जानें राज काज में क्या है खास
चर्चा में ऑड एण्ड ईवन
सूबे की पॉलिटिक्स में कुछ न कुछ चलता रहता है, चाहे वह अफवाह ही क्यों न हो।
फिर मची हलचल :
सूबे की पॉलिटिक्स में कुछ न कुछ चलता रहता है, चाहे वह अफवाह ही क्यों न हो। अब देखो न, दिल्ली में बढ़ते मुलाकातों के दौर ने फिर हलचल मचा दी है। पहले सेकण्ड मैडम और फिर फर्स्ट मैडम और बाद में मीनेष वंषज बाबा ने मुलाकात क्या कर ली, कई लोगों की नींद उडा दी। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि इन मुलाकातों के बाद सूबे की राजनीति में कुछ तो पक रहा है। अटारी वाले भाई साहब को देख भौंहें चढाने वाले भाई लोगों की दिल्ली की तरफ कुछ ज्यादा ही है। वे तो बॉडी लैंग्वेज तक पर नजर रखे हुए हैं। अब इन भाई लोगों को कौन समझाए कि राजनीति में जो दिखता है, वो होता नहीं है और जो होता है, वो दिखता नहीं है। अब इसको समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है।
चिट्ठी आई है, वतन से :
आलाकमान के नाम लिखी एक चिट्ठी को लेकर इन दिनों भगवा वाले भाई लोगों में घमासान मचा हुआ है। इस चिट्ठी का असर सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वालों के ठिकाने पर दिखाई दे रहा है। चौकड़ी के चेहरों पर भी चिन्ता की लकीरे साफ दिखाई दे रही है। चिट्ठी भी छोटे-मोटे नेता ने नहीं बल्कि दिल्ली की राजनीति में पैठ रखने वाले भाई साहब ने लिखी है। चिट्ठी में वैसे तो कई बातों का जिक्र है, मगर सबसे ज्यादा दमदार लाइन एक ही है, जिसमें सारा निचौड है। उसमें लिखा है कि दिसम्बर तक गांवों की सरकार में राज की उम्मीद करने वाले ही अब बराबर की टक्कर की बातें करने लगे हैं। तीन महीनों में सीटों की कमी की जिम्मेदारी अभी तय कर ली जाए, तो बाद में पोस्टमार्टम की नौबत नहीं आएगी।
चर्चा में ऑड एण्ड ईवन :
गुजरे जमाने में लालकिले की नगरी में काले कोट और खाकी वाले भाई लोगों ने एक-दूसरे पर भाटे बरसाए थे। तब से मफलर वाले केजरीवाल भाई साहब का एक फार्मूला काफी चर्चा में आया था। इन दिनों इस फार्मूले की चर्चा पिंकसिटी में न्याय के बड़े मंदिर के साथ ही पीएचक्यू में भी जोरों पर है। चर्चा भी क्यूं न हो खुद को भगवान के बराबर मानने वाले सफेद कोट वाले भाई साहब ने सलाह ही ऐसी दे डाली। सूबे के सबसे बड़े अस्पताल में बाउंसर लगाने के बाद तीनों रंगों के कोट वाले कढ़ी के साथ कचौरी का जायका ले रहे थे, तभी बड़े डॉक्टर ने सलाह दी कि गुलाबीनगरी में तो खाकी और काले कोट वालों पर ऑड और ईवन का सिस्टम लागू कर देना चाहिए, ताकि हमें मेडिकल रिपोर्ट बनाने में ज्यादा माथा नहीं लगाना पड़े। एक दिन खाकी वाले भाई लोग कुटेंगे, तो दूसरे दिन काले कोट वाले भाई।
एक जुमला यह भी :
सूबे में खाकी वाले साहब लोगों में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि गांधीजी के तीन बंदरों से ताल्लुक रखता है। गुजरे जमाने में यह जुमला खादी वाले भाई लोगों पर सटीक बैठता था, पर अब खाकी वालों पर फिट है। जुमला पीएचक्यू से शुरू होकर सचिवालय के गलियारों तक जा पहुंचा। लंच केबिनों तक में चटकारे लेकर सुनाया जा रहा है। हमें स्टेच्यू सर्किल पर खाकी वाले साहब ने सुनाया। जुमला है कि खाकी में इन दिनों न कोई किसी की सुनता है, न कोई देखता है और नहीं कोई बोलता है। वही करते हैं, जो हाई ऑथोरिटी से ऑर्डर होता है। यानी कि खाकी वाले इन दिनों गूंगे, बहरे और अंधे के समान हैं।
-एल. एल. शर्मा
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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