चबाते-चबाते प्लास्टिक निगल रहे हैं हम!

भारत में च्युइंग गम का क्रेज तेजी से बढ़ रहा 

चबाते-चबाते प्लास्टिक निगल रहे हैं हम!

सुपरमार्केट से लेकर सड़क किनारे की छोटी दुकानों तक, रंग-बिरंगे पैकेट्स में सजी यह छोटी-सी चीज हर किसी को अपनी ओर खींच रही है।

भारत में च्युइंग गम का क्रेज तेजी से बढ़ रहा है। बच्चों से लेकर युवा और बुजुर्ग तक, हर कोई इसे चबाने में मशगूल है। सुपरमार्केट से लेकर सड़क किनारे की छोटी दुकानों तक, रंग-बिरंगे पैकेट्स में सजी यह छोटी-सी चीज हर किसी को अपनी ओर खींच रही है। कोई इसे तनाव दूर करने के लिए चबाता है, कोई मुंह की ताजगी के लिए, तो कोई बस आदतन इसका इस्तेमाल करता है। भारत में इसकी लोकप्रियता का कारण इसकी सस्ती कीमत, आसान उपलब्धता और शहरी जीवन की भागदौड़ में तुरंत राहत का वादा है। टीवी विज्ञापन इसे कूल और ट्रेंडी बनाकर पेश करते हैं, जिससे युवा इसे स्टाइल का हिस्सा मानने लगे हैं, लेकिन इस मासूम-सी दिखने वाली चीज के पीछे चौंकाने वाला सच छिपा है, जिसे हाल ही में सैन डिएगो में अमेरिकन केमिकल सोसाइटी की मीटिंग में पेश की गई एक स्टडी ने उजागर किया। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, लॉस एंजिल्स के शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन में च्युइंग गम के प्रभाव को गहराई से जांचा। नतीजे हैरान करने वाले थे। एक ग्राम च्युइंग गम में औसतन 100 माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए और कुछ में तो यह संख्या 600 से भी ज्यादा थी। एक औसत च्युइंग गम स्टिक का वजन करीब 1.5 ग्राम होता है। अगर इसे नियमित रूप से चबाया जाए, तो हर साल लगभग 30,000 माइक्रोप्लास्टिक कण हमारे शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। यह आंकड़ा सोचने पर मजबूर करता है कि हम अनजाने में अपनी सेहत के साथ क्या कर रहे हैं। 

माइक्रोप्लास्टिक 5 मिलीमीटर से छोटे प्लास्टिक के सूक्ष्म कण होते हैं, जो आज पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बन चुके हैं। च्युइंग गम में यह कहां से आता है, इसका जवाब है गम बेस, जो इसे चबाने योग्य और लचीला बनाता है। गम बेस में पॉलीविनाइल एसीटेट और पॉलीइथाइलीन जैसे सिंथेटिक प्लास्टिक यौगिक होते हैं, जिनका इस्तेमाल प्लास्टिक की बोतलों और पैकेजिंग में भी होता है। जब हम गम चबाते हैं, तो ये यौगिक छोटे-छोटे कणों में टूट जाते हैं, लार के साथ मिलते हैं और पाचन तंत्र में पहुंच जाते हैं। यह सिर्फ मुंह तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शरीर के दूसरे हिस्सों तक फैल सकता है। इन माइक्रोप्लास्टिक कणों का सेहत पर गंभीर असर पड़ सकता है। ये पाचन तंत्र में सूजन और गैस्ट्रिक समस्याएं पैदा कर सकते हैं। शरीर के एंडोक्राइन सिस्टम को प्रभावित कर हार्मोन असंतुलन का कारण बन सकते हैं। टॉक्सिन्स को बढ़ाकर मोटापा और मेटाबॉलिक बीमारियों का जोखिम बढ़ा सकते हैं। कुछ शोध यह भी संकेत देते हैं कि ये कण रक्तप्रवाह में मिलकर मस्तिष्क और हृदय के कार्यों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसके अलावा, च्युइंग गम में मौजूद कृत्रिम मिठास और प्रिजर्वेटिव्स भी लंबे समय तक इस्तेमाल से नुकसानदेह हो सकते हैं। ज्यादा चबाने से जबड़े में दर्द और सिरदर्द जैसी समस्याएं भी आम हैं। 

भारत में स्थिति और चिंताजनक है, क्योंकि यहां इसके नुकसानों को लेकर जागरूकता बेहद कम है। सरकार ने भी इस पर कोई सख्त कदम नहीं उठाया है। ग्रामीण इलाकों में तो लोग इसके खतरों से पूरी तरह अनजान हैं। शहरी युवा इसे फैशन मानते हैं, बच्चे इसे खिलौने की तरह इस्तेमाल करते हैं और व्यस्त प्रोफेशनल्स इसे तनाव कम करने का शॉर्टकट समझते हैं। लेकिन इसकी कीमत हमारी सेहत को चुकानी पड़ रही है। पर्यावरण पर भी इसका असर कम खतरनाक नहीं है। चबाने के बाद लोग इसे सड़कों और सार्वजनिक जगहों पर थूक देते हैं। प्लास्टिक होने की वजह से यह आसानी से विघटित नहीं होता, जिससे कचरे की समस्या बढ़ती है। जानवर इसे निगलकर बीमार पड़ सकते हैं। भारत जैसे देश में जहां कचरा प्रबंधन पहले ही चुनौती है, यह एक और बोझ बन रहा है। क्या इसका कोई विकल्प है पूरी तरह छोड़ना मुश्किल हो सकता है, लेकिन सावधानी और समझदारी से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। कुछ कंपनियां अब प्राकृतिक राल से बने च्युइंग गम बना रही हैं, जिनमें प्लास्टिक नहीं होता। 

भारत में पारंपरिक रूप से सुपारी, इलायची या लौंग चबाने की आदत रही है, जो सेहत के लिए बेहतर है। इसे रोज की आदत बनाने के बजाय कभी-कभार इस्तेमाल करना चाहिए। बच्चों और युवाओं को इसके जोखिमों के बारे में बताना जरूरी है। सरकार को चाहिए कि च्युइंग गम के पैकेट्स पर इसके घटकों और खतरों की जानकारी देना अनिवार्य करे। च्युइंग गम का बढ़ता चलन एक ओर आधुनिकता का प्रतीक है, तो दूसरी ओर यह हमारी सेहत और पर्यावरण के लिए चेतावनी है। यह समय है कि हम इसकी चमक-दमक से बाहर निकलें और इसके असल प्रभावों पर नजर डालें। अगली बार जब आप इसे चबाने के लिए हाथ बढ़ाएं, तो सोचें क्या यह छोटी-सी आदत लंबे समय में बड़ा नुकसान तो नहीं पहुंचा रही है, जागरूकता और संयम ही इस क्रेज को संतुलित करने का रास्ता है।

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-देवेन्द्रराज सुथार
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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