'इंडिया गेट'

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किसकी लगेगी लॉटरी?
राजस्थान भाजपा में पार्टी के संसदीय बोर्ड का जिक्र खूब हो रहा। आखिर यही बोर्ड अगर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी। तो उसके मुख्यमंत्री का नाम तय करेगा। लेकिन इसी ताकतवर बोर्ड में अभी कुल 11 में से चार स्थान रिक्त। इनमें से अरुण जेटली और सुषमा स्वराज का निधन हो चुका। तो वैंकया नायडू उपराष्ट्रपति और थावरचंद गहलोत कर्नाटक के राज्यपाल हो गए। अब इसमें किसकी लॉटरी लगेगी, यही चर्चा। सबसे पहला नाम यूपी के सीएम योगी आदित्नाथ का सामने आ रहा। जिस प्रकार से उन्होंने यूपी में पार्टी को जीत दिलवाई। उससे उनका संगठन में कद बढ़ना तय। उनकी पहचान भी फायरब्रांड नेता की। सो, उनको भाजपा संसदीय बोर्ड में शामिल किया जाना बहुप्रतिक्ष्ति लग रहा। चर्चा में नाम तो धर्मेन्द्र प्रधान, निर्मला सीतारमण, भूपेन्द्र यादव एवं स्मृति ईरानी के भी। वर्तमान में भाजपा संसदीय बोर्ड में सात सदस्य। जिसमें पीएम मोदी, जेपी नड्डा, अमित शाह, शिवराज सिंह चौहान, संगठन महामंत्री बीएल संतोष, राजनाथ सिंह एवं नितिन गडकरी बतौर सदस्य।


नहीं हुआ संगम!
तो यह एकदम साफ हो गया। फिलहाल कांग्रेस और पीके का संगम नहीं हो सका। हालांकि शोरगुल जमकर हुआ। लेकिन सारा मिशन फुस्स साबित हुआ। हालांकि दोनों ही पक्षों ने इतनी गुंजाइश रखी कि आगे से कभी मिलने की नौबत आए। तो शर्मिदा होने की स्थिति नहीं बने। अब भाई लोग इसके मतलब निकाल रहे। पीके ने दस जनपथ जाकर अपना समय क्यों गंवाया। तो सोनिया गांधी ने क्यों पीके के सामने सभी पार्टी के बुजुर्ग नेताओं को बैठा दिया। आखिर मसला भी साल 2024 में मोदी-शाह की भाजपा से मुकाबिल होने का था। याद रहे। कांग्रेस यूं ही कांग्रेस नहीं। इसकी गति मानो हाथी की चाल। यहां बदलाव इतना आसान नहीं। वह भी बात जब आमूल चूल परिवर्तन की हो। कांग्रेस में ऐसे-ऐसे दिग्गज। जिनको राजनीतिक आयु ही पीके की वास्तविक आयु से कहीं ज्यादा। इन्होंने पूरा जीवन लगा दिया कांग्रेस और इसकी विचारधारा के लिए। अब आखिरी दौर में क्या पीके इन्हें जमीनी राजनीति का ज्ञान देंगे और चुनावी रणनीति समझाएंगे?


पीके बनाम कांग्रेसी पीके!
पीके यानी प्रशांत किशोर। राजनीतिक क्षेत्र में काफी चर्चित नाम। चुनावी रणनीतिकार के रुप में देशभर में अपनी पहचान बना चुके। भाजपा समेत कई क्षेत्रीय दलों एवं नेताओं के साथ चुनावी काम कर चुके। लेकिन अब एक और पीके कांग्रेस में भी। पीके यानी पवन खेड़ा। उदयपुर, राजस्थान निवासी। आजकल पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता। भाजपा, पीएम मोदी एवं केन्द्र सरकार पर खूब हमलावर रहते हैं। कभी दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित के करीबी रहे और उनके साथ काम भी किया। असल में, दिल्ली में जब खबरनवीसों ने चुनावी प्रबंधक पीके से कांग्रेस की बात बिगड़ने पर सवाल किया। तो कांग्रेस के पीके का जवाब था। वह यह सब नहीं बता सकते। हालांकि वह खुद भी पीके। तो फिर इस हाजिर जवाबी पर हंसी ठहाके गूंजने ही थे। लेकिन पवन खेड़ा ने एक इशारा तो कर ही दिया। राजनीति के मामले में कांग्रेस समंदर के मानिंद। पार्टी और इसके नेताओं को समझना इतना आसान भी नहीं। जिसे प्रशांत किशोर ने भी स्वीकारा!

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हलचल ही हलचल?
राजस्थान में भले ही विधानसभा चुनाव साल 2023 के अंत में। लेकिन इस बार लगता है भाजपा एवं कांग्रेस को मानो जल्दी। साथ में, इस बार आम आदमी पार्टी और ओवैसी की एआईएमआईएम के भी मैदान में कूदने की सुगबुगाहट। सो, प्रदेश में राजनीतिक गतिविधियां एवं नेताओं के दौरे तेज हो रहे। जहां उदयपुर में चिंतन शिविर के बहाने तमाम कांग्रेसी दिग्गज जुटेंगे। यह आयोजन अपने आप में चुनावी रणभेरी। वहीं, उसके बाद राहुल गांधी फिर से जयपुर आएंगे। इसी प्रकार से भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा एवं गृहमंत्री अमित शाह के भी दौरे प्रस्तावित। हां, कांग्रेस में जयपुर से ह्यसंभावित बदलावह्ण के लिए एक खबर आई। तो उसका करारा पलटवार ह्यदिल्लीह्ण से किया गया। सो, हलचल तो होगी ही। भाजपा में कार्यकतार्ओं के लिए प्रशिक्षण शिविरों का दौर शुरू। झालावाड़ में प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया। तो बारां में गजेन्द्र सिंह शेखावत पहुंचे। यह भी अपने आप में संकेत, संदेश। इधर दिल्ली में मिलने-जुलने एवं मुलाकातों का दौर। सो, नेताओं की भागदौड़ जारी।


आरोप... प्रत्यारोप... ?
देश के अधिकतर राज्य बिजली संकट के दौर से गुजर रहे। भीषण गर्मी के दौर में आम जनता त्राहिमाम हो रही। ऐसे समय में बिजली कटौती किसी सजा से कम नहीं। मौके को ताड़कर जहां कांग्रेस ने भाजपा पर वार किए। तो भाजपा ने भी उसके आरोपों का जवाब दिया। लेकिन समस्या का समाधान नदारद! करीब 16 राज्यों में दिनभर में दो से लेकर दस घंटे की बिजली कटौती हो रही। छात्रों की परीक्षा का समय अलग से। बिजली कटौती के लिए कभी पर्यावरण, तो कभी कोयला एवं खान मंत्रालय की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे। फिर ऊर्जा मंत्रालय कैसे बचेगा? इसी के लपेटे में रेल मंत्रालय भी। लेकिन एक सवाल। इन सब मंत्रालयों के बीच समन्वय एवं तालमेल की जिम्मेदारी किसकी? इससे भी जरुरी सवाल बिजली की संभावित खपत और उपलब्ध संसाधनों का अनुमान लगाना किसकी जिम्मेदारी? क्या एक दूसरे पर टोपी उछाल देने से बिजली संकट दूर होगा? देश के नीति नियंताओं को सोचना होगा। इन सबमें जनता ही पिस रही।


पेंडूलम जैसे हालात!
जम्मू-कश्मीर से साल 2009 में यूपीएससी टॉप करने वाले शाह फेसल की हालात पेंडूलम जैसी। पहले दस साल तक नौकरी की। महत्वपूर्ण एवं संवदेनशील पदों पर काम किया। फिर आतंकियों के समर्थन में इस्तीफा दे बैठे। बाद में नया दल बनाकर नेता बनने चले थे। जब दिमाग ठीक हुआ। तो वापस वापस नौकरी की सूझी। सरकार भी सदाशयता दिखा रही। सो, अब वह पुन: मुख्यधारा में लौट रहे। हां, उन्होंने इस्तीफा अनुच्छेद- 370 के हटने से पहले दिया। फैसल कश्मीर को लेकर बड़ा निर्णय होने के बाद तुर्की भाग रहे थे। हवाई अड्डे पर पकड़े गए। घर में पूरे डेढ़ साल नजरबंद रहे। इस दौरान सोचने, समझने का फ्रेम बदल गया। अब कह रहे। वह भटक गया। अपने आइडियलिज्म ने उसे धोखा दिया! इससे बहुत कुछ खो बैठा। दोस्त, शुभ चिंतक एवं केरियर। सो, पछतावे का भाव। लेकिन जो अंसतोष जताया। उसका क्या? टॉपर आईएएस के असंतोष को इतना हल्के से लिया जाना चाहिए? कहीं बड़ी प्लानिंग पर तो काम नहीं हो रहा?
-दिल्ली डेस्क

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