आधी आबादी दे रही जीवन रक्षा में पूरा सहयोग

राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस विशेष,कोटा में 20 फीसदी महिलाएं कर रही रक्तदान, कोई पति से तो कोई पिता से प्रेरित हो कर रही रक्तदान

आधी आबादी दे रही जीवन रक्षा में पूरा सहयोग

शहर में एक दो नहीं हजारों की संख्या में महिलाएं हैं जो समय-समय पर रक्तदान व एसडीपी डोनेट कर लोगों का जीवन बचाने का महत्वपूर्ण काम कर रही हैं। राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस पर महिलाओं के इस योगदान को समर्पित विशेष समाचार दिया जा रहा है।

कोटा । एक नारी सब पर भारी। महिलाओं ने इस कहावत को सही साबित भी करके दिखाया है। महिलाएं अब न केवल घर गृहस्थी संभाल रही हैं वरन् नौकरी पेशा भी हो गई है। अब तो उससे भी आगे बढ़कर देश की आधा आबादी कहलाने वाली महिलाएं लोगों का जीवन बचाने में भी आगे आने लगी है। यह जीवन अपने शरीर का रक्त देकर बचा रही हैं। कोटा में होने वाले रक्तदान में करीब 20 फीसदी महिलाएं रक्तदान कर रही हैं। पहले जहां पुरुष ही रक्तदान करते थे। महिलाओं में रक्तदान के प्रति जागरूकता की कमी थी। महिलाएं रक्तदान करने से बचती थी। रक्तदान करने से कमजोरी आने समेत कई तरह की भ्रांतियों की शिकार होने के कारण महिलाएं रक्तदान न के बराबर करती थी। लेकिन कुछ महिलाओं ने पहल की और उसमें कामजाब भी हुई। उसके बाद उन्होंने दूसरी महिलाओं को जागरूक किया। शुरुआत में यह संख्या कम थी। लेकिन धीरे-धीरे जागरूकता बढ़ने के साथ ही महिलाओं में रक्तदान के प्रति उत्साह व जोश भी बढ़ने लगा। उसी का परिणाम है कि कोटा में जहां हर साल 80 से 90 हजार यूनिट रक्तदान हो रहा है। उसमें करीब 20 फीसदी रक्तदान महिलाएं कर रही हैं। महिलाओं को रक्तदान की प्रेरणा किसी बाहरी व्यक्ति से मिलीे हो ऐसा नहीं है। अधिकतर महिलाओं को अपने घर और परिवार से ही रक्तदान की प्रेरणा मिली। किसी को पति से तो किसी को पिता से ऐसी प्रेरणा मिली कि एक बार रक्तदान करने के बाद महिलाओं को लगा कि उनके द्वारा दिए गए रक्त से लोगों का जीवन बच रहा है तो उनका उत्साह बढ़ता गया। उसी का परिणाम है कि कोटा स्वैच्छिक रक्तदान में प्रदेश में अग्रणी भूमिका में है। शहर में एक दो नहीं हजारों की संख्या में महिलाएं हैं जो समय-समय पर रक्तदान व एसडीपी डोनेट कर लोगों का जीवन बचाने का महत्वपूर्ण काम कर रही हैं। राष्ट्रीय स्वैच्छिक रक्तदान दिवस पर महिलाओं के इस योगदान को समर्पित विशेष समाचार दिया जा रहा है। 

नोएड़ा की कोचिंग छात्रा ने की एसडीपी डोनेट
नोएड़ा निवासी 18 वर्षीय मोना चौधरी यहां रहकर नीट की तैयारी कर रही है। उसने परिवार में माता पिता को रक्तदान करते हुए देखा था। लेकिन उस समय उसकी उम्र नहीं होने से वह रक्तदान नहीं कर सकती थी। लेकिन कोटा में पढ़ाई के दौरान जब उसने रक्तदान की उम्र को पार किया तो उसने इसी साल जनवरी में पहली बार रक्तदान  किया। मोना ने बताया कि उसकी इच्छा थी कि वह भी लोगों का जीवन बचाने के लिए रक्तदान करे। एक बार रक्तदान करने के बाद जब उसे अच्छा लगा और कोई परेशानी नहीं हुई तो उसने दूसरी बार में एसडीपी डोनेट किया। 

जीवन बचाने में मिलता है आनंद
सीमलिया निवासी कमलजीत कौर ने शादी के बाद अपने पति गुरप्रीत कौर को रक्तदान करते हुए देखा। उनसे प्रेरित होकर उन्होंने पहली बार रक्तदान किया तो उस समझ थोड़ी झिझक हुई थी। लेकिन रक्तदान के बाद जब कोई परेशानी नहीं हुई तो घर परिवार को संभालने के साथ ही  समय-समय पर रक्तदान करती रही। वे अब तक 12 बार रक्तदान कर चुकी हैं। कमलजीत कौर ने बताया कि उन्हें रक्तदान करने से अधिक लोगों का जीवन बचाने में आनंद आ रहा है। 

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पिता को दिया था पहली बार रक्त
अनंतपुरा निवासी सुमन साहू ने सबसे पहले अपने पिता को रक्त दिया था। उन्होंने बताया कि उनके पिता का रक्त ग्रुप एबी नेगेटिव है। उनकी तबीयत खराब होने पर जब उन्हें इस ग्रुप के रक्त की जरूरत पड़ी तो वह नहीं मिला। उस समय उन्होंने अपने रक्त की जांच करवाई तो उनका ग्रुप भी   एबी नेगेटिव निकला। इस पर उन्होंने पहली बार अपने पिता को रक्त  दिया था। उसके बाद जब भी इस ग्रुप की जरूरत लोगों को पड़ी उस समय उन्होंने रक्तदान किया। वे अब तक 7 बार रक्तदान कर चुकी हैं। 

पति से मिली प्रेरणा
शास्त्री नगर दादाबाड़ी निवासी भूमिका गुप्ता ने बताया कि उन्होंने पहली बार प्रथम वर्ष में अध्ययन के दौरान कॉलेज में आयोजित शिविर में रक्तदान किया था।  उसके बाद पति दीपक गुप्ता से प्रेरित होकर लगातार जरूरतमंदों का जीवन बचाने के लिए रक्तदान कर रही हैं। यहां तक कि अपने ससुर की स्मृति में हर साल नियमित रक्तदान कर रही हैं। साथ ही अन्य महिलाओं को भी इसके लिए प्रेरित कर रही हैं। भूमिका ने बताया कि रक्तदान के प्रति महिलाओं में जागरूकता बढ़ने से अब वे भी रक्तदान करने आगे आने लगी हैं। वे स्वयं अब तक 16 बार रक्तदान कर चुकी हैं। 

पहले और अब में आया काफी अंतर
तलवंडी निवासी पुष्पांजलि विजय ने बताया कि 1990 के आसपास प्रोफेशनल डोनर्स होते थे, कोई भी रक्त देने से पहले कई बार सोचता था। सुविधाओं के साथ जागरुकता का अभाव था।   लेकिन अब लोगों के मन से डर निकल गया है। ग्रामीण क्षेत्र में भले ही जागरुकता की कमी है, लेकिन शहरी क्षेत्र में युवाओं व महिलाओं में जागकता बढ़ी है। यही कारण है कि राजस्थान में स्वैच्छिक रक्तदान के क्षेत्र में कोटा अपनी अलग पहचान रखता है।

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