत्यन्त दुर्बल परिवार के बच्चों को लाभ नहीं मिलेगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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