भारत के युवाओं में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति

भारत के युवाओं में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति

यदि कोई भी युवा आत्महत्या के विचारों से जूझ रहा हैए तो उसे किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात करनी चाहिए

भारत एक विकसित राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है, किंतु एक चिंताजनक पहलू जो इस विकास यात्रा में बाधा बनकर उभर रहा है, वह है युवाओं में बढ़ती आत्महत्या की दर। यह ज्वलंत मुद्दा न केवल सामाजिक चिंता का विषय बन गया है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी खतरा पैदा कर रहा है। दरअसल भारत अब दुनिया में सबसे अधिक आत्महत्या दर वाला देश बन गया है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा जारी हालिया रिपोर्ट के आंकड़े भारत में आत्महत्या की गंभीर स्थिति को उजागर करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार 2022 में भारत में 1.71 लाख लोगों ने आत्महत्या की, जो दुनिया के अन्य देशों में सबसे अधिक है। यह प्रति एक लाख जनसंख्या पर 12.4 प्रतिशत की आत्महत्या दर के बराबर है, जो अब तक का सबसे अधिक आंकड़ा है। यह आंकड़ा चिंताजनक है, खासकर जब हम यह भी जानते हैं कि भारत में आत्महत्या के मामलों की वास्तविक संख्या अंदाजों से कहीं अधिक हो सकती है। अपर्याप्त पंजीकरण प्रणाली, मृत्यु के चिकित्सा प्रमाणन की कमी और आत्महत्या से जुड़े सामाजिक कलंक के कारण कई मामलों का पता तक नहीं चल पाता है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि 41 प्रतिशत आत्महत्याएं 30 वर्ष से कम आयु के युवाओं द्वारा की जाती हैं। भारत में युवा महिलाओं के लिए मृत्यु का प्रमुख कारण भी आत्महत्या ही बन गया है।

युवाओं में आत्महत्या के पीछे अनेक जटिल कारण सम्मिलित हैं, जिनमें मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं, शैक्षणिक दबाव, सामाजिक आर्थिक समस्याएं, प्रेम संबंधों में असफलता, व्यसन और घरेलू हिंसा आदि इसके कुछ प्रमुख कारण हैं। भारत में युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का बोझ काफी ज्यादा है, लेकिन उनमें से ज्यादातर इसका उपचार नहीं कराते। परीक्षाओं में सफलता का अत्यधिक दबाव, अभिभावकों और शिक्षकों की अपेक्षाएं और असफलता का डर युवाओं को आत्महत्या की ओर धकेल सकता है। गरीबी, बेरोजगारी, सामाजिक बहिष्कार, भेदभाव और परिवार में तनाव भी आत्महत्या के लिए जोखिम कारक बन सकते हैं। दुर्भाग्यपूर्ण प्रेम संबंध, ब्रेकअप और अकेलापन भी युवाओं को आत्महत्या के लिए प्रेरित कर सकते हैं। इसी प्रकार शराब और मादक द्रव्यों का सेवन भी आत्महत्या के जोखिम कारकों में शामिल है। युवाओं के बीच इंटरनेट के उपयोग में होने वाली उल्लेखनीय वृद्धि भी आत्महत्या में प्रमुख भूमिका अदा करती है। इसके कुछ अन्य कारकों में साइबर बुलिंग, लैंगिक उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, और सामाजिक मूल्यों में गिरावट भी शामिल हो सकते हैं। मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं आत्महत्या का एक बड़ा कारण हैं। भारत में लगभग 54 प्रतिशत आत्महत्याएं मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के कारण होती हैं। नकारात्मक एवं दर्दनाक पारिवारिक मुद्दे भी आत्महत्या के एक बड़े कारण के रूप में देखे गए हैं और भारत में इनके कारण होने वाली आत्महत्याओं के मामले लगभग 36 प्रतिशत हैं। पढ़ाई के दबाव से यानी शैक्षणिक तनाव से होने वाली आत्महत्याओं के मामले लगभग 23 प्रतिशत पाए गए हैं। इसी प्रकार भारत में होने वाली आत्महत्याओं में सामाजिक एवं जीवनशैली कारकों का लगभग 20 प्रतिशत और हिंसा का 22 प्रतिशत योगदान रहता है। इसके अलावा आर्थिक संकट के कारण 9.1 प्रतिशत और संबंधों की वजह से लगभग 9 प्रतिशत आत्महत्याएं भारत में देखी गई हैं। इसी प्रकार युवा लड़कियों और महिलाओं में कम उम्र में विवाह, कम उम्र में मां बनना, निम्न सामाजिक स्थिति, घरेलू हिंसा, आर्थिक निर्भरता और लैंगिक भेदभाव भी आत्महत्या के महत्वपूर्ण कारक हैं। आत्महत्या के आंकड़ों के अनुसार भारत में वर्ष 2022 में परीक्षा में असफलता के कारण 2095 लोगों ने आत्महत्या की थी। सोशल मीडिया या मीडिया के माध्यम से आत्महत्या से संबंधित प्रसारित होने वाले समाचारों का भी समाज पर गहरा प्रभाव पड़ता है और यह भी आत्महत्या का एक जोखिम कारक बनता है। आत्महत्या के किसी विशेष कारक की पहचान करना और उसका समाधान ढूंढ़ना बहुत मुश्किल होता है। फिर भी यह जरूरी है कि हम इन कारणों को समझें और उन्हें दूर करने के लिए मिलकर काम करें। 

इस भीषण समस्या का समाधान ढूंढ़ने के लिए बहुआयामी रणनीति अपनाने की आवश्यकता है, जिसमें मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में सुधार, शैक्षणिक प्रणाली में सुधार, सामाजिक-आर्थिक सहायता, प्रेम संबंधों में परामर्श, व्यसन से मुक्ति, हेल्पलाइन और सहायता समूह, मीडिया की जिम्मेदारी और सामुदायिक जागरूकता शामिल हैं। इसके लिए सरकारों, गैर-सरकारी संगठनों और समुदायों को मिलकर महत्वपूर्ण कदम उठाने चाहिए, ताकि इस सामाजिक कलंक को कम किया जा सके और युवाओं को जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए सशक्त बनाया जा सके। युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में जागरूकता बढ़ाना और उन्हें समस्याओं का सामना करने के लिए स्वस्थ तरीके सिखाना बहुत आवश्यक है।

दरअसल आत्मघाती व्यवहार में संलग्न युवाओं को यह जानकारी देनी आवश्यक है कि वे जिन समस्याओं का सामना कर रहे हैं, उनका वैकल्पिक और उचित समाधान मौजूद है। अगर इस प्रकार समस्याओं से परेशान युवाओं से लगातार बातचीत की जाए और उन्हें अच्छी प्रकार समझाया जाए, तो आत्महत्या जैसे बड़े संकट से उन्हें बचाया जा सकता है। 

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युवाओं को इस प्रकार समझाना होगा कि वे समस्या का सामना करते समयए किसी भी प्रकार की मदद मांगने में संकोच न करें। इसके लिए उनके व्यवहार में सुधार करने की आवश्यकता होगी। युवाओं को आत्महत्या जैसी प्रवृत्ति से बचने के लिए अपने क्रोध के आवेग को रोकना होगा और अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना सीखना होगा। युवाओं को आत्महत्या से बचाने के लिएए उनकी मानसिक परेशानियों की शीघ्र पहचान करनी चाहिए और अनुकूल वातावरण में उनकी देखभाल के समुचित प्रावधान होने चाहिए। आत्महत्या की प्रवृत्ति रोकने और मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिएए मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को सभी के लिए सुलभ बनाना और उन्हें सस्ती दर पर उपलब्ध कराना भी आवश्यक है। शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन लाकर परीक्षाओं में सफलता के दबाव को कम करना होगा और विद्यार्थियों में आत्मविश्वास बढ़ाने पर ध्यान देना होगा। साथ ही गरीब और जरूरतमंद युवाओं को आर्थिक सहायता प्रदान करना और उन्हें रोजगार के अवसर प्रदान करना भी जरूरी है। युवाओं को प्रेम संबंधों में आने वाली समस्याओं से निपटने के लिए परामर्श और सहायता प्रदान करना चाहिए। नशे से ग्रस्त युवाओं के लिए नशा मुक्ति केंद्रों की स्थापना करनी चाहिए और उन्हें उपचार प्रदान करना चाहिए। आत्महत्या की प्रवृत्ति से ग्रस्त युवाओं और उनके परिवारों के लिए आसानी से उपलब्ध हेल्पलाइन और सहायता समूहों की स्थापना करनी चाहिए। मीडिया को आत्महत्या से संबंधित खबरों को संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ प्रस्तुत करना चाहिए और आत्महत्या को ग्लैमर नहीं देना चाहिए। समाज के सभी वर्गों को आत्महत्या के खतरों के बारे में जागरूक करना चाहिए और उन्हें इस समस्या का समाधान करने के लिए मिलकर काम करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। यदि कोई भी युवा आत्महत्या के विचारों से जूझ रहा हैए तो उसे किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात करनी चाहिए जैसे कि परिवार के सदस्य सेए दोस्त से या चिकित्सक से। युवाओं को आवश्यकता होने पर आत्महत्या रोकथाम हेल्पलाइन का भी उपयोग करना चाहिए। मानसिक रूप से परेशान युवाओं को मदद मांगने में किसी भी प्रकार का संकोच नहीं करना चाहिए। उन्हें अपने आपको यह भरोसा देना चाहिए कि वे अकेले नहीं हैं, बल्कि कई लोग हैं जो उनकी परवाह करते हैं और उनकी मदद करना चाहते हैं। आत्महत्या जैसी घातक प्रवृत्ति से बचने के लिएए स्वस्थ जीवनशैली अपनाना बहुत जरूरी है। स्वस्थ जीवन शैली के अंतर्गतए पर्याप्त नींद लेंए स्वस्थ भोजन करेंए नियमित व्यायाम करें और तनाव को कम करने के लिए स्वस्थ मनोरंजन करें। इसके अलावा सदैव सकारात्मक सोचेंरू नकारात्मक विचारों को दूर भगाएं और सकारात्मक सोच को ही बढ़ावा दें। उन्हें ऐसे लोगों से मित्रता या निकटता रखनी चाहिएए जो उन्हें सही सलाह दें और उनके मानसिक बल को बढ़ाएं। साथ ही उन्हें ऐसे लोगों से दूरी बनाकर रखनी चाहिएए जो उन्हें आत्महत्या जैसी गलत प्रवृत्ति की ओर प्रेरित करें। आत्महत्या जैसी घातक प्रवृत्ति को रोकने में योगा भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। योगा का अभ्यास करके युवा अपने मानसिक स्वास्थ्य में सुधार कर सकते हैं। इन सभी उपायों को अपनाने सेए मानसिक तनाव को दूर करने और आत्मघाती प्रवृत्तियों से बचाव करने में मदद मिल सकती है। मानसिक समस्याओं से जूझ रहे युवाओं के पारिवारिक माहौल को सुधारने का भी भरपूर प्रयास किया जाना चाहिए। पढ़ाई के दबाव में होने वाली आत्महत्याओं को रोकने के लिएए शैक्षणिक सुधार की बेहद आवश्यकता है। दरअसल विद्यार्थियों के अधिकतम अंकों को देखकर उनकी योग्यता का अनुमान नहीं लगाया जा सकताए क्योंकि हर बच्चे या युवा के  भीतर अलग.अलग क्षमताएं तथा अलग.अलग कौशल होते हैं। इसलिए युवाओं की क्षमताओं का पता लगाने की एक वैकल्पिक विधि विकसित की जानी चाहिएए ताकि उनकी रुचिए उनके कौशल और उनकी क्षमताओं को पहचानकर उन्हें उनके अनुरूप कार्यों की जिम्मेदारी दी जा सके। इससे विद्यार्थियों द्वारा की जाने वाली आत्महत्या की घटनाओं में तो कमी आएगी हीए साथ ही हमारे देश और समाज की स्थिति में भी सुधार होगा। इसके अलावा हमारे देश में ऐसे सामाजिक परिवर्तन की भी आवश्यकता हैए जिसमें किसी भी व्यक्ति के साथ जातिगत आधार परए धर्म के आधार पर या लैंगिक आधार पर भेदभाव न किया जाए। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्तिए अंतर क्षेत्रीय सहयोग और सामाजिक व सामुदायिक भागीदारी की बहुत आवश्यकता हैए ताकि किसी भी व्यक्ति में मानसिक स्वास्थ्य जैसी समस्याएं उत्पन्न न हों और ना ही उनमें आत्मघाती प्रवृत्तियां विकसित हो सकें। गैर.सरकारी संगठनों ;एनजीओद्ध और सामाजिक कार्यकर्ताओं को आत्महत्या रोकथाम के लिए जागरूकता अभियान चलाने और पीड़ितों को सहायता प्रदान करने के लिए आगे आना चाहिए। आत्महत्या के कारणों और इससे निपटने के सबसे प्रभावी तरीकों के बारे में अधिक अनुसंधान करने की भी आवश्यकता है। सरकार को इस दिशा में अधिक निवेश करना चाहिए और विश्वसनीय डेटा इकट्ठा करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। राजनीतिक इच्छाशक्ति के माध्यम से आत्महत्या रोकथाम को एक राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना चाहिए और इसके लिए पर्याप्त बजट आवंटित किया जाना चाहिए। सरकार को इस समस्या से निपटने के लिए एक मजबूत राष्ट्रीय रणनीति विकसित करनी चाहिए और इसके कार्यान्वयन पर ध्यान देना चाहिए।  युवाओं का जीवन अमूल्य है और उनके पास इस दुनिया में देने के लिए बहुत कुछ है। इसलिए चाहे परिस्थितियां कितनी भी मुश्किल क्यों न होंए उन्हें उम्मीद की किरण कभी नहीं छोड़नी चाहिए और समस्याओं से हार न मानकर बेहतर भविष्य के लिए प्रयास करते रहना चाहिए। आत्महत्या कभी भी किसी समस्या का समाधान नहीं है। आज हमारे देश के युवाओं में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। जागरूकताए रोकथाम रणनीति और सामाजिक प्रयासों द्वारा मिलकर हम इस समस्या का समाधान कर सकते हैं और युवाओं को बेहतर जीवन जीने के अवसर प्रदान कर सकते हैं। वास्तव में किसी भी देश के युवा उस देश के सामाजिक.आर्थिक विकास के रीढ़ की हड्डी होते हैं, या दूसरे शब्दों में कहें तो उस देश का राष्ट्रीय धन होते हैं। उनका इस प्रकार आत्महत्या करना देश का बहुत बड़ा नुकसान है। हमें हर हाल में इस आत्मघाती प्रवृत्ति को समूल नष्ट करना होगा और अपने देश की युवा शक्ति को बचाकर उन्हें देश के नवनिर्माण में लगाना होगा।

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-रंजना मिश्रा
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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