हाड़ौती की जमीन से गायब हुआ नाइट्रोजन

भविष्य में खाद्यान्न का संकट

हाड़ौती की जमीन से गायब हुआ नाइट्रोजन

भविष्य में खाद्यान्न का संकट, संभाग में नाइट्रोजन व फास्फोरस निम्न स्थिति में पहुंचा, घट रहा फसलों का उत्पादन, हाड़ौती में गत वर्ष बने 20 लाख से अधिक स्वाइल हेल्थ कार्ड की जांच में खुलासा

कोटा।  हाड़ौती की जमीन से नाइट्रोजन पोषक तत्व लगभग खत्म हो गए हैं। फास्फोरस और पोटाश भी निम्न स्तर पर पहुंच गया है। इसके साथ ही माइक्रो न्यूट्रिएंटस भी घटते जा रहे हैं। यह बड़े पर्यावरणीय संकट की ओर इशारा कर रहा है। क्योंकि, इससे जमीन की उत्पादकता कम होने के साथ ही प्रकृति में चलने वाला नाइट्रोजन चक्र भी प्रभावित होने की आशंका है। नाइट्रोजन की कमी को दूर करने के लिए जल्द ही प्राकृतिक तरीके से इंतजाम नहीं किए गए तो भविष्य में खाद्यान्न का संकट पैदा हो सकता है। यह खुलासा कोटा संभाग में कृषि विभाग द्वारा गत वर्ष बनाए गए 20 लाख से अधिक स्वाइल हेल्थ कार्ड की जांच में हुआ है। यह कार्ड कृषि विभाग की ओर से कृषि प्रयोगशाला में बनाए जाते हैं।इसमें महत्वपूर्ण नाइट्रोजन न्यूनतम स्तर पर मिला है।

नाइट्रोजन की कमी से पैदा हो सकता है खाद्यान्न संकट
फसलों की गुणवत्ता व पैदावार बढ़ाने में महत्वपूर्ण पोषक तत्व नाइट्रोजन लगभग खत्म हो गया है। इसके अलावा फास्फोरस, पोटाश, सल्फर, जिंक, आयरन, कॉपर, मैग्नीज व बोरान भी मध्यम से निम्न स्तर पर हैं। जिसकी वजह से फसलों का उत्पादन लगातार घट रहा है।  नाइट्रोजन की कमी को जल्द दूर नहीं किया गया तो भविष्य में खाद्यान्न संकट पैदा हो सकता है।

पोषक तत्वों की कमी से शरीर पर क्या असर
 1. नाइट्रोजन : फसलों की गुणवक्ता व उत्पादन बढ़ाने में सहायक होता है। इसके अलावा पौधों में हरापन बनाता है।
कमी से फसलों पर प्रभाव : फसलों की गुणवत्ता घटने के साथ उत्पादन कम होगा। जिसका विपरीत असर प्रोटीन के निर्माण में कमी के रूप में सामने आता है। 
शरीर पर असर : शरीर में प्रोटीन की कमी होने से शारीरिक वृद्धि एवं विकास सर्वाधिक प्रभावित होगा। 
2. फासफोरस एवं कैल्शियम : पौधों की जड़ों के निर्माण में सहायक होता है। उर्जा बढ़ाता है। पौधों को सूखने से बचाता और दालों में न्यूट्रिशन्स का निर्माण करता है। 
कमी से फसल पर प्रभाव : जड़ों का निर्माण कम होने से उर्जा घटेगी और कम पानी में फसलों की उत्पादन प्रभावित होगा। 
शरीर पर असर : हड्डियों व दांतों का विकास प्रभावित होगा। ज्यादा कमी से विकृति उत्पन्न हो सकती है। 

3. बोरोन : यह परागकण बनाने में जितना सहायक होता है उतना ही शर्करा यानी काबोर्हाइड्रेट को पत्तियों से फल में स्थानान्तरित करने में सहायक होता है। 
कमी से फसल पर प्रभाव : फसलों में फल पकने से पहले ही फट जाएंगे और बीज का निर्माण कम होगा। 

 4. जिंक : यह पौधों में आॅक्सीन हार्मोन का निर्माण करता है। यानी पौधों की ग्रोथ बढ़ाने में सहायक होता है। पौधों में कार्य करने वाले विभिन्न एन्जाइम की सक्रियता बढ़ाता है। 
कमी से फसलों को नुकसान : जिंक की कमी से पौधे बौने रह जाएंगे। दाना व बाली का आकार छोटा हो जाएगा, जिससे उत्पादन में कमी आएगी। 
शरीर पर प्रभाव : शारीरिक वृद्धि कम होगी साथ ही हाइट पर भी विपरीत असर पड़ेगा। इंसान की लंबाई घटने का मुख्य कारण जिंक की कमी माना जाता है। 

5. पोटाश : पौधों को मजबूती प्रदान करना, पौधों को कीट रोगों व सुखने से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। 
कमी से फसलों को नुकसान : फसलों में कीट प्रकोप बढ़ जाएगा। पौधों में भोजन निर्माण कम हो जाएगा। 
शरीर पर नुकसान : पोटाश की कमी से शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आएगी। जरा सा मौसम परिवर्तन में बीमार होने का खतरा रहता है। इसके अलावा हदय के कार्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। 

मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी की स्थिति
नाइट्रोजन -100%
फासफोरस - 70-80%
पोटाश - 10-25%
सल्फर - 20-25%
जिंक - 50-70%
आयरन - 25-50%
कॉपर - 10-15%
मैगनीज -15-20%

17 में से 14 पोषक तत्व मध्यम से निम्न स्तर पर
पौधों व फसलों को अपना जीवन चक्र पूरा करने के लिए 17 आवश्यक पोषक तत्वों की जरूरत होती है। इनमें से 14 पोषक तत्व ऐसे होते हैं, जिन्हें पौधे सीधे मिट्टी से अवशोषित करते हैं। यह तत्व फसलों की गुणवत्ता व पैदावार बढ़ाने में सहायक होते हैं। लेकिन, अंधाधुंध यूरिया के उपयोग से ये पोषक तत्व मध्यम से निम्न स्तर पर पहुंच गए हैं। जिनमें  आॅक्सीजन, नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, कैल्सियम, मैग्नीशियम, सल्फर, जिंक, आयरन, कॉपर, बोरान, मैगनीज, मोलिबडनम, क्लोरीन पोषक तत्व शामिल हैं। 

पर्यावरण में 78 प्रतिशत नाइट्रोजन
कृषि अनुसंधान अधिकारी डॉ. नरेश कुमार शर्मा ने बताया कि नाइट्रोजन युक्त तत्व जैसे प्रोटीन और न्यूक्लिक एसिड डीएनए आरएनए जीन की कुंजी है। हमारे पर्यावरण में 78 प्रतिशत नाइट्रोजन गैस है, लेकिन इसे सीधे तौर पर उपयोग नहीं किया जा सकता। इसे प्राणियों के लायक बनाने के लिए पूरा एक साइकिल सिस्टम काम करता है।  विशेषज्ञों के अनुसार नाइट्रोजन की कमी के कारण यदि एक भी अमीनो एसिड गायब हुआ तो जन्म लेने वाले बच्चों में कई तरह की विकृतियां पैदा हो सकती है। 

यदि नाइट्रोजन बिलकुल निम्न स्तर पर पहुंच जाता है तो उसी के अनुपात में फसलों की उत्पादकता भी कम हो जाती है। इससे निपटने के लिए मिट्टी में पोषक तत्वों की पूर्ति करना जरूरी है। रासायनिक खाद और आॅर्गेनिक खाद में संतुलन रखते हुए पोषक तत्वों की पूर्ति करना जरूरी है। लगातार रासायनिक खादों के उपयोग से जमीन बंजर हो सकती है। 
- डॉ. मूलचंद जैन, डीन कृषि महाविद्यालय कोटा

कोटा संभाग में नाइट्रोजन, फासफोरस व सल्फर पोषक निम्न स्तर पर हंै। जिसकी पूर्ति के लिए किसानों को जागरूक कर रहे हैं। ज्यादा मुनाफे के फेर में किसान रसायनिक खाद्य की ओर ज्यादा अकर्षित हो रहा है, क्योंकि इसका रिजल्ट तुरंत मिलता है। इससे केवल नाइट्रोजन ही मिलता है, पोषक तत्व नहीं मिलते। जबकि, धरतीपुत्रों को आॅर्गेनिक खाद का उपयोग करना चाहिए।
-डॉ. राजेंद्र कुमार यादव, सहायक आचार्य, मृदा विज्ञान कृषि अनुसंधान केंद्र उम्मेदगंज

वर्तमान में कोटा संभाग में 20 लाख से अधिक मृदा स्वास्थ्य कार्ड तैयार हो चुके हैं। जिनमें नाइट्रोजन, फास्फोरस का स्तर न्यून पाया गया है, जो चिंता का विषय है। वहीं, अन्य सुक्ष्म पोषक तत्वों का स्तर मध्यम से न्यूनतम देखा गया है, जो खाद्यान्न फसलों की उत्पादकता में कमी के लिए सर्वाधिक उत्तरदायी है। मिट्टी में आवश्यक पोषक तत्वों की मात्रा निम्न स्तर पहुंचने पर उसी के अनुपात में उत्पादकता की कमी आती है। भविष्य में लोगों को गुणवत्तायुक्त खाद्यान्न आपूर्ति के लिए संतुलित मात्रा में रासायनिक व जैविक खाद्य का समायोजन करना बहुत जरूरी है। 
- डॉ. नरेश कुमार शर्मा, कृषि अनुसंधान अधिकारी, कार्यालय संयुक्त निदेशक कृषि विस्तार 

हम लोग फसल तो हर बार लगा रहे हैं, लेकिन उत्पादन आधा रह गया है। यह भी यूरिया व डीएपी डालने के बाद मिल रहा है। यदि यह नहीं डाले जाएं तो फसल होती ही नहीं है। सरकार को भी इस ओर ध्यान देना चाहिए।
- अमन खान, किसान, नौताड़ा मालियान 

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