'इंडिया गेट'

जानें इंडिया गेट में आज है खास...

'इंडिया गेट'

पर्दे के पीछे की खबरें जो जानना चाहते है आप....

ठाकरे का तिया पांचा!
तो महाराष्ट्र में शिवसेना की अगुवाई वाली एमवीए सरकार गिरी ही नहीं। बल्कि अब उद्धव ठाकरे की शिवसेना के अस्तित्व पर ही संकट के बादल। पार्टी और संगठन में फूट के आसार। फिर लोकसभा एवं राज्यसभा के सांसद भी। क्योंकि खुद शिवसेना ने ही विधानसभा परिसर में पार्टी ऑफिस में ताला लगा दिया। मतलब शिंदे गुट का इस कदर डर। आशंका यह कि शरद पवार की इसमें पर्दे के पीछे से भूमिका। क्योंकि कांग्रेस तो कॉमन मिनिमम प्रोग्राम का राग अलापती रही। लेकिन पवार साहब इस सरकार के गठन से लेकर चलवाने तक का ठेका लिए थे। फिर भी सरकार गिर गई। सो, तोहमत तो पवार साहब पर आएगा ही। हां, कांग्रेस अध्यक्ष नाना पटोले बहुत पहले कह चुके। भविष्य में होने वाला कोई भी चुनाव कांग्रेस अकेले ही लड़ेगी। मतलब शिंदे के साथ भाजपा की भी चांदी। वह बाला साहब के शिष्य को सीएम बनवाकर आज सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत। दूसरी ओर, उद्धव ठाकरे का तिया पांचा भी हो चुका!

दक्षिण में सुगबुगाहट!
तमिलनाडु में राजनीतिक सुगबुगाहट। मसला राष्ट्रपति चुनाव में विपक्षी प्रत्याशी यशवंत सिन्हा के लिए समर्थन मांगने का। पिछले दिनों मीडिया में खबर आई कि राहुल गांधी ने अम्मा की पार्टी के नेता पलानीस्वामी से सिन्हा के लिए समर्थन मांगा। चूंकि तमिलनाडु में इस समय डीएमके सत्ता में और स्टालिन सीएम। तमिलनाडु की राजनीति में डीएमके और अम्मा की पार्टी के बीच 36 का आंकड़ा। तिस पर कांग्रेस राज्य में डीएमके की सहयोगी। देशभर में वैसे ही कांग्रेस की हालत पतली। सो, कहीं एक और सत्तारूढ़ राज्य में गठबंधन सहयोगी नाराज नहीं हो जाए। इसीलिए तुरंत महासचिव जयराम रमेश द्वारा सफाई आई कि खबर भ्रामक। वैसे कांग्रेस संप्रग का सबसे बड़ा घटक दल। फिर कांग्रेस द्वारा राजग के घटक दलों से भी समर्थन मांगने में हर्ज ही क्या? यह एक स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया। असल में, कांग्रेस को डीएमके ने वादा करने के बावजूद तमिलनाडु से कांग्रेस को एक राज्यसभा सीट नहीं दी है। इसीलिए यह गठबंधन में संभावित खटपट को रोकने की कवायद!

क्षत्रपों के दिन!
तेलंगाना के केसीआर की छटपटाहट बहुत कुछ बयां कर रही। उद्धव ठाकरे अभी होश में नहीं। जिनके बारे में ममता दीदी भी बोलीं। उधर, चंद्राबाबू अभी तक संभल नहीं पा रहे। इधर, हेमंत सोरेन भी चौकन्ने। सतर्क तो नितिश कुमार भी। हां, नवीन चुपचाप। वहीं, जगन मोहन भी फिलहाल काफी कुछ मुतमईन। क्योंकि चंद्रबाबू नायडू मुसीबत में। दक्षिण में एआईडीएमके में नेतृत्व का झगड़ा। यानी जिस तरह से उद्धव ठाकरे राजनीति में पराभाव के कगार पर। बाकी सब क्षत्रप परेशान हो रहे होंगे! क्या 21वीं सदी के तीसरे दशक में भारत की राजनीति करवट लेने की ओर? एक दौर था। जब देश के कई क्षत्रपों ने केन्द्र में दमदारी से अपनी मौजूदगी दर्ज करवाई। मुलायम सिंह के वारिस भी दिशाहीन नजर आ रहे। हालिया दो लोकसभा उपुचनाव की हार किसी को नहीं पच रही। अकाली दल बादल में भी नेतृत्व परिवर्तन का दबाव। मायावती अभी भी अपना राजनीतिक वारिस घोषित नहीं कर पाईं। मतलब चारों ओर क्षत्रपों के दिन खराब होने वाले?

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एनसी-पीडीपी साथ-साथ!
तो जम्मू-कश्मीर का चुनाव गुपकार गठबंधन के बैनर तले नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी साथ-साथ लड़ेंगी। फिलहाल तो दोनों ने यही इरादा जाहिर किया। लेकिन बाकी दलों में 90 सीटो में बंटवारा कैसे होगा। यह समय बताएगा। जिस प्रकार से नए परीसीमन और अनुच्छेद-370 के खात्मे के बाद विधानसभा चुनाव होंगे। उसके परिणामों पर देश ही नहीं तमाम दुनियां की नजरें होंगी। सो, विधानसभा चुनाव काफी दिलचरूप होगा। अनुमान जताया जा रहा कि इसी अक्टूबर-नवंबर या अगले साल मार्च में चुनाव होंगे। अभी मतदाता सूचियों में संशोधन का काम हो रहा। यह होते ही चुनावी प्रक्रिया शुरू होने की आस। लेकिन फारूख अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती जिस तरह से संकेत कर रहे। उससे लग रहा कि यह दोनों भी इस बार पूरी तरह से मुतमईन नहीं। न वैसे वादे, न इरादे और न दशा एवं दिशा। हां, भाजपा मानकर चल रही। वह खुद सत्तारूढ़ नहीं भी हुई। तो उसके बिना सरकार भी नहीं बनेगी। बस यही चिंता एनसी-पीडीपी खाए जा रही। फिर क्या होगा?

ईडी सरकार!
ईडी का मतलब वैसे तो प्रवर्तन निदेशालय। जिसे लेकर सत्तापक्ष पर विपक्ष हमेशा हमलावर रहता। लेकिन महाराष्ट्र  विधानसभा में डिप्टी सीएम बने देवेन्द्र फड़नवीस ने बकायदा माना। हां, यह ईडी सरकार। मतलब एकनाथ शिंदे एवं देवेन्द्र फड़नवीस की सरकार। असल में, कल तक सत्तारूढ़ रहे एमवीए गठबंधन के घटक दलों ने विधानसभा में ईडी-ईडी के नारे लगाए। जिस पर फड़नवीस की ओर से यह जवाब आया। जबकि विपक्ष यानी एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेना का आरोप कि यह सरकार ईडी यानी प्रवर्तन निदेशालय के जरिए सत्तारूढ़ हुई। वैसे कांग्रेस के 11 और एनसीपी के सात विधायकों ने बहुमत परीक्षण के दौरान गैर हाजिर रहकर जता दिया कि खेल अभी खत्म नहीं। बल्कि खतरा अभी बना हुआ। शिवसेना तो टूट गई। अब एनसीपी और कांग्रेस को भी यही डर सता रहा। शिवसेना की हालत तो माया मिल न राम वाली। फिर सबसे बड़ा मसला मुंबई महानगर पालिका के चुनाव का। जो जल्द ही होने वाले। यहां माना जा रहा। एमवीए के घटक दल अकेले लड़ेंगे!

ब्रिटेन में भारत-पाक!
एक दौर था। गोरों के साम्राज्य का कभी सूरज अस्त नहीं होता था। मतलब भारत समेत पूर्व से लेकर पश्चिम तक गोरों का दुनियां के इतने इलाकों पर शासन था कि हमेशा कहीं न कहीं दिन होता था। लेकिन अब समय का फेर। ब्रिटेन में अब ऐसी नौबत आ गई कि भारतीय या पाकिस्तानी मूल के दो नेता पीएम की कुर्सी के करीब माने जा रहे। इसमें भारतीय मूल के नेता ने तो पीएम की गद्दी पर दावा भी ठोक दिया। असल में, ब्रिटिश पीएम बोरिस जॉनसन का इस्तीफा हो गया। उनके खिलाफ नैतिकता से लेकर कोरोना नियमों का उल्लघंन जैसे मामले। इस बीच, सत्ताधारी कन्जर्वेटिव पार्टी के वित्त मंत्री रहे ऋषि सुनक भारतीय मूल के। तो दूसरे स्वास्थ्य मंत्री रहे साजिद जावेद पाकिस्तान मूल के। दोनों को ही पीएम पद का दावेदार माना जा रहा। हां, बात चाहे क्रिकेट की हो या यूएनओ की। भारत-पाक के बीच हमेशा छत्तीस का आंकड़ा रहता आया। अब मैदान ब्रिटेन की राजनीति बनने जा रहा!
-दिल्ली डेस्क

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