सतरंगी सियासत

नीतीश का अभियान!

सतरंगी सियासत

राजधानी में वह राहुल गांधी, शरद पवार, मुलायम सिंह, अरविंद केजरीवाल, सीताराम येचुरी समेत कई विपक्षी दिग्गजों से मिले। मतलब भाजपा के खिलाफ वह एक मजबूत विपक्षी गठजोड़ की शुरूआत कर चुके। लेकिन सवाल वही। क्या तेजस्वी 2025 तक का इंतजार करेंगे? इस समय बिहार विधानसभा में राजद सबसे बड़ा दल।

सतरंगी सियासत

नीतीश का अभियान!
तो नीतीश कुमार का बिहार में भाजपा को सत्ता से बेदखल करने के बाद दिल्ली की ओर रूख। जदयू के नेता उन्हें 2024 के लिए पीएम फेस बता रहे। जबकि नीतीश का इससे इनकार। कहा, विपक्ष एकजुट हो तो अच्छा। राजधानी में वह राहुल गांधी, शरद पवार, मुलायम सिंह, अरविंद केजरीवाल, सीताराम येचुरी समेत कई विपक्षी दिग्गजों से मिले। मतलब भाजपा के खिलाफ वह एक मजबूत विपक्षी गठजोड़ की शुरूआत कर चुके। लेकिन सवाल वही। क्या तेजस्वी 2025 तक का इंतजार करेंगे? इस समय बिहार विधानसभा में राजद सबसे बड़ा दल। यदि कांग्रेस और वामदल उनके साथ रहे। तो बामुश्किल एक दर्जन विधायक भी इधर-उधर हुए। तो पासा पलटते देर नहीं लगेगी। लालू-राबड़ी कई बार यह इच्छा जता चुके। वह जीते जी अपने बेटे को सीएम की कुर्सी पर देखना चाहते। साल 2024 के सीट बंटवारे में जदयू एवं राजद के बीच वैसा समझौता होगा? जैसा 2019 में भाजपा एवं जदयू के बीच हुआ था। इसमें संदेह। फिर नीतीश के अभियान का क्या?
राहुल की डगर!
राहुल गांधी कन्याकुमारी से भारत जोड़ो यात्रा पर निकल पड़े। फिलहाल योजना कश्मीर घाटी में इसकी समाप्ति की। करीब 35 सौ किमी लंबी और पांच माह से अधिक की अवधि की यह यात्रा। अब तो सोनिया गांधी का भी बयान। वह भी इस यात्रा में पूरे उत्साह के साथ शामिल होंगी। तो फिर यह भी तय। बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ता, नेता दोगुने जोश के साथ इसमें भाग लेने वाले। आगाज तो उम्मीद के अनुरुप। इससे पहले कांग्रेस चार सितंबर को दिल्ली में महंगाई के खिलाफ रैली कर चुकी। जिसे राहुल गांधी की 2024 के लिए रिलांचिंग की शुरूआत बताया गया। अब तो वह सीधे जनता से जुड़ने एवं संवाद के लिए मैदान मेंं। भाजपा की जवाबी प्रतिक्रिया बता रही। वह भी इससे सतर्क। क्योंकि यात्रा 12 राज्यों से गुजरेगी। यदि कारवां बढ़ता गया। तो उसके लिए चुनौती होगी। लेकिन इस बीच, नीतीश कुमार और उनका अभियान, क्या गुल खिलाएगा। सभी की नजर। क्योंकि एक गैर भाजपा-गैर कांग्रेस के गठजोड़ की आहट!
मुंबई का माजरा?
मायानगरी मुंबई चर्चा में। जहां अमित शाह और एनएसए अजित डोभाल देश की आर्थिक नगरी पहुंचे। तो उद्योगपति साइरस मिस्त्री की दुर्भाग्यपूर्ण मौत से सभी मर्माहत। हां, शिवसेना के बागी शिंदे गुट एवं भाजपा की गठबंधन सरकार में कुछ न कुछ चल ही रहा। वहीं, शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे एवं एकनाथ शिंदे के बीच असली कौन? पार्टी पर किसका कब्जा होगा? यह मामला कोर्ट में। इसी बीच, बीएमसी के चुनाव सिर पर। बस यही असली माजरा। बीएमसी शिवसेना के लिए गर्भनाल जैसा। जिस पर शिवसेना तीन दशकों से काबिज। जबकि सिंबल पर बात अटकी हुई। शिंदे गुट भी तीर कमान पर दावेदारी कर रहा। सो, उद्धव ठाकरे हैरान, परेशान। गृहमंत्री अमित शाह ने कहा, गददारों और धोखेबाजों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मतलब बीएमसी के चुनाव के बहाने भाजपा बीते आठ सालों का हिसाब चुकता कर देना चाहती। जिसे शायद उद्धव ठाकरे भांप रहे। फिर राज ठाकरे और भाजपा की नजदीकियां बढ़ रही। वहीं, शिंदे भी अपना संगठन एवं जनाधार बढ़ा रहे।
झारखंड का झमेला!
झारखंड का झमेला अभी निपटा नहीं। हां, कुछ दिन आगे जरूर खिसक गया। मानो ऐसा लग रहा। हेमंत सोरेन विधानसभा में 48 विधायकों के समर्थन के साथ बहुमत हासिल कर चुके। भाजपा ने सदन से वाक आउट किया। लेकिन सीएम की सदस्यता खत्म होने का मामला अभी बाकी। उन पर आॅफिस आॅफ प्रोफिट का मामला। बताया जा रहा। भाजपा इस पूरे घटनाक्रम पर कोई साफ स्ैंटड नहीं ले पाई। फिर सीएम कौन बने? यह भी भाजपा तय नहीं कर पाई। लेकिन क्या यही सही? जो राजनीतिक गलियारे में चल रहा! क्या भाजपा नेतृत्व इतना कमजोर आकलन करेगा? इससे पहले तीन कांग्रेस विधायक अच्छी खासी नकदी के साथ बंगाल में पकड़े गए। इन्हें और विधानसभा अध्यक्ष को मिला दें। तो हेमंत को अब 81 में से 52 का समर्थन। उसके बावजूद अभी भी सरकार की स्थिरता को लेकर संशय। वैसे भी झारखंड के गठन के बाद से ही यहां राजनीतिक स्थिरता नहीं रही। सो, यह संभव। भाजपा कुछ और ही प्लान कर रही हो।
मरूभमि में हलचल?
सितंबर माह मरूभमि के लिए बेहद अहम बताया जा रहा। अमित शाह का जोधपुर दौरा हो चुका। वहीं, सत्ताधारी कांग्रेस में कयासों की बाढ़। सीएम गहलोत और सचिन पायलट के भविष्य को लेकर कांग्रेस आलाकमान के फैसले का सभी को इंतजार। लेकिन यह तय। कांग्रेस को अगले माह की शुरूआत में नया अध्यक्ष मिलने जा रहा। और इसी के साथ राजथान में भी बदलाव की संभावनाएं जताई जा रहीं। फिर भाजपा में भी अंदरखाने चीजें खदबदा रहीं। जहां प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनियां की यात्रा स्थगित हुई। इसे अमित शाह के दौरे से जोड़ा जा रहा। लेकिन वसुंधरा राजे समर्थक एवं उनको चाहने वाले भी यात्रा की तैयारी कर रहे। बात चाहे युनूस खान की हो या अशोक परनामी की। हुंकार भरी जा रही। मतलब दोनों ही मुख्य दलों में अगले विधानसभा चुनाव से पहले बड़े उलटफेर के कयास। इससे कार्यकर्ता भी असमंजस में! किस पाले में खड़े हों और किसके साथ? वैसे भी राजनीति में जमीनी कार्यकर्ता की बहुत महत्वाकांक्षाएं नहीं होतीं!
नौ मन तेल...
एक कहावत। नौ मन तेल हो तो राधा नाचे। मतलब न नौ मन तेल आएगा और न राधा के नाचने की नौबत आएगी। बात चाहे नीतीश कुमार की हो या ममता बनर्जी की। फिर केजरीवाल और के. चंद्रशेखर राव तो रह ही गए। फिर शरद यादव जैसे मराठा क्षत्रप को कैसे छोड़ा जा सकता। इस समय देश में चार राज्यों के मुख्यमंत्री ऐसे। जो पीएम मोदी एवं भाजपा को सत्ता से बेदखल करने को आमादा। यहां तक तो ठीक। कोई कनफ्युजन भी नहीं। लेकिन चुनाव परिणाम बाद पीएम कौन होगा। इस पर कोई चर्चा या बात करने को राजी नहीं। यह सभी जानते। कांग्रेस आज भी देश का दूसरा सबसे बड़ा दल। उसके बिना भाजपा को हटाने की कल्पना कोरी ही। लेकिन बात जनता के बीच साख की। सो, कांग्रेस का साथ तो चाहिए। लेकिन उसकी अगुवाई या फैसलाकुुन भागीदारी नहीं। लेकिन क्या कांग्रेस इतनी नादान? जो इनकी बात मान लेगी! सो, कहीं नौ मन वाली कहावत यहीं तो चरितार्थ नहीं हो रही?
-दिल्ली डेस्क

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