जाने राजकाज में क्या है खास

जाने राजकाज में क्या है खास
सूबे में होने वाले चुनावों को लेकर सर्वे रिपोर्ट्स से वर्कर ही नहीं बल्कि पार्टियों के लीडर तक कन्फ्यूज्ड है। हो भी क्यों ना, उनकी ओर से हायर की गई सारी एजेंसियां भी अपने-अपने हिसाब से रिपोर्ट्स दे रही हैं।

सर्वे से कन्फ्यूज्ड लीडर
सूबे में होने वाले चुनावों को लेकर सर्वे रिपोर्ट्स से वर्कर ही नहीं बल्कि पार्टियों के लीडर तक कन्फ्यूज्ड है। हो भी क्यों ना, उनकी ओर से हायर की गई सारी एजेंसियां भी अपने-अपने हिसाब से रिपोर्ट्स दे रही हैं। अब देखो ना, तीन महीने पहले तक भगवा वाले भाई लोगों के जमीं पर पैर नहीं टिक रहे थे, लेकिन अब सर्वे रिपोर्ट्स ने उनकी रातों की नींद और दिन का चैन उड़ा दिया। अब बेचारों के पास कोई चारा ही नहीं बचा, तो सरकारी खुफिया एजेंसियों के उन पूर्व अफसरों पर भरोसा जताया है, जो मरु प्रदेश के बारे में नॉलेज रखते हैं। अपना कन्फ्यूजन दूर करने के लिए अब उनको अफसरों की रिपोर्ट का बेसब्री से इंतजार है।

एक-दूजे के लिए
सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में इन दिनों एक गाना गुनगुनाने वालों की संख्या कुछ ज्यादा ही बढ़ती जा रही है। गाने के बोल भी हम बने हैं, तुम बने हैं, एक-दूजे के लिए है। कोई हासन की आवाज में गुनगुनाता है, तो कुछ अग्निहोत्री की तरह लटके-झटके भी दिखाते हैं। ठिकाने के बाहर चाय की दुकान पर कुछ भाई लोगों ने हमें भी सुनाया। राज का काज करने वालों में भी चर्चा है कि भगवा के बड़े-बुजर्गों ने अपने तजुर्बे से समझाया, तब एकता का संदेश देने की याद आई। तजुर्बेदारों का तर्क है कि राजनीति है ही ऐसी चीज, जिसमें दोस्त और दुश्मन भी एक-दूसरे की आवश्यकता बन जाते हैं। चर्चा तो यह भी है कि हाथ वालों की एकता के संदेश से सबक लेते हुए भाईसाहबों ने म्हे थांका और थे म्हारा के नए नारे के साथ चलने में ही अपनी भलाई समझी। अगर राज में आना ही है, तो यह सब तो करना ही पड़ेगा, चाहे मजबूरी कुछ भी हो।

जाने वफा यह जुल्म ना कर
पीसीसी के पांच दर्जन पदाधिकारियों और डेढ़ दर्जन प्रकोष्ठों के अध्यक्षों की हालत इन दिनों देखने लायक है। वे रात-दिन चिंता में डूबे हैं कि आखिर वे समाज और सगे-समधियों को क्या मुंह दिखाएंगे। उनका दुखड़ा है कि सालों से हाथ के लिए काम करने पर भी उससे हाथ नहीं मिला सके। कुल 75 में से 60 ने एमएलए बनने का ख्वाब संजो रखा है, लेकिन पार पड़ती नजर नहीं आ रही। अब बेचारे पैनल में नाम जुड़वाने के लिए पीसीसी चीफ की तरफ देख रहे हैं। उनके दिल की आवाज है कि जाने वफा यह जुल्म ना कर, गैरों पर करम, अपनों पर सितम। येनकेन प्रकारेण पैनल में नाम भी जुड़ जाए तो लाज बची रह सकती है।

एक जुमला यह भी
भगवा में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। हो भी क्यूं ना, मामला सबक लेने से ताल्लुक जो रखता है। जुमला है कि 25 सितम्बर को दादिया में जो कुछ हुआ, उससे कई भाई लोग खफा हो गए। होना भी लाजमी था, क्योंकि उन भाई लोगों ने पार्टी के लिए सालों से खून पसीना एक किया है, मगर उनको मंच के आसपास फटकने तक नहीं दिया गया। और तो और लोकल लीडर्स की नजरअंदाजी भी कइयों को पच नहीं सकी। अपमान से आहत कई भाई लोगों ने भी अपने दिल की बात दिल्ली तक  पहुंचाई। बात और बिगड़ती उससे पहले ही 25 की घटना से सबक लेते हुए गैप कम करने का संदेशा भिजवाया गया लेकिन उलटा उस समय हो गया, जब जल्दबाजी में सलाहकारों ने अपरहैण्ड रहने की सलाह दे दी। 

-एल.एल.शर्मा
(यह लेखक के अपने विचार हैं) 

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