सतरंगी सियासत

सतरंगी सियासत

जम्मू-कश्मीर में नई उमर अब्दुल्ला सरकार ने कामकाज संभाल लिया। चुनाव परिणाम के बाद राजनीतिक उठापटक की संभावना थी। सो, उसका पहला संकेत आ गया।

एक और परीक्षा..
तो महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनाव की घोषणा हो गई। चुनाव आयोग ने इससे पहले हरियाणा एवं जम्मू-कश्मीर में चुनाव करवाए। जहां झारखंड में आदिवासियों के अधिकारों एवं संविधान समाप्त कर देने वाला नैरेटिव झीला पड़ता सा लग रहा। तो महाराष्ट्र में एक पूर्व विधायक की हत्या होने के बाद माहौल बदलने के आसार! मतलब अब तक जो मराठा आरक्षण आंदोलन का शोर था। शायद वह धीमा पड़ जाए। हां, इसके साथ ही दो लोकसभा उपचुनाव भी। जिसमें राहुल गांधी द्वारा छोड़ी गई वायनाड सीट भी। वहां से प्रियंका गांधी मैदान में। लेकिन अब बात पहले जैसी नहीं। क्योंकि माकपा पूरी ताकत से मुकाबला करेगी। क्योंकि साल 2026 में केरल में उसे कांग्रेस से लड़ता हुआ भी दिखाना होगा! लेकिन यहां लड़ाई में भाजपा भी होगी। और कोई बड़ी बात नहीं कि त्रिकोणिय संघर्ष में कोई बड़ा उलटफेर हो जाए!

बीच में अमरीका...
तो आखिरकार अमरीका, भारत और कनाडा के बीच तल्खी बढ़ाने में कामयाब रहा। जहां भारत, नई दिल्ली से कनाडाई राजनयिकों के निष्कासन पर मजबूर हुआ। तो उसके पहले कनाडा ने भारतीय राजनयिकों के खिलाफ विषवमन किया। असल में, कनाडा के पीएम जस्टिन ट्रुडो जरुरत से ज्यादा भारत के खिलाफ आक्रामक हो रहे। लेकिन इसमें असली शह अमरीका की। उसी ने कनाडा की सरकार को भारत के खिलाफ उकसाया। जिससे ट्रुडो ने ऐसे बयान दिए कि हालात यहां तक पहुंच गए। हालांकि भारत ट्रुडो को ढीला करने में सफल रहा। लेकिन उन्हें भारत से ज्यादा अमरीका की मदद की दरकार। दोनों देश पड़ोसी भी। जबकि अमरीका भारत के खिलाफ वास्तव में ट्रुडो को उपयोग कर रहा। जो उन्हें शायद बाद में समझ आए। लेकिन फिलहाल तो वह अपनी धरती से अमरीकी हितों को संरक्षण दे रहे। क्योंकि मामला वोट बैंक का।

गुंजाईश छोड़ी!
जम्मू-कश्मीर में नई उमर अब्दुल्ला सरकार ने कामकाज संभाल लिया। चुनाव परिणाम के बाद राजनीतिक उठापटक की संभावना थी। सो, उसका पहला संकेत आ गया। कांग्रेस ने नेशनल कांफ्रेंस के साथ विधानसभा चुनाव तो गठजोड़ करके लड़ लिया। लेकिन कांग्रेस गठबंधन सरकार में शामिल नहीं हुई। कांग्रेस के सभी छह विधायक मुस्लिम समुदाय से। उसमें से एक जम्मू क्षेत्र से और बाकी घाटी से। अभी तो विधायक दल के नेता पर सहमति नहीं बन पाई। ऐसे में संभावना जताई जा रही। आज नहीं तो कल कहीं कांग्रेस विधायकों के एनसी में शामिल न हो जाएं। कांग्रेस हरियाणा की करारी हार से अभी तक उभर नहीं पा रही। सो, कहीं, महाराष्ट्र और झारखंड में भी कोई चूक न हो जाए। इसलिए अभी जम्मू-कश्मीर को छेड़ना ठीक नहीं समझा। हां, यह वह पहली सरकार। जो अनुच्छेद- 370 समाप्ति के बाद गठित हुई।

झलक दिखेगी...
इस साल आम चुनाव- 2024 हो जाने के बाद अक्टूबर में दो राज्यों की जनता ने अपनी राय व्यक्त कर दी। अब महाराष्ट्र और झारखंड की बारी। इसके साथ ही 15 राज्यों में 48 विधानसभा एवं दो लोकसभा सीटों पर भी उपचुनाव होने वाले। इसमें राजस्थान समेत उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार एवं आंध्रप्रदेश जैसे राज्य शामिल। सो, मानो एक सैंपल सर्वे भी राजनीतिक दलों के सामने वाला कि आम चुनाव के बाद देश की जनता अब क्या सोच रही? इसमें भाजपा एवं कांग्रेस की सबसे ज्यादा परीक्षा। क्योंकि लगभग सभी जगह इन दोनों ही दलों की साख दांव पर होगी। बाकी तो क्षेत्रीय दल। वैसे, कहीं भी उपचुनाव में माना जाता कि जनता उसी दल को वोट देती। जिसकी वर्तमान में सरकार। क्योंकि यह निरंतरता का भी प्रतीक। लेकिन यदि कहीं भी उलटफेर हुआ तो मानो खतरे की घंटी!

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मायने क्या होंगे?
राजस्थान में सात विधानसभा सीटों पर भाजपा की भजनलाल सरकार की परीक्षा का समय आ गया। सवाल यह कि सफल रहे तो क्या होगा और हारे तो क्या समीकरण बनेंगे? हालांकि लोकसभा में आशानुरूपप रिणाम नहीं आए। उपचुनाव निपटने तक सरकार का लगभग एक साल भी पूरा हो जाएगा। सो, यह जनता की मुहर भी होगी कि भजनलाल सरकार ने प्रशासन कैसा चलाया। हां, इस दौरान पार्टी संगठन में तालमेल को लेकर कोई बड़ा मामला सामने नहीं आया। फिर प्रदेश भाजपा में फिलहाल संगठन महामंत्री भी नहीं। उपचुनाव में जो प्रत्याशी तय किए गए। उनके नामों से ही लग रहा कि प्रदेश नेतृत्व की बात मानी गई। जो स्वाभाविक कि स्थानीय समीकरणें के लिहाज से दिए गए। हां, एक बात और। इन उपचुनावों के बहाने केवल सीएम एवं प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की ही राजनीतिक प्रतिष्ठा दांव पर? या कुछ और?

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घमासान तय!
मानकर चलिए कि महाराष्ट्र में सत्ताधारी महायुति और विपक्षी एमवीए गठबंधनों के बीच भारी राजनीतिक घमासान होगा। हालांकि पूर्वानुमानों के मुताबिक न तो महायुति से अजित पवार बाहर हुए। और न ही अभी तक एमवीए से उद्धव ठाकरे की शिवसेना। हां, सीट बंटवारे में सिर फुटोवव्ल पूरी हो रही। इसके अलावा छोटे-छोटे दल भी जोर मार रहे। महायुति में राज ठाकरे की संभावनाएं। तो उधर, शेतकारी संगठनों से जुड़े दल। महाराष्ट्र के चुनाव देश की राजनीति के लिए बेहद अहम। क्योंकि मुंबई देश की आर्थिक राजधानी। और फिर इसके बाद कुछ ही समय में मुंबई महानगर पालिका के चुनाव भी होंगे ही। जिसमें उद्धव ठाकरे का सब कुछ दांव पर होगा। जहां अब वह पहले जैसी स्थिति में तो बिल्कुल भी नहीं होंगे। एक संभावना यह भी। चुनाव परिणाम के बाद महायुति और एमवीए में से कुछ दल इधर-उधर होंगे!

-दिल्ली डेस्क
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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