वायु प्रदूषण राष्ट्रीय समस्या : निगरानी के लिए बने एनसीएपी का कानूनी आधार, कांग्रेस ने कहा- वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने के साथ हो तत्काल पुनर्गठन 

एनसीएपी को नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम के रूप में प्रचारित किया

वायु प्रदूषण राष्ट्रीय समस्या : निगरानी के लिए बने एनसीएपी का कानूनी आधार, कांग्रेस ने कहा- वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने के साथ हो तत्काल पुनर्गठन 

एनसीएपी को नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, जबकि वास्तविकता में यह एक नोशनल क्लीन एयर प्रोग्राम बनकर रह गया है।

नई दिल्ली। कांग्रेस ने कहा है कि वायु प्रदूषण राष्ट्रीय समस्या बन गई है। इसलिए इसकी निगरानी के लिए बने राष्ट्रीय स्वच्छ हवा कार्यक्रम (एनसीएपी) का कानूनी आधार और मजबूत कर अधिक वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने के साथ ही इसका तत्काल पुनर्गठन किया जाना चाहिए। कांग्रेस संचार विभाग के प्रभारी जयराम रमेश ने यहां एक बयान में एनसीएपी की हालिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि सैटेलाइट डेटा आधारित इस अध्ययन के अनुसार देश के 4,041 नगरों में से 1,787 शहर बीते 5 वर्षों में लगातार राष्ट्रीय मानकों से अधिक प्रदूषित रहे है। इसके बावजूद एनसीएपी के तहत केवल 130 शहरों को शामिल किया गया है, जो गंभीर रूप से प्रदूषित शहरों का महज 4 प्रतिशत है।

उन्होंने कहा कि एनसीएपी को नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, जबकि वास्तविकता में यह एक नोशनल क्लीन एयर प्रोग्राम बनकर रह गया है। इससे जुड़े 130 शहरों में से 28 शहरों में आज तक वायु गुणवत्ता मापन के निगरानी स्टेशन नहीं हैं और जहाँ हैं, वहां भी प्रदूषण का स्तर बेहद चिंताजनक है। कांग्रेस नेता ने एनसीएपी कानूनी श्रेणी देने की मांग की और कहा कि इसके प्रभावी क्रियान्वयन की सख्त व्यवस्था के साथ ही एनसीएपी की मौजूदा फंडिंग व्यवस्था को बढ़ाया जाना चाहिए। उनका कहना था कि वर्तमान में इसके लिए लगभग 10,500 करोड़ रुपये के बजट को 131 शहरों में बांटा जा रहा है, जबकि वास्तविक जरूरत इससे 10 से 20 गुना अधिक की है। उन्होंने यह भी कहा कि एनसीएपी को कम से कम 25,000 करोड़ रुपये देकर देश के 1,000 सबसे अधिक प्रदूषित शहरों और कस्बों वह इसके दायरे में लाया जाना चाहिए।

रमेश ने कहा कि एनसीएपी का प्रदर्शन मापने का पैमाना पीएम 2.5 स्तर होना चाहिए और इसका फोकस ठोस ईंधन के जलने, वाहन उत्सर्जन और औद्योगिक प्रदूषण जैसे प्रमुख स्रोतों पर केंद्रित किया जाना चाहिए। कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में इस साल के अंत तक एफजीडी अनिवार्य रूप से लगाने, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की स्वतंत्रता बनाये रखने और मोदी सरकार में बने जन विरोधी पर्यावरण कानून संशोधनों को वापस लेने की भी मांग दोहराई। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार संसद में वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य प्रभावों को बार-बार कमतर दिखाने की कोशिश कर अपनी अक्षमता और लापरवाही को छिपाने का प्रयास करती है।

 

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