सतरंगी सियासत

अमरीका दौरे पर गए राहुल गांधी के बयान इन दिनों काफी चर्चा में

सतरंगी सियासत

बात चाहे एससी, एसटी एवं अल्पसंख्यकों की हालत वाला बयान हो या फिर मुस्लिम लीग को सेकुलर बताने वाला। कांग्रेस नेता भरपूर चर्चा में। वह भी विदेशी धरती से।

ठंडे बस्ते में!
कांग्रेस आलाकमान ने कुछ दिनों के लिए गहलोत-पायलट विवाद को ठंडे बस्ते में तो नहीं डाल दिया? सब कुछ हाईकमान तय करेगा और सभी उसकी मानेंगे। इसके मायने क्या? फिर दोनों पक्षों को चुप रहने की भी हिदायत थी। नहीं तो कार्रवाई के लिए भी ताकिद कर दिया गया। लेकिन सवाल वहीं का वहीं। कांग्रेस आलाकमान निर्णय कब लेगा और उसे माना जाएगा? कम से कम राहुल गांधी की विदेश यात्रा की समाप्ति तक रोका गया बताया। इधर, सचिन पायलट के अल्टिमेटम की तारीख भी निकल गई और 11 जून को राजेश पायलट की पुण्यतिथि। ऐसे में समर्थकों एवं विरोधियों की धड़कनें बढ़ रहीं। और क्या गहलोत तब तक यूं ही बैठे रहेंगे? वह तो कह भी चुके। कांग्रेस आलाकमान और संगठन मजबूत। नेतृत्व से जबरदस्ती कोई अपनी बात नहीं मनवा सकता। ऐसी हिम्मत किसी में नहीं। यह कांग्रेस की रवायत भी नहीं।

उलटबांसी!
कांग्रेस के उदयपुर और रायपुर संकल्प काफी चर्चा में रहे। पार्टी ने संगठन में बदलाव के लिए बड़े फैसले लिए। लेकिन जब उन्हें जमीन पर उतारने की बारी आई। तो मामला उलट। असल में, उदयपुर में युवाओं को मौका देने और एक पद, एक व्यक्ति एवं एक परिवार से एक व्यक्ति को टिकट जैसी बातें कही गईं। वहीं, रायपुर में सीडब्ल्यूसी से लेकर संगठन में सभी पदों पर 50 फीसदी आरक्षण के प्रावधान का संकल्प लिया गया। जिसमें एससी, एसटी, ओबीसी, महिलाओं एवं अकलियतों को आगे लाने की बात कही गई। लेकिन जब बिहार में 45 जिला अध्यक्षों की घोषणा हुई। तो उसमें 25 सवर्ण जाति और इसमें भी एक ही जाति के 16 जिला अध्यक्ष होने की बात खबरनवीसों ने नेताजी का ध्यान दिलाया। उन्हें कुछ सूझा नहीं तो बोल पड़े। बस इसीलिए तो जातिगत जनगणना जरूरी! फिर हंसी ठहाके ही तो बचते...

विपक्षी धुरी!
नितीश कुमार इन दिनों विपक्षी दलों के बीच एकता की धुरी बनने की कवायद कर रहे। उन्होंने 12 जून को एक बैठक पटना में बुलाई हुई। लेकिन इसमें न तो कांग्रेस से मल्लिकार्जन खड़गे एवं राहुल गांधी के मौजूद रहने की संभावना। न ही केसीआर, एमके स्टालिन एवं ममता बनर्जी आ रहीं। इसी बीच, नितीश पर राजद का दबाव बढ़ रहा। वहीं, भाजपा भी उनकी घेराबंदी कर रही। बात चाहे विकासशील इंसान पार्टी के मुकेश सहनी की हो या हम के जीतनराम मांझी। जबकि उपेन्द्र कुशवाह पहले ही नितीश को बाय-बाय कह गए। वहीं, चिराग पासवान एवं उनके चाचा को भी एक साथ लाने की बात चल रही। फिर तो नितीश के साथ राजद और कांग्रेस ही बचेंगे। सो, खुद उनके वोट बैंक का क्या? जबकि इसमें से करीब 12 फीसदी वोट चार दलों के जरिए भाजपा अपने पाले में कर चुकी होगी! 

नई संसद
नए संसद भवन का भव्य और दिव्य लोकार्पण हो गया। इसको लेकर कई बातें। लेकिन सरकार का भी अपना पक्ष। ऐसी चर्चा। शायद नए भवन में मानसून सत्र भी आहूत न हो। लेकिन यहां जी-20 की महत्वपूर्ण बैठकें होने की संभावना। इधर, खबरनवीसों में भी नए भवन को लेकर काफी जिज्ञासाएं। क्योंकि सब कुछ नया सिस्टम होगा। वहीं, सांसदों को भी अपना कामकाज ठीक से करने के लिए प्रशिक्षण दिया जाएगा। ताकि वह नई एवं आधुनिक सुविधाओं के साथ ज्यादा क्षमता से काम कर सकें। हां, प्रवेश नए तौर तरीकों से ही होगा। इसमें भी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल होगा। मतलब गलती की संभावना बहुत कम। फिर चर्चा यह भी। कांग्रेस की अगुवाई में 20 विपक्षी दलों ने बहिष्कार तो कर दिया। लेकिन जब वह यहां आएंगे। तो कैसा महसूस करेंगें? क्योंकि अब सेंगोल समेत कई संकेत, संदेश भारतीय परंपरा के अनुरुप होंगे।

उद्धव अकेले!
उद्धव ठाकरे लगातार अकेले पड़ते जा रहे। प्रशासनिक ही नहीं, राजनीतिक मामलों में भी उनकी अनुभवहीनता दिख रही। फिर एमवीए सरकार को लेकर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय भी ऐसा आया कि यदि उद्धव ठाकरे ने इस्तीफा नहीं दिया होता, तो कुछ बात बनती। लेकिन अब पछतावे के अलावा कुछ नहीं। असल में, अगले साल आम चुनाव ही नहीं। बल्कि अंत में राज्य विधानसभा चुनाव भी। फिर बीएमसी चुनाव की भी तस्वीर साफ नहीं। जिसमें उद्धव ठाकरे की जान अटकी हुई। अब एमवीए में लोकसभा एवं विधानसभा सीटों के बंटवारे पर चर्चा हो रही। सरकार इस संभावना पर भी विचार कर रही। यदि महाराष्ट्र में लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव भी करवाएं जाएं, तो? जिससे ठाकरे परेशान। क्योंकि एमवीए गठबंधन में अब उतनी सीटें नहीं मिलने वालीं। अब एमवीए न सरकार और शिवसेना भी टूट चुकी। ऐसे में उद्धव ठाकरे करें तो क्या करें?

देशाटन!
केन्द्र ने दिल्ली को लेकर अफसरों के ट्रासफर-पोस्टिंग वाला कोर्ट का निर्णय क्या पलटा। सीएम केजरीवाल मानो देशाटन कर रहे। वह संसद में लाए जाने वाले इस अध्यादेश के प्रस्ताव का विपक्षी दलों से विरोध के लिए गुहार लगा रहे। लोकसभा में तो सरकार को कोई परेशानी नहीं। लेकिन राज्यसभा में सरकार को अन्य दलों से मदद की जरुरत रहेगी। सो, केजरीवाल एक-एक क्षत्रप से जाकर मिल रहे। इसके लिए उन्होंने देश का हर कोना नाप डाला। इसमें सबसे ज्यादा पेंच कांग्रेस का। न हां कर रही। न सीधे तौर पर ना। उसकी दिल्ली एवं पंजाब इकाई केजरीवाल को समर्थन के सख्त खिलाफ। अब तो ऐन वक्त पर सदन से वाकआउट की भी चर्चा। जो सरकार को सहयोग देना ही होगा। फिर अन्य क्षेत्रीय दल भी जानते। राजधानी दिल्ली के प्रशासनिक मामले बेहद पेचीदा। वैसे भी क्षत्रपों का इससे कोई सीधा वास्ता भी नहीं!

बयान दर बयान!
अमरीका दौरे पर गए राहुल गांधी के बयान इन दिनों काफी चर्चा में। बात चाहे एससी, एसटी एवं अल्पसंख्यकों की हालत वाला बयान हो या फिर मुस्लिम लीग को सेकुलर बताने वाला। कांग्रेस नेता भरपूर चर्चा में। वह भी विदेशी धरती से। यह किसी भी नेता के लिए अच्छी बात कि उसकी चर्चा होती रहे। इधर, देश में भाजपा एवं कांग्रेस के बीच वार प्रतिवार हो रहा। यह अपेक्षित भी। कांग्रेस का यह कदम पीएम मोदी को काउंटर करने रणनीति मानी जा रही। लेकिन सवाल वही। कांग्रेस को इससे जमीनी स्तर पर कितना लाभ होगा? परसेप्शन एवं नैरेटिव बनाने की बात अपनी जगह। लेकिन राजनीतिक दल के लिए जनता के वोट हासिल करना एवं उसमें बढ़ोतरी करना केन्द्रीय बिंदु। सो, इस मामले में कांग्रेस को कितना फायदा, नुकसान? क्योंकि राहुल गांधी के लंदन वाले बयानों पर भी संसद में काफी हंगामा हो चुका।
-दिल्ली डेस्क 

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