कर्नाटक हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : शिक्षण संस्थान में वंदे मातरम् का गायन अनिवार्य नहीं, जनहित याचिका ख़ारिज
वंदे मातरम पर फैसला: कर्नाटक हाई कोर्ट ने खारिज की याचिका
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने स्कूलों में वंदे मातरम के सभी छह छंदों के गायन के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि केंद्र की सलाह अनिवार्य नहीं है, क्योंकि इसमें 'सकते हैं' (May) शब्द का प्रयोग हुआ है। पीठ ने कहा कि राष्ट्रीय गीत के लिए कोई वैधानिक बाध्यता नहीं है।
बेंगलुरु। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने गुरुवार को उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें स्कूलों में राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' के सभी छह छंदों को गाने की केंद्र सरकार के परामर्श को चुनौती दी गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि केंद्र का यह निर्देश अनिवार्य नहीं है। मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू और न्यायमूर्ति सीएम पूनाचा की पीठ ने इस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। पीठ ने कहा कि केंद्रीय गृह मंत्रालय की सलाह में 'सकते हैं' (मे) शब्द का प्रयोग किया गया है, जो यह दर्शाता है कि शिक्षण संस्थान इसे मानने के लिए बाध्य नहीं हैं। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि राष्ट्रीय गीत के गायन को लेकर कोई वैधानिक अनिवार्यता नहीं है।
पीठ ने राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत के बीच के अंतर को भी स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि जहाँ राष्ट्रगान स्थापित कानूनी और नियामक प्रावधानों के दायरे में आता है, वहीं राष्ट्रीय गीत किसी वैधानिक ढांचे के अधीन नहीं है। इसके अलावा, अदालत ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अरविंद कामथ की उन दलीलों पर भी गौर किया, जिसमें बताया गया कि इसी तरह की एक याचिका को उच्चतम न्यायालय द्वारा पहले ही खारिज किया जा चुका है।
अधिवक्ता सोमशेखर राजवंशी द्वारा दायर इस जनहित याचिका में केंद्र के फरवरी 2026 के परामर्श को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि यह सलाह सरकारी स्कूलों के छात्रों को 'वंदे मातरम' के सभी छह छंद गाने के लिए मजबूर करती है, जिसमें हिंदू देवी-देवताओं के संदर्भ वाले हिस्से भी शामिल हैं। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि गीत के शुरुआती छंद व्यापक रूप से देशभक्ति के रूप में स्वीकार किए जाते हैं, लेकिन विस्तृत संस्करण में देवी दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के संदर्भ हैं। स्कूलों में इसके दैनिक गायन को अनिवार्य करना धर्मनिरपेक्षता, समानता और अंतरात्मा की स्वतंत्रता के संवैधानिक गारंटियों का उल्लंघन है। उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह के कार्यकारी निर्देश सरकारी सहायता प्राप्त संस्थानों में छात्रों पर धार्मिक तत्व नहीं थोप सकते।
हालांकि, उच्च न्यायालय ने इन दलीलों पर विचार करने के बाद कहा कि वह इस मामले की विस्तृत जांच करने का इरादा नहीं रखता क्योंकि यह सलाह बाध्यकारी नहीं है। पीठ ने टिप्पणी की कि किसी गैर-अनिवार्य निर्देश पर न्यायिक समय खर्च करना उचित नहीं होगा और इसी के साथ याचिका खारिज कर दी गई।

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