जानिए राजकाज में क्या है खास

जानिए राजकाज में क्या है खास

दिल्ली दरबार के लिए होने वाली जंग को लेकर दोनों दलों के नेताओं का इन दिनों ब्लड प्रेशर बढ़ता जा रहा है। उन पर नामी डॉक्टरों की दवा-दारू भी बेअसर हो रही है।

बढ़ा ब्लड प्रेशर
दिल्ली दरबार के लिए होने वाली जंग को लेकर दोनों दलों के नेताओं का इन दिनों ब्लड प्रेशर बढ़ता जा रहा है। उन पर नामी डॉक्टरों की दवा-दारू भी बेअसर हो रही है। दिल्ली दरबार में पिछले पांच साल पंच रहे भगवा वाले भाई लोगों को चिन्ता है कि कब पर्ची से नाम कट जाए, कुछ पता नहीं। सूबे की जंग में हार का सामना कर चुके तीन पंचों ने तो सवामणी तक बोल चुके हैं। हाथ वाले भाई लोग पब्लिक के मिजाज से पहले ही बीपी से पीड़ित है।  राज का काज करने वाले लंच केबिनों में बतियाते हैं कि पिछले दिनों खुली पर्ची से मैसेज तो मिल चुका है कि चेंज के चांस ज्यादा है, मगर भाईसाहबों का दिल है कि मानता ही नहीं। 

चौरासी का फेर
फेर तो फेर ही होता है, चाहे वह सात का फेर हो या फिर चौरासी का। जो सात के फेर में फंसता है, वो तो जीवनभर बाहर नहीं निकलता, लेकिन जो चौरासी के फेर में फंसते हैं, वे आधी बार अंदर और आधी बार बाहर ही रहते हैं। अब देखो ना सूबे में हाथ वालों के साथ कमल वाले भी चौरासी के फेर में ऐसे फंसे हुए हैं कि न तो उनके उगलते बन रहा है और नहीं निगलते। चौरासी के फेर से बाहर निकलने के लिए दिन-रात टोटके करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि यह तो हवा की दिशा ही तय करेगी कि चौरासी के फेर से कौन निकलेगा।

चर्चा में फिर सर्वे
सूबे की सबसे बड़ी पंचायत के चुनाव के बाद एक बार फिर सर्वे को लेकर काफी चर्चा है। चर्चा भी क्यों ना हो, नए सर्वे का ताल्लुक अब सीधा दिल्ली दरबार से है। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में भगवा के दफ्तर के साथ इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने पर भी सर्वे की चर्चा जोरों पर है। सर्वे रिपोर्ट से हाथ वालों के चेहरे पर चिन्ता की लकीरें भी दिखाई देने लगी हैं। वे अभी सूबे में लगे झटके से उभर भी नहीं पाए कि अब नए सर्वे ने दिन का चैन और रात की नींद उड़ा दी। चर्चा है कि नए सर्वे रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली दरबार के लिए हाथ वालों का आंकड़ा पांच साल पहले 52 के आंकड़े से आगे बढ़ना मुश्किल है। मरु प्रदेश में तो खोई साख बचाने के लिए भी पसीने बहाने पड़ेंगे। 

भूत-ए-आरक्षण
आजकल आरक्षण के भूत ने फिर से सबको परेशान कर रखा है। भूत की चपेट में आए लोगों का दिन का चैन और रात की नींद गायब है। हर कोई इससे छुटकारा पाने के लिए टोने-टोटकों का सहारा ले रहा है। कुछ भाई लोग तो तांत्रिकों से झाड़ फूंक भी करवा रहे हैं। सबसे ज्यादा चिंता में वो लोग है, जो दस साल पहले राज के नुमाइंदों के रूप में अपनी चिड़िया बिठाई थी। अलवर वाले भाईसाहब के सान्निध्य में गठित समिति के लोग भी तह में जाने की कोशिश में हैं। वे राज का काज करने वालों का मुंह खुलवाने के अथक प्रयास में है, लेकिन काज करने वालों के पास रटा रटाया एक जवाब है कि हमने तो वो ही किया है, जो ऊपर से आदेश मिला था। माथा लगाने में कोई भलाई भी नजर नहीं आ रही थी। खासा कोठी के ऊंचे कमरों में चर्चा है कि ऐसे तो आरक्षण का भूत निकालना मुश्किल है। 

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असर दो शब्दों का
सूबे में इन दिनों दो शब्दों की चर्चा जोरों पर है। इन दो शब्दों के चलते न राज में काम हो रहा है और नहीं काज करने वालों का मन लग रहा है। गुलाबीनगर से दिल्ली तक इन शब्दों की गूंज है। इंदिरा गांधी भवन में बने पीसीसी ठिकाने के साथ ही सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में भी हर आने वाला इनकी चर्चा जरूर करता है। हमें भी राज का काज करने वाले एक साहब ने दोनों शब्दों को बताया। दोनों के अक्षर समान हैं, पर अर्थों में काफी फर्क है। एक है एआईसी जिसका अर्थ है ऑल इंडिया कांग्रेस और दूसरा है आईएसी जिसका मतलब इंडिया अंगेस्ट करप्शन।  गुजरे जमाने में आईएसी को तो अन्ना ने बच्चों की जुबान तक ला दिया था। 

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-एल एल शर्मा

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