कचौरी बन रही कोटा की ज्योग्राफिकल आइडेंटिफिकेशन

रोजाना 30 लाख की कचौरी खा जाता है कोटा : वर्ष भर में 10.80 करोड़ का हो जाता है व्यापार, तीन से चार हजार लोगों को मिलता है रोजगार

 कचौरी बन रही कोटा की ज्योग्राफिकल आइडेंटिफिकेशन

देश विदेश में प्रसिद्ध कोटा की कचौरी के क्रेज का जायका लोगों की जुबान पर छाया हुआ है। कोटा में रोजाना 300 से ज्यादा दुकानों व ठेलों पर रोजाना करीब 3 लाख से ज्यादा कचौरियां बिकती है, जिन्हें लोग बड़े चाव से खाते हैं। अल्फांसो के आम और दार्जलिंग चाय की तरह ही कोटा की कचौरी'ज्योग्राफिकल आइडेंटिफिकेशन' के तौर पर दुनिया भर में मशहूर है।

कोटा। देश विदेश में प्रसिद्ध कोटा की कचौरी के क्रेज का जायका लोगों की जुबान पर छाया हुआ है। उड़द की दाल से बनने वाली इस खास कचौरी के जायके का सफर शास्त्री मार्केट की तंग गलियों से रियासतकाल में शुरू हुआ था जो आधुनिकता की निशानी समझे जाने वाली खाने-पीने की वस्तुओं पर भारी पड़ रहा है। 10 रुपए में बिकने वाली कोटा कचौरी खाकर हर कोई महंगे पिज्जा,बर्गर खाना भूल जाता है। कोटा में रोजाना 300 से ज्यादा दुकानों व ठेलों पर रोजाना करीब 3 लाख से ज्यादा कचौरियां बिकती है, जिन्हें लोग बड़े चाव से खाते हैं। कचौरी की मांग बढ़ने के साथ ही अब कोटा की फेमस कचौरी के शोरूम सजने लगे हंै और कचौरियां तलने के लिए कड़ाहे कम पड़ रहे हंै। कोटा में शायद ही ऐसी कोई गली हो जहां सुबह से लेकर देर शाम तक कचौरी के दीवानों की लाइन ना लगी हो। अल्फांसो के आम और दार्जलिंग चाय की तरह ही कोटा की कचौरी'ज्योग्राफिकल आइडेंटिफिकेशन' के तौर पर दुनिया भर में मशहूर है। उड़द की दाल में हींग, गर्म मसाले और खड़ी मिर्च डालकर तैयार होने वाली इस कचौरी के जायके का कोई तोड़ नहीं है।

देश-विदेश में कोटा को कचौरी ने दिलाई पहचान
कोटा की कचौरी ने शिक्षा नगरी कोटा को देश-विदेश में विशेष पहचान दिलाई है। जिस समय कचौरी के जायके का सफर शुरू हुआ,उस समय शहर में मात्र एक-दो दुकानें थी। अच्छी क्वालिटी की हींग और खास मसालों का स्वाद लोगों के मुंह पर ऐसा लगा कि कोटा कचौरी फेमस हो गई और एक ब्रांड बन गई। कोटा के शास्त्री मार्केट में 1960 में कचौरी की दुकान सबसे पहले खुली थी। इसके बाद से ही अब कोटा में सैंकड़ों दुकानों,ठेलों पर कचौरी बिक रही है। कचौरी बेचना अब लोगों की आय का साधन व व्यापार बन गया है।

रोजाना तीन लाख से ज्यादा कचौरी खा जाते है लोग
कोटा शहर के हर गली, मोहल्ले, चौराहों पर कचौरी की दुकानें व ठेले लगे हुए है। कई इलाकों में नामचीन दुकानें है जिनका खुद का ब्रांड है। टेस्ट और ब्रांड के नाम पर लोग दूर-दराज से कचौरी खाने आते हंै। एक अनुमान के मुताबिक 60 से 70 ग्राम वजन वाली दाल कचौरी 10 रुपए में बिकती है। कचौरी से रोजाना का 30 लाख से ज्यादा का कारोबार होता है। हर महीनें 90 लाख कचौरी की खपत होती है यानी कि हर वर्ष 10.80 करोड़ रुपए की कचौरी शहर में  बिकती है ।  सलाना 110 करोड़ से ज्यादा का कारोबार कोटा में कचौरी से होता है।

कचौरी से तीन हजार लोगों को मिला रोजगार
कचौरी के कारोबार से कोटा में 3 हजार से अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है। कचौरी की बड़ी दुकानों में 5 से 6 लोग काम कर रहे है,जिनमें हलवाई,हेल्पर,काउंटर कर्मी शामिल है। शहर में करीब 15 से ज्यादा ऐसी दुकानें है जिनमें रोजाना 50 हजार से अधिक कचौरियां बिकती है और एक-एक दुकानदार रोजाना 2 हजार कचौरियां बेच देता है। शहर में 60 से 70 दुकानों पर रोजाना 1 हजार कचौरियां बिकती है। अन्य दुकानदार 200 से 500 कचौरियां रोजाना बेच देते हंै।

दर में यूं हुई वृद्धि
भुवनेश जैन बताते हैं कि 10 पैसे की एक कचौरी से कचौरी की कीमत शुरू हुई थी जो एक रुपए में ग्यारह मिलती थी। धीरे धीरे चार आने, आठ आने, रुपए से बढ़कर पांच रुपए तक दर पहुंची। फिर सात से आठ रुपए हुई। चार साल पहले तक 15 रुपए की दो कचौरी मिलती थी । अब वही दो कचौरी बीस रुपए में मिलती है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी चख चुके हैं स्वाद
नौ साल पहले गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी कोटा कचौरी का स्वाद चख चुके हैं। इसके साथ ही कोटा सांसद ओम बिरला के स्पीकर बनने के बाद 500 से ज्यादा कचौरी संसद भवन में भेजी गई थी,जहां मौजूद सभी सांसदों व मंत्रियों ने कोटा कचौरी का स्वाद चखा था। हाल ही में भाजपा प्रदेशाध्यक्ष सतीश पूनियां भी कोटा में एक कचौरी की दुकान पर खड़े हुए कचौरी का स्वाद लेते हुए दिखाई दिए थे।

शहर के साथ बढ़ा कारोबार
कोटा शहर के एक फेमस कचौरी विक्रेता भुवनेश जैन बताते हैं कि पिछले 5 वर्षों में कोटा शहर में कचौरी का कारोबार खूब बढ़ा है। रोजाना शहर में कचौरी की नई दुकानें भी खुल रही है,हालांकि पिछले 2 वर्षों में कोरोनाकाल में कचौरी का स्वाद बिगड़ गया था। लेकिन अब एक बार फिर से कचौरी के व्यापार ने रफतार पकड ली है। कोटा कि कचौरी इतनी प्रसिद्ध है की कोटा घूमने आने वाले देशी-विदेशी पर्यटक कचौरी पैक करवाकर अपने साथ ले जाते है। ज्यों-ज्यों शहर बढ़ रहा है त्यों-त्यों कोटा में कचौरी का व्यापार बढ़ रहा है। नये इलाके शुरू होने से पहले वहां कचौरी की दुकान पहुंच जाती है। कोरोना काल में कई कारीगर गांव चले गए थे। लेकिन अब वह सब फिर से लौट आए हैं। सोगरिया इलाके में दो वर्ष पहले कचौरी की दुकान करने वाले एक विक्रेता सुभाष कुमावत ने बताया कि पहले दिन उनकी 30 कचौरी बिकी थी। अब हजार के पार कांटा है। कचौरी कोटा में एक इंडस्ट्री बन रही है।

हर मर्ज की दवा कचौरी
कोटा में अमूमन लोग एक साथ दो कचौरी खाते हैं। दो कचौरी एक साथ खाने पर ही क्षुधा शांत होती है। वहीं कुछ शौकीन ऐसे भी हैं जिनके लिए कचौरी हर मर्ज की दवा है। एक गुटखा व्यापारी के पास कार्य करने वाले कर्मचारी राजू कहते हैं कि वह सुबह नियमित रूप से दुकान आने से पहले दो कचौरी खाते ही हैं। इसके बाद भी वह दिन भर में आठ से दस  कचौरी खा जाते हैं। कई बार शर्त पर तो दस से ज्यादा कचौरी ेक साथ खाी है।  वह कहते हैं कि पेट खराब हो तो भी मेरा पेट कचौरी खाने से ठीक हो जाता है। बुखार आता है तो गरम-गरम कचौरी खाता हूं ,इससे मेरा बुखार उतर जाता है। मेरे लिए तो हर मर्ज की दवा कचौरी है।  

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