शहर की हवा में घुले परागकण, अस्थमा और एलर्जी के मरीजों की बढ़ी मुसीबतें

अस्थमा भवन में स्थापित बुर्कार्ड मशीन से लगा पता

शहर की हवा में घुले परागकण, अस्थमा और एलर्जी के मरीजों की बढ़ी मुसीबतें

शहर की हवा में इन दिनों परागकण की मौजूदगी हो चुकी है और यह अस्थमा-एलर्जी के मरीजों के लिए मुसीबत बन गए हैं। होलोप्लेलिया इंटीग्रिफोलिया ट्री या चिलबिल ट्री जिसे आम भाषा में बंदर की रोटी भी कहा जाता है, यह शहर का सबसे एलर्जेनिक पौधा परागकण है।

 जयपुर। शहर की हवा में इन दिनों परागकण की मौजूदगी हो चुकी है और यह अस्थमा-एलर्जी के मरीजों के लिए मुसीबत बन गए हैं। होलोप्लेलिया इंटीग्रिफोलिया ट्री या चिलबिल ट्री जिसे आम भाषा में बंदर की रोटी भी कहा जाता है, यह शहर का सबसे एलर्जेनिक पौधा परागकण है। यह परागकण एक से दो महीने की अवधि के लिए हवा में बहुत अधिक मात्रा में रहता है। यह प्लांट परागकण जयपुर शहर की हवा में इस साल पहली बार 28 फरवरी को देखा गया। इस परागकण का हवा में बुर्कार्ड परागकण काउंटर नामक एक उपकरण की मदद से पता चला है। यह एक परागकण प्रवेश मशीन है, जिसे 12 वर्ष पहले अस्थमा भवन विद्याधर नगर जयपुर स्थित श्वसन केंद्र और अस्पताल में स्थापित किया था। अस्थमा भवन की निदेशक डॉ. निष्ठा सिंह ने बताया कि दमा परागण की वेबसाइट पर दैनिक परागकण गणना रिकॉर्ड की जाती है। इस डेटा को हर कोई देख सकता है। अस्थमा और एलर्जी के रोगियों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है।

सुबह-शाम आमजन रहें सतर्क
डॉ. सिंह ने बताया कि यह परागकण सुबह और शाम के समय हवा में उच्च सांद्रता में मौजूद होता है। जिन रोगियों को इस पौधे से एलर्जी है, उन्हें अपने घरों से बाहर जाना कम करना चाहिए और सुबह और शाम के समय ट्रिपल लेयर्ड मास्क से नाक और मुंह को अच्छी तरह से ढकना चाहिए। लोगों को इस परागकण के मौसम में अपनी बाहरी गतिविधियों को सीमित करने की सलाह दी जाती है। यह एलर्जी के मौसम की शुरुआत को दर्शाता है, क्योंकि अस्थमा एलर्जी के रोगियों की संख्या में इन दिनों काफी बढ़ोतरी हो रही है। यह परागकण मौसम अप्रैल के अंत तक रहेगा और मरीज नाक से पानी बहना, सांस लेने में समस्या, आंखों में जलन और चकत्ते सहित विभिन्न लक्षणों के साथ अस्पताल में आ रहे हैं।

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