अमेरिकी का ईरान में हमला : होर्मुज जलडमरूमध्य के निकट मिसाइल ठिकानों पर की बमबारी, कहा- अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए थी खतरा

अमेरिका को किसी की मदद की आवश्यकता नहीं

अमेरिकी का ईरान में हमला : होर्मुज जलडमरूमध्य के निकट मिसाइल ठिकानों पर की बमबारी, कहा- अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए थी खतरा

अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य के पास ईरान के मिसाइल ठिकानों पर 5,000 पाउंड के बंकर-बस्टर बमों से हमला किया। ये ठिकाने अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए खतरा माने जा रहे थे। ट्रम्प ने अभियान जारी रखने की बात कही, जबकि सहयोगियों ने एस्कॉर्ट मिशन ठुकराया। ईरान ने चेतावनी दी। रिपोर्ट के मुताबिक, जलडमरूमध्य बंद होने पर तेल सप्लाई गंभीर रूप से प्रभावित होगी।

वाशिंगटन। अमेरिका के सैन्य बलों ने ईरान के तट के पास होर्मुज जलडमरूमध्य के निकट स्थित ईरानी मिसाइल ठिकानों पर हमला किया है। अमेरिकी केन्द्रीय कमान ने मंगलवार को सोशल मीडिया मंच एक्स पर यह जानकारी दी।  कमान ने कहा कि कुछ घंटे पहले अमेरिकी बलों ने होर्मुज जलडमरूमध्य के पास ईरान के तटवर्ती क्षेत्र में स्थित सुदृढ़ (हार्डन) ईरानी मिसाइल ठिकानों पर 5,000 पाउंड के गहरे पैठ बनाने वाले कई बमों का सफलतापूर्वक उपयोग किया। कमान के अनुसार, इन ठिकानों पर मौजूद ईरानी एंटी-शिप क्रूज मिसाइलें जलडमरूमध्य से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय जहाजों के लिए खतरा मानी जा रही थीं। इससे पहले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने संवाददाताओं से कहा कि वाशिंगटन ईरान के खिलाफ अपने हमले समाप्त करने के लिए अभी तैयार नहीं है और यह अभियान अब तीसरे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है।

ट्रम्प ने यह भी स्वीकार किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित आवाजाही के लिए संयुक्त एस्कॉर्ट मिशन का उनका प्रस्ताव अधिकांश नाटो देशों और अमेरिकी सहयोगियों ने अस्वीकार कर दिया है। उन्होंने इस पर निराशा जताते हुए कहा कि अमेरिका को किसी की मदद की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि जापान, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया ने भी इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया है। ईरान की संसद के अध्यक्ष मोहम्मद-बाकर ग़ालिबाफ ने सोशल मीडिया एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य युद्ध-पूर्व स्थिति में नहीं लौटेगा, हालांकि उन्होंने इसके बारे में अधिक विवरण नहीं दिया।

जेपी मॉर्गन की एक हालिया रिपोर्ट में विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह बंद हो जाता है, तो पश्चिम एशिया के तेल उत्पादक देश अधिकतम 25 दिनों तक ही उत्पादन बनाए रख सकेंगे। सऊदी अरब, इराक, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और स्वयं ईरान अपने कच्चे तेल के निर्यात के लिए इस संकरे मार्ग पर निर्भर हैं।

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