जयललिता की सम्पत्ति तमिलनाडु सरकार को
दोनों ही अपने समय के बड़े नेता थे
वहां जयललिता की अधिकृत सम्पत्तियों का जो विवरण पेश किया गया, उसके अनुसार कुल सम्पत्तियां लगभग 188 करोड़ रुपये की थी।
रामचंद्रन और जयललिता फिल्म उद्योग से राजनीति में आए थे। दोनों ही अपने समय के बड़े नेता थे। जब रामचंद्रन, जिन्हें एमजी आर के नाम से पुकारा जाता था, द्रमुक को छोड़ अपनी पार्टी अन्नाद्रमुक बनाई तो जयललिता उनके साथ हो गई। एमजीआर के जीवनकाल में ही जयललिता को उनका राजनीतिक उत्तराधिकारी माना जाने लगा था। अपने देहावसान से पहले वे कोई वसीयत नहीं छोड़ गई थी, उनकी भतीजी दीपा तथा भतीजे दीपक ने अपने आप को जयललिता का उत्तराधिकारी होने का दावा जताया।
लगभग दो दशक के लम्बे विवाद के बाद तमिलनाडु की छह बार मुख्यमंत्री और अन्नाद्रमुक की मुखिया रही स्वर्गीय जयललिता की परिसम्पतियों पर तमिलनाडु की सरकार का हक मानते हुए सीबीआई की विशेष अदालत ने तीन बक्सों में बंद ये परिसम्पत्तियां तमिलनाडु सरकार के अधिकारियों के एक दल को सौंप दी। जयललिता की इन सम्पत्तियों को आय से अधिक सम्पति के मामले में सीबीआई ने जब्त कर रखा था। इस मामले का लम्बा मुकदमा बंगलुरु की विशेष अदालत में चला था, इसलिए इसी अदालत में ये परिसम्पत्तियां तमिलनाडु सरकार के सीनियर प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों को सौंपी दी गई। इन सम्पत्तियों में जयललिता के 27 किलो सोने के आभूषण, लगभग 1550 एकड़ जमीन से सम्बंधित दस्तावेज तथा 10 करोड़ रुपये की बैंक में जमा राशि शमिल थी। अधिकृत रूप से मिली जानकारी के अनुसार बहुत से आभूषण रत्न जड़ित हैं। अदालत ने तमिलनाडु सरकार को इन सम्पत्तियों का रिजर्व बैंक से मूल्यांकन करवा कर नीलम किए जाने का अधिकार भी दिया है। इस मामले में जयललिता को 4 साल की सजा और 20 करोड़ रुपये जुर्माना हुआ था। जयललिता के आवेदन पर मद्रास हाई कोर्ट ने उनके खिलाफ मुकदमा राज्य से बाहर बंगलुरु में चलाया था, इसलिए अदालत ने जुर्माने की राशि में से 13 करोड़ रुपये कर्नाटक सरकार को देने के लिए कहा था। कर्नाटक सरकार का कहना था कि यहां मुकदमा चलने की वजह से उसका बड़ा खर्चा हुआ था। जब तक सुप्रीम कोर्ट ने जयललिता को इस मामले में बरी नहीं किया था तब तक वे अपनी गहरी मित्र शशिकला, जो इस मामले में सह अभियुक्त थी और उसको भी सजा हुई थी और वह बंगलुरु की जेल में रहीं थी।
आय से अधिक सम्पत्ति मामला 1995-96 में शुरू हुआ था, जब जयललिता ने अपने दत्तक पुत्र की शादी बड़ी धूम धाम से की थी, बताया जाता है कि उस समय शादी पर कई करोड़ रुपये खर्च हुए थे। इसी को लेकर तब जनता पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने अदालत में आय से अधिक धन का मामला पेश करते हुए जयललिता के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। अदालत ने यह मामला सीबीआई को सौंप दिया था, उनके विशाल आवास पायस गार्डन पर छापा डाला गया, वहां से जमीन और निवेश से जुड़े दस्तावेजों के साथ 27 किलो सोने के आभूषण, 1250 किलो चांदी के बर्तन, दस हजार साड़ियां, 750 जोड़ी सैंडल तथा 90 महंगी घड़ियां बरामद हुई थी। बाद में वहां बनी द्रमुक सरकार ने उनके खिलाफ अभियान चलाया और उनको जेल में भी डाल दिया गया। 1991 और 2016 के बीच वे सत्ता मेंआती जाती रहीं, इसलिए उनके मुकदमे में कभी तेजी आई तो कभी मुकदमे रुक से गए। ऐसा माना जाता है कि उनकी नामी और बेनामी सम्पत्तियों की कुल कीमत लगभग 900 करोड़ रुपये थी। 2016 में जेल से छूटने के बाद वे आखरी बार राज्य की मुख्यमंत्री बनीं, उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहा तथा मुख्यमंत्री बनने के कुछ समय बाद ही उनका निधन हो गया। जयललिता अविवाहित रहीं, पर वे द्रमुक के नेता एम.जी रामचंद्रन के बहुत निकट मानी जाती थीं। रामचंद्रन और जयललिता फिल्म उद्योग से राजनीति में आए थे। दोनों ही अपने समय के बड़े नेता थे। जब रामचंद्रन, जिन्हें एमजी आर के नाम से पुकारा जाता था, द्रमुक को छोड़ अपनी पार्टी अन्नाद्रमुक बनाई तो जयललिता उनके साथ हो गई। एमजीआर के जीवनकाल में ही जयललिता को उनका राजनीतिक उत्तराधिकारी माना जाने लगा था। अपने देहावसान से पहले वे कोई वसीयत नहीं छोड़ गई थी, उनकी भतीजी दीपा तथा भतीजे दीपक ने अपने आप को जयललिता का उत्तराधिकारी होने का दावा जताया। मामला लम्बे समय तक अदालत में चला।
वहां जयललिता की अधिकृत सम्पत्तियों का जो विवरण पेश किया गया, उसके अनुसार कुल सम्पत्तियां लगभग 188 करोड़ रुपये की थी। इसमें वे 32 कम्पनियां भी थी, जो उनकी निकट मित्र शशिकला के नाम से थी, लेकिन जयललिता का भारी निवेश था। पिछले साल इस मामले पर अदालत ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा कि दीपा और दीपक ऐसा कोई प्रमाण पेश नहीं कर पाए, जिससे यह साबित होता हो कि वे जयललिता की सम्पत्तियों के उत्तराधिकारी हैं पर अदालत ने बाकि सब सम्पत्तियों से उनके दावे को नकारते हुए यह जरूर निर्देश दिया कि इन 32 कम्पनियों में जो निवेश जयललिता ने किया था, उसके उत्तराधिकारी वे जरूर होंगे।
(यह लेखक के अपने विचार हैं।)
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