दो देशों के मध्य संवाद का आधार है अनुवादक

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस 

दो देशों के मध्य संवाद का आधार है अनुवादक

एक देश में भी अनेक भाषाएं, बोलियां, लिपियां और इन भाषाओं, बोलियों व लिपियों में भी क्षेत्रवार अंतर होता है।

यदि अंतर्राष्ट्रीय विकास, प्रगति, शांति, सहयोग और सुरक्षा में अनुवादकों की भूमिका पर गंभीरतापूर्वक विचार हो, तो ज्ञात होता है कि दो या दो से अधिक देशों के मध्य उनकी अलग-अलग भाषा होने के बाद भी अनुवादक उनके मध्य सफल संवाद का बड़ा आधार बनता है। यदि अनुवादक दो देशों के मध्य सफल संवाद की कड़ी बनता है, तो इसके लिए उसकी भाषा संबंधी बहुमुखी प्रतिभा प्रशंसनीय है। यह स्वाभाविक है कि दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति समुचित और सफल संवाद केवल अपनी मातृभाषा में ही कर सकता है। दुनिया में अनेक देश हैं। एक देश में भी अनेक भाषाएं, बोलियां, लिपियां और इन भाषाओं, बोलियों व लिपियों में भी क्षेत्रवार अंतर होता है। ऐसे में भाषा अनुवादकों के सम्मुख न केवल अपनी मातृभाषाओं, राजभाषाओं की विभिन्न उप-भाषाओं व बोलियों को सीखने, समझने की चुनौती होती है, बल्कि उन्हें दूसरे देशों की राजभाषा, मातृभाषा और उनकी उप-भाषा व बोली का शिक्षण-प्रशिक्षण लेने की आवश्यकता भी होती है। दो विपरीत भाषी देशों के मध्य होनेवाले परस्पर कार्यक्रमों में जो पारस्परिक संवाद होता है, वह तब ही सफल होगा जब अनुवादकों द्वारा दोनों देशों के प्रतिनिधियों को उनकी अपनी-अपनी भाषा में संवाद का सार बताया जाएगा।

अनुवादकों की भूमिका :

एक प्रकार से अनुवादकों के कंधों पर वैश्विक गतिविधियों के संतुलित, समुचित व कल्याणकारी संचालन का प्राथमिक दायित्व है। यदि दो राष्ट्रों के मध्य उनके विपरीत भाषी होने के कारण, किसी कार्यक्रम को लेकर स्पष्ट, समझने योग्य और विस्तृत बात नहीं हो पाती है, तो इस कारण कार्यक्रम निरस्त हो जाते हैं। यहां अनुवादकों की भूमिका का अत्यंत महत्व है। वे अपने अनुवाद-कौशल से दोनों देशों के प्रतिनिधियों को उनके विचारों का सरलतम अनुवाद उपलब्ध करा सकते हैं। जब ऐसा होता है, तो राष्ट्रों के मध्य बड़े-बड़े व्यावसायिक,व्यापारिक और प्रौद्योगिकीय अनुबंध संपन्न होते हैं। अनुवादकों द्वारा विपरीत भाषी के मध्य सहज संवाद का माध्यम बनने से अनेक अंतर्राष्ट्रीय विकास परियोजनाएं, जन-कल्याणकारी कार्यक्रम और समाजोपयोगी कार्य सरलतापूर्वक संपन्न होते हैं। वैश्विक ग्राम में परिवर्तित विश्व की प्रमुख संस्थाएं, जैसे संयुक्त राष्ट्र, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन, एशियाई विकास बैंक जैसे अनेक अंतर्राष्ट्रीय संस्थान अलग-अलग देशों के लिए जो कार्य करते हैं,उन कार्यों से संबंधी विभिन्न भाषाओं की रिपोर्टों का आदान-प्रदान अनुवाद कार्य के कारण ही हो पाता है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस :

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हालांकि गूगल द्वारा प्रबंधित अनुवाद एप्लिकेशंस कुछ सरल भाष्य-सामग्रियों का अनुवाद तो करती हैं, किंतु यह पूर्ण और उचित अनुवाद नहीं होता। इसी प्रकार डेढ़-दो वर्ष पूर्व आरंभ हुए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की सहायता द्वारा भाषाओं की विषय-सामग्रियों के अनुवाद में थोड़ा अधिक सुधार अवश्य हुआ है, किंतु एक भाषा को अन्य भाषा में अनुवाद करने की कला किसी भी स्तर पर केवल और केवल मशीन द्वारा सर्वोत्तम नहीं हो सकती। वास्तव में, स्रोत भाषा से लक्ष्य भाषा में अनुवाद का कार्य केवल अनुवाद-कार्य नहीं है। जब किसी देश व उसकी संस्कृति और उसके समाज, रहन-सहन, वेशभूषा, बोली, साहित्य, खानपान, प्राचीन व नवीन दिनचर्या एवं जीवनचर्या का संदर्भ सम्मुख होता है, तो उसकी भाषा में प्रस्तुत किसी भी विषयवस्तु को अन्य देश की भाषा में अनुवाद करना, केवल अनुवाद कार्य के अधीन नहीं होता। तब अनुवाद रचनात्मक लेखन बन जाता है। तब अनुवाद कार्य साहित्यिक और सांस्कृतिक लेखनकर्म बन जाता है। इसीलिए कम्प्यूटर पर संचालित गूगल हो अथवा एआई, ये दो भाषाओं के मध्य शुष्क, व्यावसायिक और कामचलाऊ अनुवाद तो कर सकते हैं, किंतु अनुवाद के रचनात्मक पक्ष के आधार पर पूर्ण होनेवाला अनुवाद कार्य नहीं कर सकते।

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राष्ट्रीय स्तर पर :

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आज योग्य अनुवादकों की अत्यंत कमी महसूस की जा रही है। यदि भारत के संदर्भ में अनुवादकों की भूमिका पर विचार किया जाए, तो पता चलता है कि देश में अंग्रेजी और हिन्दी ही नहीं अपितु गुजराती, मराठी, पंजाबी, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, उड़िया व पूर्वोत्तर भारतीय राज्यों की भाषा-बोली के पत्राचार में अनुवादकों की बड़ी मांग है, लेकिन चूंकि भारत में दशकों से अंग्रेजी ही राजकाज की भाषा बनी रही, इसलिए यहां हिन्दी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के जानकार अनुवादकों के लिए वह स्रोत भाषा ही बन गई है और उनकी अपनी राजभाषा व मातृभाषा लक्ष्य भाषा। वास्तव में अनुवाद इतना सीधा व सरल नहीं होता। भाषा अनुवादक को भाषाओं से संबंधित ही नहीं, अपितु अन्य अनेक क्षेत्रों के विविध कार्यों का व्यावहारिक व काल्पिनक अनुभव और गूढ़ ज्ञान भी होना चाहिए। भाषा अनुवादक के पास अध्ययन, चिंतन-मनन, पठन-पाठन और लेखन-सृजन के संबंध में जितना अधिक अनुभव होगा, उसका अनुवाद कार्य भी उतना ही सरल और स्पष्ट होगा। एक सफल अनुवादक बनने के लिए ज्ञान की विभिन्न शाखाओं के संबंध में स्वाध्ययन की सर्वाधिक भूमिका है। अनुवादक के पास शब्दों और वाक्यों को विभिन्न सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और प्राकृतिक संदर्भों में विश्लेषित करने की योग्यता अवश्य होनी चाहिए। सर्वोत्तम अनुवाद के लिए स्रोत और लक्ष्य भाषा की अधिकतम जानकारी तो आवश्यक है ही। इसके अतिरिक्त भाषा संबंधी व्याकरण और भाषा के सामान्य सामाजिक व आधिकारिक उपयोग का ज्ञान भी होना चाहिए।

-विकेश कुमार बडोला
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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