पश्चिम बंगाल मुख्य सचिव नियुक्ति विवाद: बाबूलाल मरांडी का विपक्ष पर तीखा हमला, बोले- नियुक्ति नियमों और प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुरूप

लोकतंत्र में जनता का निर्णय सर्वोपरि

पश्चिम बंगाल मुख्य सचिव नियुक्ति विवाद: बाबूलाल मरांडी का विपक्ष पर तीखा हमला, बोले- नियुक्ति नियमों और प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुरूप

बाबूलाल मरांडी ने बंगाल के मुख्य सचिव की नियुक्ति पर विपक्षी हंगामे को सियासी पाखंड करार दिया। उन्होंने याद दिलाया कि झारखंड में भी चुनाव के बाद अधिकारियों को अहम पद मिले, पर भाजपा ने कभी जनादेश पर सवाल नहीं उठाया। उन्होंने विपक्षी दलों को हार के बाद संवैधानिक संस्थाओं पर हमला करने वाली मानसिकता छोड़ने की सलाह दी।

रांची। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने पश्चिम बंगाल में मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) रहे अधिकारी को मुख्य सचिव बनाए जाने को लेकर उठे विवाद पर विपक्षी दलों पर तीखा हमला बोला है। मरांडी ने कहा कि पश्चिम बंगाल में सीईओ रहे अधिकारी की मुख्य सचिव पद पर नियुक्ति को लेकर विपक्ष जिस प्रकार अनावश्यक विवाद खड़ा कर रहा है, वह पूरी तरह राजनीतिक मानसिकता को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि किसी भी अधिकारी की नियुक्ति चुनी हुई सरकार के विवेक और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत होती है। यदि नियुक्ति नियमों और प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुरूप हुई है, तो केवल राजनीतिक आरोप लगाना उचित नहीं कहा जा सकता।

बाबूलाल मरांडी ने झारखंड का उदाहरण देते हुए कहा कि वर्ष 2019 में जब कांग्रेस, झामुमो और राजद गठबंधन की सरकार बनी थी, उस समय विनय चौबे मुख्य निर्वाचन अधिकारी के रूप में चुनाव प्रक्रिया का संचालन कर रहे थे। बाद में मुख्यमंत्री द्वारा उन्हें प्रधान सचिव नियुक्त किया गया, लेकिन तब भाजपा ने कभी यह आरोप नहीं लगाया कि किसी अधिकारी की भूमिका के कारण जनादेश प्रभावित हुआ। उन्होंने कहा कि भाजपा ने हमेशा लोकतांत्रिक प्रक्रिया और जनता के जनादेश का सम्मान किया है।

उन्होंने विपक्षी दलों पर निशाना साधते हुए कहा कि चुनाव हारने के बाद संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाना, भ्रष्टाचार मामलों में जांच एजेंसियों पर भेदभाव का आरोप लगाना और हर प्रशासनिक निर्णय को राजनीतिक रंग देना कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, झामुमो, आम आदमी पार्टी और उनके सहयोगी दलों की पुरानी प्रवृत्ति रही है। मरांडी ने कहा कि लोकतंत्र में जनता का निर्णय सर्वोपरि होता है और उसे स्वीकार करना ही स्वस्थ राजनीतिक परंपरा की पहचान है।

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