अपने लक्ष्य की ओर भाला फेंक रहे खिलाड़ी

नीरज चौपड़ा को मानते है रोल मॉडल

अपने लक्ष्य की ओर भाला फेंक रहे खिलाड़ी

कोटा में भाला फेंक के खिलाड़ी सुविधाओं के अभाव में तैयार हो रहे है और आगे बढ़ रहे है। यह खिलाड़ी नीरज चौपड़ा को अपना रोल मॉडल मानते है। खिलाड़ी उन्ही की तरह भाला फेंकने की तैयारी कर रहे है।

कोटा। इनके पास न तो जेवलिन है और न ही ढ़ग के जूते। इसके बावजूद भी यह खिलाड़ी 40 से 50 मीटर तक भाला फेंक देते है। अपने इसी जज्बे और कड़ी मेहनत के कारण कोटा के भाला फेंकने वाले नेशनल प्रतियोगिता में जा पहुचें और गोल्ड मेडल में भी जीत लिए। अब यही जुनूनी खिलाड़ी इंडिया के लिए खेलने की तैयारी में जुटे हुए है। ये खिलाड़ी रोजाना जेके पवेलियन अंतरराष्टÑीय खेल मैदान में रोजाना पसीना बहा रहे है। कोटा के यह खिलाड़ी नीरज चौपड़ा को अपना रोल मॉडल आर्दश मानते है। खिलाड़ियों ने नीरज की डीपी भी अपने फोन में लगा रखी है। इसके साथ ही इन खिलाड़ियों ने नीरज की अनेक फोटो से अपना घर सजाया हुआ है। यह खिलाड़ी उन्ही की तरह भाला फेंकने की तैयारी कर रहे है। 

सुविधाओं का अभाव,फिर भी तैयार हो रहे खिलाड़ी
कोटा में भाला फेंक के खिलाड़ी सुविधाओं के अभाव में तैयार हो रहे है और आगे बढ़ रहे है। खिलाड़ियों के पास जेवलिन तक नहीं है। खिलाड़ियों का कहना है की कोटा में भाला फेंक खेल के लिए कोई मैदान भी नहीं है। खिलाड़ियों को मजबूरी में जेके पवेलियन खेल मैदान के एक कोने में इसका अभ्यास करना पड़ रहा है। इसके साथ ही खिलाड़ियों को किसी भी प्रकार की कोई सुविधा नहीं मिल रही। इसको लेकर खिलाड़ियों में निराशा देखने को मिलती है।

भाला फेंक पसंदीदा खेल
भाला फेंक कोटा के युवाओं का पसंंदीदा खेल बन रहा। खिलाड़ियों का कहना है की पहले भाला फेंक को कोई नहीं जानता था। लेकिन जब से नीरज चौपड़ा ने गोल्ड मेडल जीता है तब से युवाओं में इसको लेकर रुझान देखने को मिल रहा है। कोटा में भाला फेंक के करीब एक सौ से अधिक खिलाड़ी इसकी ट्रेनिग ले रहे है। इसके साथ ही इस खेल में कोटा की युवतियां भी आगे निकलकर आ रही है। भाला फेंक में कोटा के दलजीत सिंह ने 60 मिटर तक भाला फेंककर नेशनल लेवल पर अपनी पहचान बनाई है। इसके साथ ही भुवनेश कुमावत, राधे मीणा, शिवम भी नेशनल लेवल पर खेल चुके है। 

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कोटा के खिलाड़ियों को अगर दूसरे खेलों की तरह सुविधाएं मिले तो यह खिलाड़ी देश के लिए गोल्ड मेडल ला सकते है। पर विडबंना यह है की सुविधाएं तो बाद में लेकिन अभी खिलाड़ियों के पास अभ्यास करने के लिए मैदान तक नहीं है। ऐसे में इन खिलाड़ियों को दूसरे खेल के मैदानों में जाकर अभ्यास करना पड़ता है। सरकार को व खेल विभाग को इसकी ओर ध्यान देना चाहिए।         
-श्याम बिहारी नाहर, कोच

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