ईरानी लेफ्टिनेंट कर्नल इब्राहिम जोल्फागरी की कड़ी चेतावनी: शर्तों के अनुरूप होने पर अमेरिका के साथ बातचीत संभव, तब तक कुछ भी नहीं होगा सामान्य 

ईरान का सख्त रुख: "शत्रुता त्यागने तक अमेरिका से कोई बात नहीं"

ईरानी  लेफ्टिनेंट कर्नल इब्राहिम जोल्फागरी की कड़ी चेतावनी: शर्तों के अनुरूप होने पर अमेरिका के साथ बातचीत संभव, तब तक कुछ भी नहीं होगा सामान्य 

ईरान ने अमेरिका के 15 सूत्री शांति प्रस्ताव को ठुकराते हुए स्पष्ट किया है कि जब तक वाशिंगटन अपनी आक्रामक सोच और शत्रुता नहीं त्यागता, कोई बातचीत संभव नहीं है। प्रवक्ता इब्राहिम जोल्फागरी ने इसे स्वाभिमान की लड़ाई बताया। 28 फरवरी के हमलों के बाद तनाव चरम पर है, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता और कूटनीतिक समाधान की उम्मीदें धुंधली हो गई हैं।

तेहरान। ईरान ने अमेरिका के साथ तत्काल किसी भी प्रकार की बातचीत से इनकार करते हुए कहा है कि वार्ता तभी संभव है जब वह ईरान की इच्छा के अनुरूप होगी और अमेरिका ईरानी लोगों के प्रति किसी भी प्रकार के शत्रुतापूर्ण इरादे को पूरी तरह से त्याग देगा। ईरान के खातम अल-अनबिया केंद्रीय मुख्यालय के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट कर्नल इब्राहिम जोल्फागरी ने बुधवार को एक कड़ा संदेश देते हुए कहा कि जब तक अमेरिका अपनी आक्रामक सोच को नहीं त्याग देता तब तक सामान्य स्थिति बहाल नहीं हो पाएगी।

रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने कहा, "जब तक हमारी इच्छा नहीं होगी तब तक कुछ भी सामान्य नहीं होगा। हमारा पहला और आखिरी शब्द यही था, है और रहेगा। हम जैसे लोग आप जैसे लोगों के साथ कभी बातचीत नहीं करेंगे।" ये टिप्पणियां उन खबरों के बीच आई हैं जिनमें कहा गया है कि अमेरिका ने ईरान को मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष को कम करने के उद्देश्य से 15 सूत्री प्रस्ताव पेश किया है, जिसका असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर पड़ने लगा है। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में अज्ञात अधिकारियों के हवाले से यह जानकारी दी गई है।

अमेरिकी और इजरायली सेनाओं द्वारा 28 फरवरी को तेहरान सहित पूरे ईरान में कई ठिकानों पर हमले किए जाने के बाद से अमेरिका और ईरान के बीच तनाव काफी बढ़ गया है। इन हमलों में भारी नुकसान हुआ और नागरिक हताहत हुए। ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए इजरायल और क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले किए।

अमेरिका और इज़रायल ने हालांकि शुरू में इन हमलों को ईरान के परमाणु कार्यक्रम के खिलाफ पूर्वनिर्धारित उपाय बताया था लेकिन बाद में दोनों देशों ने संकेत दिया कि ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव को कम करना और संभावित रूप से नेतृत्व में बदलाव लाना उनके व्यापक उद्देश्यों में हैं। इस पृष्ठभूमि में ईरान का नवीनतम रुख एक कठोर स्थिति का संकेत देता है, जिससे निकट भविष्य में किसी भी राजनयिक सफलता की संभावना पर संदेह उत्पन्न होता है।

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