कब तक रहेगी एंटीबॉडी, क्या लगेगा बूस्टर डोज

कब तक रहेगी एंटीबॉडी, क्या लगेगा बूस्टर डोज

कई देशों में कोरोना वायरस से लड़ने के लिए वैक्सीनेशन किया जा रहा हैं। लेकिन समय के साथ वैक्सीनों के कम प्रभावी होने के मामले भी सामने आ रहे हैं।

कोटा। कई देशों में कोरोना वायरस से लड़ने के लिए वैक्सीनेशन किया जा रहा हैं। लेकिन समय के साथ वैक्सीनों के कम प्रभावी होने के मामले भी सामने आ रहे हैं। जबकि, कोविड-19 वैक्सीन को कोरोना महामारी के खिलाफ बड़ा हथियार माना जा रहा है। कोरोना वैक्सीन की दोनों डोज लगने के बाद एंटीबॉडी तैयार होती हैं, जो कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ने में सक्षम होती है। भारत में निर्मित कोविशील्ड और कोवैक्सीन टीकों का असर कब तक रहेगा, ये दोनों टीके एंटीबॉडी बनाने में कितने प्रभावशाली रहेगे, अभी इस बारे में कुछ कहा नहीं गया है। वहीं फाइजर की वैक्सीन की एफीकेसी 90 प्रतिशत से अधिक होने के बाद भी उसकी प्रभावशीलता में समय के साथ कमी देखी गई है। पिछले दिनों ऐसी ही एक स्टडी फाइजर की वैक्सीन को लेकर सामने आई। फाइजर की वैक्सीन की दोनों डोज लेने के छह माह बाद एंडीबॉडी 80 प्रतिशत से अधिक कम हो गई। पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भी कोरोना वैक्सीन की बूस्टर डोज लगवाई। कई देशों में बूस्टर डोज लगाई जा रही है। 
 
भारत में कोरोना वैक्सीन की बूस्टर डोज  कब लगेगी यह अभी स्पष्ट नहीं है। कई देशों में बूस्टर डोज लगाई जा रही है, वहां 65 वर्ष से अधिक उम्र के और गंभीर बीमारी वाले लोगों  के लिए कोरोना वैक्सीन का बूस्टर डोज लगाना शुरू कर दिया है। हमारे यहां अभी प्राथमिकता जरुरतमंद लोगों को वैक्सीनेट करने की है। कुछ समय बाद वैक्सीन की बूस्टर डोज कितनी आवश्यक है, किसके लिए आवश्यक है और किस हद तक कारगर रहेगी यह कई प्रश्न है। कोविशील्ड और कोवैक्सीन की दोनों डोज लेने के बाद एंटीबॉडी का प्रतिशत कितना व कब तक रहेगा? जिन लोगों के फरवरी-मार्च में दोनों डोज लग चुकी थी उनके छह माह बाद कितनी एंटीबॉडी बनी। क्या देश में इस पर कोई स्टडी की गई? 
 
देश में कोरोना वैक्सीन डोज लेने वालो की संख्या  100 करोड़ के  करीब पहुंच चुकी  है इनमे से  30 प्रतिशत  लोगों को  दोनों डोज लगाई जा चुकी  हैं।  वैक्सीन की पहली डोज काफी लोगों को लग गई है  क्या थर्ड वेव रोकने  के लिए एक ही डोज असरकारक रहेगी ? पिछले दो सालों से देखा जा रहा है कि मार्च आते ही कोरोना के मामलों में वृद्धि होने लगती है। लॉकडाउन के हालात हो जाते है। वर्ष 2020 का मार्च और वर्ष 2021 के मार्च के जो हालात थे,वह साल 2022 के मार्च में तो नहीं दोहराए जाएगी। बूस्टर डोज लगाए जाने को लेकर चिकित्सा विभाग का क्या प्लान है? इन सब प्रश्नों का जवाब जानने के लिए दैनिक नवज्योति ने चिकित्सकों से बात की।
 
 न्यू मेडिकल कॉलेज कोटा के प्राचार्य डॉ. विजय सरदाना का कहना है जयपुर मेडिकल कॉलेज में एक स्टडी शुरू की है। जिसमें पहली डोज के बाद कितनी एंटीबॉडी बनी है। दूसरी डोज के बाद कितनी एंटीबॉडी बनी है। दूसरी डोज के छह महीने, सालभर बाद कितनी रही है एंटीबॉडी, उसकी एक स्टडी शुरू हुई है। यह स्टडी इसलिए शुरू हुई है कि बूस्टर डोज की जरूरत है भी या नहीं।  इस स्टडी में हम सब लोग केसेज कॉन्ट्रीब्यूट करेंगे। उसके बाद रिजल्ट आएगा। हमने कोटा मेडिकल कॉलेज में भी एक स्टडी शुरू की है। जिसमें सैकंड वेव  में जितने भी पेशेंट पॉजीटिव आए थे, उनके बच्चों पर स्टडी की है। उनकी एंटीबॉडी टेस्ट कर रहे है। अभी तक हमने 25 बच्चों की टेस्टिंग की है। इसमें से 21 पॉजीटिव आए है। इसमें से कुछ को कोरोना हुआ था और ज्यादातर को नहीं हुआ था। इसका मतलब बच्चों में भी एंटीबॉडी अच्छी है। स्टडी के बाद यह स्थिति भी क्लीयर हो जाएगी। इन टीकों के असर की बात है, यह इंडीविजुअल इम्यून स्टेट्स पर निर्भर करता है। इंडीविजुअल इम्यूनिटी रेस्पॉन्स स्टेट्स अलग होता है। इसलिए यह मानना चाहिए कि आठ से 12 माह तक असर रहेगा, जब तक कि ये स्टडी का रिजल्ट नहीं आ जाता । बूस्टर डोज का अभी आॅफिशियली डिक्लेयर नहीं हुआ है। अमेरिका में बूस्टर डोज को ऑफिशियली कर दिया है, इसलिए वहां लग रहे है। हमारे यहां अभी आईसीएमआर और राज्य सरकार से भी बूस्टर डोज के बारे में गाइडलाइन नहीं है। उम्मीद है इसका क्लेरिफिकेशन आने वाले दिनों में हो जाएगा। थर्ड वेव का प्रोटेक्शन वैक्सीन की एक डोज से भी होता है। हम जो स्टडी कर रहे है 25 में से 21 बच्चों में एंटीबॉडी मिलना यह उत्साहजनक है। हम इस स्टडी को बढ़ाएगें। स्कूल के भी बच्चों में जिनके परिवार में या जिन बच्चों को कोविड हुआ उन बच्चों की एंटीबॉडी टेस्टिंग करेंगें। काफी लोगों को वैक्सीन लग चुका है। अगले साल मार्च में वह स्थिति नहीं आएगी ऐसी उम्मीद करते है।
 
जयपुर  के महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के सीनियर कंसलटेंट फिजिशियन डॉ. आशुतोष चतुर्वेदी का कहना है सभी जगह स्टडी चल रही है। उनके फाइनल रिजल्ट आने में समय लगेगा।  इनीशियल स्टडी में कोविशील्ड,कोवैक्सीन से बेहतर था। उसकी ऐफीकेसी लगभग 87-88 प्रतिशत के आसपास थी। कोवैक्सीन की 84-85 प्रतिशत के आसपास थी। जहां-जहां भी सरकार ने टीके इम्पोर्ट किए, वहां भी इन वैक्सीन के अच्छे रिजल्ट मिले है। कई मरीजों में एंटीबॉडी हमने हजारों में देखी है। सब में तो नहीं कह सकते क्योंकि सबकी बॉडी अलग तरीके से वैक्सीन को एक्सेप्ट और रिएक्ट करती है। आईसीएमआर अपने स्तर पर एंटीबॉडी का टेस्ट कर रहा है। उनकी  स्टडी चल रही है। दोनों वैक्सीन का असर कब तक रहेगा, इस पर कुछ  कहा नहीं जा सकता। अभी तक ऐसी कोई स्टडी नहीं आई है। अभी तो सरकार का मुख्य लक्ष्य है कि प्रत्येक व्यक्ति को दो डोज एक बार दी जाए। बाद में देखेंगे कि बूस्टर डोज की जरूरत देश में है या नहीं।   बूस्टर डोज की प्लानिंग भी सरकारी स्तर पर होगी। आईसीएमआर की रिसर्च कमेटी काम कर रही है। जो खबरें आती हैं उनसे लगता है कि जब तक वायरस म्यूटेट करता रहेगा तब तक बूस्टर डोज लगानी चाहिए। मार्च कोई ऐसा महीना नहीं है जिसे ऐसा माने शुरूआत में जब कोरोना वायरस आया था वह दौर ऐसा था कि ना तो  बीमारी के बारे में पता था और ना ही डायग्नोज था वायरस आया ही था। मार्च 2021 में तब वैक्सीनेशन की प्रक्रिया शुरू ही हुई थी। जिस हिसाब से देश में टीकाकरण ने रफ्तार पकड़ी है बहुत अच्छा रेस्पॉन्स आया है  मुझे लगता नहीं अगले वर्ष मार्च में उतनी गंभीर स्थिति थर्ड वेव का सामाना करेंगें। लेकिन कोविड प्रोटोकॉल फॉलो करने चाहिए।
 
श्री सिद्धि विनायक हॉस्पिटल के डायरेक्टर एंड लेप्रोस्कोपिक सर्जन डॉ. भारत मरमठ का कहना है वैक्सीनेशन के कारण और संक्रमण की वजह से शरीर में एंटीबॉडी डवलप होती है। आने वाले समय में कोई वायरस म्यूटेट होकर आएगा तो उसका इफेक्ट इतना नहीं रहेगा। जितनी भयावह स्थिति अभी थी । एंटीबॉडी कम बनती है। यह बात सही है। वैक्सीन इन्सटेंट रिलिफ के लिए होती है। शरीर हमारा इम्यून अपने आप हो जाता है। रेग्यूलर एक्सपोजर वायरस का एंटीबॉडी के साथ में होता रहेगा तो  शरीर भी तो कुछ काम करेगा। एक तो एंटीबॉडी बाहर से दे रहे है। वैक्सीन लगाकर बॉडी को इन्क्यूबेट कर रहे है कि एंटीबॉडी बनाए उस टाइम पर वैक्सीन लगाने के बाद बहुत फास्ट एंटीबॉडी बन रही है अगर उस समय वायरस इन्फेक्ट भी करता  है तो उसके खिलाफ भी एंटीबॉडीज शरीर अपने आप बनाने लग जाता है। इन टीकों का असर कब तक रहेगा यह कहना थोड़ा जल्दी होगा। यह टीके  प्रभावशाली है तभी तीसरी वेव को काबू कर पाए है। आईसीएमआर इस पर रिसर्च कर रहा है। बूस्टर डोज के लिए भी आॅप्शनल रहेगा। जहां तक मुझे लगता है बूस्टर डोज की अब ज्यादा जरूरत नहीं पड़ेगी। देश-दुनिया में कुछ मामले देखने को मिल रहे है पर उस इन्टेन्सिटी से नहीं है जैसा आतंक कोरोना ने मचाया था। हमें सकारात्मक रहना चाहिए। अगला मार्च मुझे नहीं लगता कि कोरोना वह भयावह स्थिति पैदा कर पाएगा। अगले वर्ष मार्च तक लगभग शत-प्रतिशत वैक्सीनेटेड हो चुके होंगे।
 
मधुवन डेंटल क्लिनिक एंड इम्प्लांट सेंटर के डायरेक्टर डॉ. विवेक सक्सेना का कहना है इन टीकों का असर डेढ़ साल तो है। डेढ़ साल के बाद बूस्टर डोज देना रिक्वायर्ड रहेगा। ये टीके एंटीबॉडी बनाने में प्रभावशाली रहे है। बीमारी अभी खत्म नहीं हुई है। वैक्सीन के कारण थोड़ी मोर्टेलिटी कम हो गई है। तभी थर्ड वेव नहीं आया है। एंटीबॉडी डेवलप होने के कारण ही डेंगू, मलेरिया बुखार, जो अभी चल रहा है वहीं रहा। बॉडी के अंदर एंटीबॉडी का प्रतिशत बॉडी इम्यूनिटी और पेशेंट टू  पेशेंट वैरी करता है। कई पेशेंट में एंटीबॉडी 90 प्रतिशत डवलप हुई हैऔर कई में एंटीबॉडी 40-50 प्रतिशत तक ही रह गई। औसतन यह 60 प्रतिशत मान सकते है। दोनों डोज के छह माह बाद एंटीबॉडी का प्रतिशत कितना रहा अभी इस पर स्टडी चल रही है। काफी स्टडीज इस पर आई लेकिन मास सेंपल नहीं था क्योंकि तब ज्यादा लोग  वैक्सीनेटेड नहीं थे। अब स्टडी ज्यादा अच्छे रिजल्ट देगी जब सौ करोड़ के करीब लोग वैक्सीनेटेड हो जाएगे। बूस्टर डोज का प्लान है। किन्तु बूस्टर डोज ऐसा चाह रहे है जिसका प्रभाव और एफीकेसी दो साल रखी जाए। बूस्टर डोज सिंगल डोज ही रहेगा। बूस्टर डोज कौन -सा बेहतर रहेगा उसके ऊपर भी रिसर्च चल रहा है। बूस्टर डोज लगाना पड़ेगा। वर्ष 2022 में ऐसा लग नहीं रहा है कि मार्च या अप्रैल में पहले जैसी स्थितियां आएगी। क्योंकि वैक्सीनेशन काफी हो गया है। उसका प्रभाव आ सकता है। मोर्टेलिटी इतनी नहीं होगी। इतनी गंभीर स्थिति नहीं होगी जितनी दूसरी लहर में थी।
 



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