Nobel Prize 2023: कैटालिन कारिको और ड्रू वीसमैन को मिला नोबेल प्राइज, कोरोना वैक्सीन बनाने से जुड़ी खोज की थी

नोबेल पीस प्राइज की घोषणा 6 अक्टूबर को की जाएगी

Nobel Prize 2023: कैटालिन कारिको और ड्रू वीसमैन को मिला नोबेल प्राइज, कोरोना वैक्सीन बनाने से जुड़ी खोज की थी

न्यूक्लियोसाइड बेस संशोधनों से संबंधित उनकी खोजों के लिए ये पुरुस्कार दिया गया है। इसी खोज की मदद से covid​​​​-19 से लड़ने के लिए एमआरएनए वैक्सीन को विकसित करने में मदद मिली थी।

नोबेल प्राइज 2023 की घोषणा हो चुकी है। फिजियोलॉजी या मेडिसिन के लिए कैटालिन कारिको (Katalin Karikó) और ड्रू वीसमैन (Drew Weissman) को नोबेल प्राइज से सम्मानित किया गया है। इन्हें न्यूक्लियोसाइड बेस संशोधनों से संबंधित उनकी खोजों के लिए ये पुरुस्कार दिया गया है। इसी खोज की मदद से covid​​​​-19 से लड़ने के लिए एमआरएनए वैक्सीन को विकसित करने में मदद मिली थी। बता दें कि पुरस्कार जीतने वाले को एक मिलियन अमेरिकी डॉलर का कैश प्राइज दिया जाता है। नोबेल पीस प्राइज की घोषणा 6 अक्टूबर को की जाएगी। वहीं अर्थशास्त्र के क्षेत्र से जुड़े विजेता की घोषणा नौ अक्तूबर होगी।

नवज्योति ने 18 अप्रैल 2021 के अंक में mRNA तकनीक के बारें में विस्तार से बताया था
किसी भी बीमारी की वैक्सीन तैयार होने में कई वर्ष लग जाते है। पूरी दुनिया में कहर ढा रहे कोरोना वायरस का टीका बनाना भी कोई आसान काम नहीं था। लेकिन वैज्ञानिकों के अथक प्रयास के बल पर एक साल से भी कम समय में इसकी वैक्सीन बनकर तैयार हो गई थी। कोरोना के खिलाफ आई फाइजर और मॉडर्ना कंपनी की वैक्सीन ने एक उजाले की किरण दिखाई थी। इन वैक्सीन को बनाने में नई तकनीक का इस्तेमाल किया गया था। यह दोनों एमआरएनए (mRNA) तकनीक पर आधारित वैक्सीन है।

एमआरएनए तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसे बहुत कम समय में विकसित किया जा सकता है। फाइजर और मॉडर्ना की वैक्सीन 90 से 95 प्रतिशत तक प्रभावी है। इस तकनीक के द्वारा शरीर के अंदर बॉडी सेल प्रोटीन बनाने के लिए प्रोत्साहित करती है। इसके साथ ही तंत्रिका तंत्र को इस तकनीक के जरिए जरूरी प्रोटीन मिलता है। अर्थात् जब हमारे शरीर पर कोई वायरस या बैक्टीरिया हमला करता है तो एमआरएनए तकनीक हमारी सेल्स को उस वायरस या बैक्टीरिया से लड़ने के लिए प्रोटीन बनाने का मैसेज भेजती है। इससे हमारे इम्यून सिस्टन को जो जरूरी प्रोटीन चाहिए, वो मिल जाता है और हमारे शरीर में एंटीबॉडी बन जाती है। एमआरएनए वैक्सीन में असली वायरस की जरूरत नहीं होती इसलिए इसे पारंपरिक वैक्सीन की तुलना में ज्यादा जल्दी बनाया जा सकता है। इससे शरीर की इम्यूनिटी भी बढ़ती है। ये पहली बार है जब दुनिया में इस तकनीक पर आधारित वैक्सीन बनी है।

एमआर तकनीक लॉग लास्टिंग है। यह तकनीक भविष्य में काफी प्रभावी रहेगी। इस तकनीक के जो रिजल्ट आए है उनकी एफीकेसी 90 प्लस प्रतिशत है। उनके ज्यादा बेहतर रिजल्ट है।
-डॉ. पुनीत रिजवानी, प्रोफेसर एंड हैड, मेडिसिन विभाग, महात्मा गांधी हॉस्पिटल, जयपुर

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