राज-काज में क्या है खास

कुछ तो गड़बड़ है

राज-काज में क्या है खास

बे में इन दिनों हाथ वाले भाई लोगों में फिर से सुगबुगाहट शुरू हो गई। इंदिरा गांधी भवन में बने पीसीसी के ठिकाने से चालू हुई यह सुगबुगाहट सिविल लाइंस होकर दिल्ली तक पहुंच गई।

कुछ तो गड़बड़ है

सूबे में इन दिनों हाथ वाले भाई लोगों में फिर से सुगबुगाहट शुरू हो गई। इंदिरा गांधी भवन में बने पीसीसी के ठिकाने से चालू हुई यह सुगबुगाहट सिविल लाइंस होकर दिल्ली तक पहुंच गई। दो गुटों में फंसे वर्कर्स ने चार महीने पहले जाड़ों की रातों में राहत की सांस ली थी कि कांग्रेस के राजकुमार के फार्मूले से सियासी जंग के ब्रेक लग गए, लेकिन पिछने दिनों जोधपुर वाले भाई के बेटे को लेकर छोटे पायलट ने अपना मुंह खोला तो, वर्कर्स की गलतफहमियां भी दूर हो गई। अब बेचारे वर्कर्स को कौन समझाए कि जब दूध फट जाता है, तो केवल छैना ही बन सकता है, दही नहीं। वर्कर्स के भी समझ में आ गई कि अभी भी कुछ गड़बड़ है। गड़बड़ क्या है, यह तो समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी हैं।

बिना सेना के पति
सूबे में हाथ वाले भाई लोगों का भी कोई सानी नहीं है, जो कुछ करते हैं, अदृश्य शक्ति के पीछे करते हैं। करे भी क्यों नहीं, उनको भरोसा जो है। अब देखो ना मिशन 2023 के लिए नीति और रीति दोनों बना ली। सेनापति को अदृश्य शक्ति पर भरोसा है कि बिना सेना के भी फतह करेंगे। तभी तो 400 ब्लॉकों में 19 महीनों से बिना अध्यक्षों के काम चला रहे हैं। इंदिरा गांधी भवन में सालों से आ रहे बुजुर्गवार की मानें तो बिना सेना के युद्ध जीतने का सपना देख रहे सेनापति कॉन्फिडेंस में नहीं, बल्कि ओवर कॉन्फिडेंस में हैं। वर्कर्स के भी समझ में नहीं आ रहा है कि बिना सेना के युद्ध जीतने का सपना आखिर कैसे पूरा होगा, जबकि सामने वालों ने लड़ाकुओं को सीमा पर तैनात कर मुंह ताक रहे हैं।

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ट्रेनिंग मुखबंद की
दरबार के बाहर कोई राजा के बिना हुक्म के कोई भी वजीर मुंह नहीं खोल सकता। कुछ इसी तरह के संकेतों से वजीरों के चेहरों पर भी चिंता की लकीरें हैं। हमारे सूबे के नेता काफी वाचाल हैं। यह आदत उनकी काफी पुरानी है। छपास के रोगियों की तो अर्द्ध-रात्रि तक भी नींद गायब रहती थी। लेकिन अब मामला उल्टा नजर आ रहा है। जो भाई साहब अर्द्ध-रात्रि को भी हालचाल पूछ कर एक लाइन छापने की गुहार करते थे, वो अब देखते ही बगलें झांक कर निकल जाते हैं। राज का काज करने वालों ने इसका राज खोला तो अपने भी कान खड़े हो गए। उन बेचारों का कोई कसूर नहीं है, उन्हें अभी से मुखबंद की ट्रेनिंग जो दी जा रही है। उनको साफ कहा गया है कि अंदर की बात की गंध खबर सूंघने वालों की नाक से कौसों दूर होनी चाहिए।

किसके गाएं गीत
आजकल हाथ वाली पार्टी में सोनिया के साथ प्रियंका और राहुल की काफी चर्चा है।  पांच प्रदेशों के चुनावों के नतीजों के बाद भी हर किसी हाथ वाले को प्रियंका और राहुल के सिवाय कुछ दिखता नहीं। पिछले दिनों  वे बहन-भाई के बीच तुलना भी करने लगे थे। लेकिन अब वे संकट में हैं। जब से प्रियंका जी ने मुम्बई को दुनिया का बेहतरीन शहर और राहुल भैया ने जयपुर को वर्ल्ड क्लास सिटी बनाने का दावा किया है, तब से हाथ वालों की जुबान पर ताला सा लग गया। राज का काज करने वाले चटकारे ले रहे हैं कि अब पता चलेगा कि बहन-भाई में से किसके गुणगान किए जाएं।

सत्र खत्म होने का इंतजार
हाथ वाली पार्टी के विधायकों को विधानसभा सदन के खत्म होने का बेसब्री से इंतजार है। तभी तो उनका ध्यान सत्र की कार्रवाई की तरफ कम है। किसी ने उनको हवा दे दी कि सत्र के बाद रिपोर्ट कार्ड से कई रत्नों को इधर-उधर किया जाएगा, जिससे नए को मौका मिलना तय है। बस इसके बाद से भाई लोग सदन के भीतर बैठने के बजाय जादूगर के चैम्बर के आसपास मंडराते दिखाई देते हैं। वे इस जुगाड़ में है कि रुतबे के लिए किसी भी तरह छोटे-मोटे विभाग में जगह मिल जाए।
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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