अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष 3 : सर्जरी से पोस्टमार्टम तक कर रहीं बेटियां, मर्डर मिस्ट्री खोल दिलाया इंसाफ

कोटा में पहली बार फोरेंसिक मेडिसिन और ऑर्थोपेडिक में महिला रेजीडेंट

अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष 3 : सर्जरी से पोस्टमार्टम तक कर रहीं बेटियां, मर्डर मिस्ट्री खोल दिलाया इंसाफ

बरसों से पुरूषों का प्रोफेशनल माने जाने वाले चिकित्सा क्षेत्रों में महिलाएं अपना जौहर दिखा रही हैं।

कोटा। मुर्दाघर, जिसका नाम सुनते ही रूह कांप उठती है। जहां चीखने-चिल्लाने और बिलखने की दर्दभरी आवाजें जब मोर्चरी के सन्नाटे को चीरती कानों से गुजरती है तो मन विचलित कर जाती है। घटना-दुर्घटना में अपनों को खोने का दर्द और मातम का विलाप आत्मा झकझौर देता है। वहीं, हादसों में कटे-फटे अंग-भंग हुए शरीर के टुकड़े देखना हर किसी के बस की बात नहीं है। लेकिन, ऐसे चुनौतियों से भरे क्षेत्र में नारी शक्ति अदम्य साहस के साथ डटी है, जो न केवल अपना फर्ज निभा रहीं बल्कि गमजदा पीड़ित परिवार को इंसाफ भी दिला रही है। दरअसल, बरसों से पुरूषों का प्रोफेशनल माने जाने वाले चिकित्सा क्षेत्रों में महिलाएं अपना जौहर दिखा रही हैं। कोटा में पहली बार मेडिकल कॉलेज के फोरेंसिक मेडिसीन टॉक्सोक्लॉजी डिपार्टमेंट में 4 महिला रेजीडेंट ने पीजी में प्रवेश लिया है। अब तक 200 से ज्यादा पोस्टमार्टम कर चुकीं हैं। साक्ष्यों के परीक्षण के आधार पर मडर मिस्ट्री सुलझाने में पुलिस की मदद कर रहीं हैं। वहीं, 22 साल में पहली बार ऑथोपेडिक विभाग में भी महिला रेजीडेंट ने पीजी में दाखिला लिया है।  

पहली बार पोस्टमार्टम देखा तो रो पड़ी थी
पीजी तृतीय वर्ष की छात्रा डॉ. मोनिशा राजेश्वरन बतातीं हैं, तमिलनाडू मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस किया। इंटर्नशिप के लिए हॉस्पिटल जाते तो देखते थे कि आधे से ज्यादा केसों में महिलाएं विक्टिम होती हैं, जिन्हें मेडिकल मुआयने के लिए शरीर पर आई चोट डॉक्टर को दिखानी होती हैं लेकिन महिला डॉक्टर नहीं होने से वे असहज महसूस करतीं हैं। यह देख मैंने फोरेंसिक मेडिसीन टॉक्सोक्लॉजी में आने का ठान लिया। ताऊजी ने यह कहते हुए रोका था कि यह क्षेत्र चुनौतियों से भरा है। राजनेतिक प्रेशर आएंगे, तुम से नहीं होगा लेकिन मैं अपने निर्णय पर अड़िग थी। यूजी सैंकड ईयर में पहली बार पोस्टमार्टम करते हुए देखा तो रो पड़ी थी। लेकिन जब प्रोफेसर ने इसका महत्व समझाया तो खुद को मजबूत किया। हाल ही में बीकानेर के एसपी मेडिकल कॉलेज में हुई क्रॉन्फ्रेंस में मोनिशा ने नाबालिग किशोरियों की शादी व गर्भवती होने से उत्पन्न कानूनी समस्याओं पर शोध पत्र प्रस्तुत किया था, जिसे सर्वेश्रेष्ठ शोधपत्र का पुरस्कार दिया गया। वे अब तक 70 से ज्यादा पोस्टमार्टम कर चुकीं हैं। मुनीषा डॉक्टर होने के साथ मां भी है। परिवार और काम में परिवार व पति के सहयोग से बैलेंस कर फर्ज निभा रहे हैं। 

मदद करने का जूनून ही मुझे इस फील्ड में लाया
पीजी सैकंड ईयर की छात्रा डॉ. पारस रावल कहतीं हैं, राजकोट गुजरात से एमबीबीएस किया। मैं हमेशा से ही प्राइवेट प्रैक्टिस नहीं करना चाहती थी, लोगों को न्याय दिलाने में मदद करने का जूनून ही मुझे इस फिल्ड में लेकर आया। ऐसा मिथक बन गया है कि फोरेंसिक मेडिसीन टॉक्सोक्लॉजी में पुरूष ही काम कर सकते हैं, क्योंकि, इसमें पुलिस, कोर्ट तथा हर तरह के लोगों से डील करनी होती है लेकिन महिला ने इस सोच को गलत साबित कर दिया है। महिला हर चैलेंजिंग काम कर सकती हैं और कर रहीं हैं। डॉक्टरी के पेशे में यह सबसे न्यायसंगत पेशा है। अपने फैसले पर कभी संदेह न करें क्योंकि जहां संदेह किया वहां कोई और सदस्य आपका निर्णय बदल सकता है। मेरा छोटा भाई रेडिएशन ऑन्कोलॉजी में डॉक्टर है। मेरी काबीलियत देख उसने फोरेंसिक मेडिसीन लेने के लिए आत्मविश्वास बढ़ाया। परिवार ने भी काफी सपोर्ट किया। पारस ने अब तक 60 से ज्यादा पोस्टमार्टम कर चुकी हैं। 

बॉडी खुद अपनी कहानी  बताती है
पीजी द्वितीय वर्ष की छात्रा डॉ. काव्या शर्मा कहतीं हैं, बचपन से ही चैलेंजिंग काम करना पसंद था। वर्ष 2015 में कोटा मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस किया। फोरेंसिक मेडिसीन टॉक्सोक्लॉजी  में भी पीजी यहीं से कर रही हूं। यह न्याय संगत क्षेत्र है। पोस्टमार्टम में जब ऐसा सुराग निकाल लेते हैं, जो पीड़ित परिवार को न्याय दिला सके, तब दिल को सुकून मिलता है। मृत शरीर खुद अपनी कहानी बयां करता है कि उसके साथ क्या घटित हुआ, बस समझने वाला होना चाहिए। हाल ही में नहर में एक महिला की लाश मिली थी। जिसे आत्महत्या का रूप दिया गया था। हमने पोस्टमार्टम किया तो कई ऐसे सुराग मिले जिससे यह पता चला कि महिला की मौत पानी में डूबने से नहीं, सिर पर चोट से हुई। हमारी रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने इंवेस्टिगेशन किया तो मडर मिस्ट्री खुली और पति ही कातिल निकला। पहले मां ने इस क्षेत्र में आने का विरोध किया लेकिन मेरा काम देख 90 वर्षीय दादी, पिता और मां अब मुझ पर गर्व करती हैं। काव्या अब तक 60 पोस्टमार्टम कर चुकी हैं। 

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न्याय दिलाना ही जिंदगी का मकसद
पीजी फर्स्ट ईयर की छात्रा डॉ. अदिती गुप्ता कहती हैं, भोपाल में एमबीबीएस करने के दौरान ही फोरेंसिक मेडिसीन टॉक्सोक्लॉजी  में मेरी रुचि जागी। जब सेकेंड ईयर में थी तब फॉरेंसिक पढ़ाया गया। उसमें होने वाले इन्वेस्टिगेशन और फॉरेंसिक एक्सपर्ट की भूमिका को देख मुझे प्रेरणा मिली। मानती हूं, इस फील्ड में ज्यादा चैलेंज हैं, लेकिन मैं कर सकती हूं, इस आत्मविश्वास के साथ मैंने फॉरेंसिक में जाने का मन बना लिया। यूजी में 15 दिन के लिए इंटर्नशिप दी जाती है, जिसमें मैंने फोरेंसिक मेडिसीन टॉक्सोक्लॉजी  चूना। कई विभत्सक केस देखें हैं, ट्रेन से कटकर शरीर के टुकड़े, बॉक्स व बोरों में भरकर लाए गए अंग शामिल हैं। तब मन में ख्याल आया कि क्या यह किसी साजिश का शिकार तो नहीं हुए। तब से ठान लिया था कि पीड़ित परिवार को न्याय दिलाऊंगी, इसी संकल्प को जिंदगी का मकसद बना लिया। पापा व रिश्तेदारों ने इस फिल्ड में जाने से मना किया था लेकिन मेरी रूचि देखते हुए मम्मी ने सपोर्ट किया। अभी फोरेंसिक मेडिसीन टॉक्सोक्लॉजी  विभाग में आए 6 माह ही हुए हैं, अब तक करीब 60 पोस्टमार्टम कर चुकी हूं। 

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श्रुति ने तोड़ी धारणा, बनेगी आर्थोपेडिक सर्जन 
जयपुर निवासी पीजी प्रथम वर्ष की छात्रा डॉ. श्रुति अग्रवाल कहतीं हैं, आम तौर पर ऐसी धारणा बनी हुई है कि आर्थोपेडिक में जोखिम अधिक होता है, इसलिए इसमें पुरूष ही जाते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है, हर क्षेत्र चैलेंजिंग होता है और महिलाएं तमाम चुनौती पार कर मुकाम हासिल कर रहीं हैं। इसी आत्मविश्वास के साथ मैंने कोटा मेडिकल कॉलेज के आर्थोपेडिक विभाग में प्रवेश लिया है। श्रुति बतातीं हैं, जब मैं 10 वर्ष की थी, मेरे भाई का हाथ फे्रक्चर हो गया था, उसका इलाज के लिए मैं एसएमएस अस्पताल ले गई थी, जहां आर्थोपेडिक में एकमात्र डॉ. पूनम पाटनी ही महिला डॉक्टर थी। उनके जूनून से लबरेज आत्मविश्वास से प्रभावित हुई और वहीं से ही आथोपेडिक डॉक्टर बनने का मन बना लिया। एमबीबीएस पूरी करने के बाद मेने आथोपेडिक में जाने का इरादा घरवालों को बताया तो माता-पिता ने सपोर्ट किया लेकिन रिश्तेदारों ने डी-मोटिवेट किया और कहा-इस फिल्ड में तुम काम नहीं कर पाओगे। लेकिन मैं अपने फैसले पर अडिग थी। नीट पीजी में मेरी 6000 तथा एम्स में 600 रैंक थी। इस रैंक पर एम्स ऋषिकेश में प्लास्टिक सर्जरी और एम्स बठिंडा में आर्थो मिल गई लेकिन मैंने कोटा चुना। विभागाध्यक्ष डॉ. आरपी मीना सर ने सपोर्ट किया। मोटिवेट किया, उनके अंडर में प्रेक्टिस कर रही हूं। यहां लेटेस्ट तकनीक के साथ सीखने को बहुत कुछ है। मैं स्पाईन सर्जन बनना चाहती हूं। 

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