'इंडिया गेट'

जानें इंडिया गेट में आज है खास...

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पर्दे के पीछे की खबरें जो जानना चाहते है आप....

अभी नहीं तो...
तो कांग्रेस मान चुकी। साल 2024 का आम चुनाव उसके लिए जीवन मरण का। सो, उदयपुर में लिए गए फैसलों पर तेजी से आगे बढ़ रही। इसके लिए दिल्ली में ताबडतोड बैठकें हुईं। प्रियंका गांधी ने भी मौजूदगी दर्ज करवाई। अब तो पार्टी नेता भी कहने लग गए। अभी नहीं तो कभी नहीं। उदयपुर में तय किए गए रोडमैप से पीछे हटे तो मानो खत्म हो जाएंगे। आगे के रास्ते खत्म हो जाएंगे। वैसे भी पार्टी के लिए इन दिनों सिर मुंडाते ही ओले पड़ने जैसे हालात। चिंतन शिविर के दौरान ही जहां सुनील जाखड़ ने पार्टी को बाय-बाय कहा। जले पर नमक छिड़कने वाली बात तो यह कि वह भाजपा में शामिल हो गए। फिर गुजरात में चुनाव आ रहे। वहां के कार्यकारी अध्यक्ष हार्दिक पटेल भी कांग्रेस छोड़ गए। उसी दिन शाम होते-होते डूंगरपुर से पार्टी विधायक गणेश गोगरा ने भी विधायक पद छोड़ा। मतलब कोढ़ में खाज जैसे हालात। अभी शिविर खत्म हुए एक हफ्ता ही बीता। फिर यह सब क्या?


नजरें इनायत... !
आजकल भाजपा और कांग्रेस की मरुभूमि पर नजरें इनायत हो रहीं। जहां कांग्रेस ने उदयुपर में चिंतन शिविर किया। तो भाजपा ने भी राष्ट्रीय पदाधिकारियों की तीन दिनी बैठक कर डाली। अब दोनों ही दलों में आरोप प्रत्यारोप भी। सीएम गहलोत बोले, यह सब उदयपुर के जवाब में। भाजपा ने कहा, यह महज संयोग। योजना बहुत पहले ही बन गई थी। फिर आखिर ऐसी क्या बात जो राजस्थान पर कांग्रेस-भाजपा पर इतना फोकस। असल में, दोनों ही दलों में गुटबजी और मतभेद का आलम सार्वजनिक। कांग्रेस में गहलोत एवं पायलट की अदावत जगजाहिर। तो इधर, वसुंधरा राजे और सतीश पूनिया के बीच रस्साकशी के खेल की खबरें। सीएम अशोक गहलोत ने उदयपुर में सफल बैठक का आयोजन करवाकर खुद को साबित करने की कोशिश की। तो भाजपा की बैठक भी शांतिपूर्ण संपन्न हो गई। अब गुजरात के विधानसभा चुनाव की प्रतिक्षा। जैसे यूपी, वैसे ही गुजरात के नतीजे पर बहुत कुछ निर्भर। खासकर भाजपा, राजस्थान को लेकर बड़ा फैसला लेने जा रही।


हम पर ही बरस पड़े...
तो पूर्व सीएम वसुंधरा राजे का दर्द बाहर आ गया और वह छलक ही पड़ा। उन्होंने इसके लिए दिग्गज नेता भैंरांसिंह शेखावत से संबंधित एक कार्यक्रम को चुना। शायरना अंदाज में उन्होंने अल्फाज जाहिर किए। कहा, जिनको सांसें दी, उनकी जुबां खुली तो हम पर ही बरस पड़े। मतलब सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। लेकिन कहां? पार्टी के भीतर या संगठन के कामकाज के स्तर पर? या फिर इससे भी इतर कोई और बात? राजे गुट की लगातार मांग कर रहा। अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले राजे को सीएम चेहरा बनाया जाए। लेकिन पार्टी नेतृत्व ने स्पष्ट कर दिया। कमल का फूल और पीएम मोदी का चेहरा ही काफी। लेकिन अभी भी अंतिम फैसला होना बाकी। तब तक चीजें ठहरी हुईं। जो दावेदार। वह भी इंतजार कर रहे। लेकिन राजे गुट इसके मूड में नहीं। क्योंकि फिर चुनावी तैयारियों का समय कम बचेगा। लेकिन यह तो नेतृत्व भी सोच रहा होगा। फिर फैसला कहां अटका हुआ?


नकल या रोडमैप?
कांग्रेस भी अब जमीनी स्तर पर वही करने का प्रयास कर रही। जो बरसों से भाजपा करती रही। वैसे भी भाजपा ने बूथ पर काम करके कांग्रेस को भी सोचने को मजबूर किया। अब कांग्रेस में भी पूर्णकालीन कायकर्ता का फंडा। करीब 6500 पार्टी कार्यकतार्ओं की देशभर में नियुक्ति का संकल्प। यह लोग जमीन पर बिल्कुल वैसे ही काम करेंगे। जैसे भाजपा में ग्रास रूट का कार्यकर्ता करता है। योजना के अनुसार यह होल टाइम वर्कर लोकसभा एवं विधानसभावार काम करेंगे।यह लोग अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को किनारे रखेंगे। किसी को टिकट देने की पैरवी भी नहीं करेंगे। क्षेत्र के मंदिरों एवं पुजारियों, पान, नाई एवं चाय की दुकान की सूचियां बनाएगें। क्षेत्र में सामाजिक समीकरणों का बारीकी से अध्ययन करेंगे। लेकिन इतनी जमीनी बातें क्या कांग्रेस में संभव? क्या पार्टी इन सब फैसलों को जमीन पर उतार पाएगी? क्या कांग्रेस में कार्यकतार्ओं एवं नेताओं की वैचारिक ट्रेनिंग का तौर तरीका ऐसा ही? क्या इसके लिए वह तैयार रहते हैं? यह सब कौन देखेगा?


सतह पर हलचल!
बिहार में भाजपा-जदयू गठबंधन की राजनीतिक हलचल सतह पर। केन्द्रीय मंत्री आरसीपी सिंह को नितिश कुमार ने राज्यसभा के लिए नामित नहीं किया। बल्कि उन्होंने जार्ज फर्नाडिस के लंबे समय तक सहयोगी रहे अनिल हेगड़े को आगे किया। इससे कई तरह के कयास। फिर आरसीपी सिंह मंत्री कैसे रहेंगे? असल में, आरसीपी सिंह के बजाए लल्लन सिंह को ही जदयू कोटे से मंत्री बनना था। लेकिन मौका आरसीपी सिंह पा गए। बाद में आरसीपी भाजपा नेतृत्व के करीब चले गए। वहीं, लल्लन सिंह ने पार्टी अध्यक्ष के नाते आरसीपी को अलग थलग करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। कहा तो यहां तक जा रहा। नितिश को लाइन पर लाने के लिए भाजपा आरसीपी को प्रवोक कर रही। ताकि जदयू में झगड़े का लाभ भाजपा उठा सके। हालांकि भाजपा अपनी ओर से नितिश को छोड़ने के मूड में नहीं। जबकि नितिश इस बार भाजपा के मुकाबले विधायकों का संख्या बल कम होने से सहज नहीं। अब राज्यसभा चुनाव के बहाने ही हलचल।


काशी के बहाने ...
यूपी एक बार फिर चर्चा में। बिल्कुल अयोध्या की तर्ज पर। बाबा काशी विश्वनाथ मंदिर का विवाद सुप्रीम कोर्ट होते हुए निचली अदालत में पहुंच गया। इससे पहले मंदिर परिसर में हुुए सर्वे के बाद वहां बाबा के मिलने का दावा। तो दूसरा पक्ष इसे खारिज कर रहा। अब इसे लेकर बयानबाजी, दावे-प्रतिदावे और विवाद की स्थिति। साथ में, तर्क और कुतर्क भी। इसी चक्कर में एक डीयू के पढ़े लिखे महाशय लपेटे में आ गए। यूपी में विधानसभा चुनाव निपट चुके। हां, अगले ही साल से लोकसभा चुनाव। चूंकि यूपी देश का सबसे बड़ा सूबा। जहां 80 लोकसभा सीटें। स्वाभाविक है कि यहां भाजपा का फोकस रहेगा। भाजपा का लक्ष्य 75 पार का। तो सपा के भी इस बार लगभग दो गुने से ज्यादा विधायक। ऐसे में कड़ी टक्कर की नौबत तो रहेगी। लेकिन इन सबमें बाबा विश्वनाथ बीच में कहां? इसी बीच, अब तो मथुरा की भी चर्चा। अलग-अलग विषयों को लेकर कई लोग कोर्ट की शरण में जा रहे।
-दिल्ली डेस्क

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